रविवार, 11 जुलाई 2010

बीहड़ की शादी-------->>> दीपक 'मशाल'

 हफ्ते भर पहले आपसे बोल कर गया था कि आपको बीहड़ की शादी के बारे में बताऊंगा कुछ.. लेकिन अंतर्जाल की अनुपलब्धता और काम के जाल में ऐसा फंसा कि लिखने-पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाया.. आज किसी तरह लिख रहा हूँ तो सुनियेगा..
 ऐसे ऐसे हुआ क्या कि एक दिन मैं शाम के वक़्त खेल के जैसे ही घर लौटा कि कानों में एक फरमान सुनाई दिया,''आज की शादी में वीडिओग्राफी के लिए जाने वाले दोनों लड़के कहीं अपने रिश्तेदार के यहाँ शादी में गए हैं इसलिए आज की साई पर मुझे खुद जाना पड़ेगा और मदद के लिए तुम भी चलो साथ में..''
सुनकर मेरी जैसे जान निकल गई.. अगले दिन जरूरी क्लास, कपडे न धुले होने, जूते न पोलिश होने जैसे कितने बहाने गिनाये लेकिन.... आखिरकार मन मार कर बस में बैठना ही पड़ा उस बरात में जाने के लिए.. अब बस में बैठने पर पता चला कि हमारे यहाँ से करीब १०० किलोमीटर दूर बारात जानी थी एक ऐसे गाँव में जहाँ सुनते हैं कि डाकुओं का आना-जाना लगा रहता है और वो गाँव मुख्या सड़क से १०-१२ किलोमीटर अन्दर जा कर था. सुनकर और भी दिमाग भन्ना गया कि पिताश्री ने कहाँ फंसा दिया..
'बोल कालका माई की जय... शेरावाली मैया की जय.. वृन्दावनबिहारी लाल की.. जय..... के नारों के साथ बस स्टार्ट होके चली और रस्ते में १-२ जगह रूककर.. नमकीन और बूंदी के नाश्ते के साथ गाते-ऊंघते :) बस आखिरकार उस जगह पहुँची जहाँ से मुख्य सड़क ख़त्म और कच्चा रास्ता शुरू होता था..  
तो अब भईया शुरू हुआ असली खेल तमाशा.. पता नहीं दूल्हे-दुल्हिन ने कड़ाही हाथ में लेकर चाटी थी या कड़ाही में बैठ कर ही चाट मारा था कि अचानक ही बारिश शुरू हो गयी. अब जिस रस्ते से जाना था वो इस तरह था कि दायीं
 तरफ काफी बड़ी नहर थी और बाईं तरफ खेत.. लेकिन खेत करीब एक-डेढ़ मीटर नीचे था और कच्चा रास्ता जो सिर्फ एक ट्रेक्टर निकलने भर की इज़ाज़त देता था और बारिश से वो भी रपटीला हो गया था.. ड्राइवर साहब ने समझाने की कोशिश की कि ''देखिये भाई लोग कोई ट्रेक्टर मंगवा लीजिये क्योंकि ऐसे रास्ते पे बस नहीं जा पाएगी.. पलटने का खतरा है.'' लेकिन बाराती तो एक दिन के नवाब होते हैं सरकार.. वो कहाँ मानने वाले थे ट्रेक्टर जैसे घटिया खेतिहर वाहन में बैठने को.. झक मार के बस ड्राइवर ने बस को इस तरह उस रास्ते पर उतारा कि बस के पीछे वाले बाएं तरफ के दो पहियों में से एक हवा में था और बाकि सब उस रपटीली-चिकनी कच्ची सड़क पर.. ३-४ किलोमीटर तो वो बस-चालक बेचारा चालाकी से अपने स्किल्स का कामयाबी से यूज करते हुए बस को आगे ढरका ले गया लेकिन एक जगह वो रपटीली सड़क बेवफाई कर गई और बस खेत की तरफ को करीब ३०-३५ डिग्री के कोण पर झुक गयी..  लेकिन पीछे से ''भवानी मैया की जय'' के नारों के बीच बस 'वीर तुम बढे चलो-धीर तुम बढे चलो' करती हुई आगे बढ़ती गई.. पता नहीं कि औरों के क्या हाल थे लेकिन मेरे जरूर अंडे सटक रहे थे क्योंकि मैं खेत वाली साइड में खिड़की पर जो फंसा बैठा था.. फंसा इसलिए माई-बाप कि मैं आपको ये बताना भूल गया कि हमारे यहाँ की ए.सी.(खिड़की में शीशे नाम के तत्व नहीं पाए जाते और बस के चलने पर बस के अंग-अंग में लगे सारे पेंचों के हिलने से निरंतर एक सुरम्य संगीतमय आर्केस्ट्रा चलती रहती है..) बसें जो कि दिल्ली में १०-१२ साल चल चुकने के बाद हमारी सड़कों पर अपना बचा हुआ दम-ख़म आजमाती हैं और उनमे ५५-६० सीटों पर ९० के आस पास सवारियां बड़े आसानी से फंसाई जाती हैं.. चाहे वो बारात का सफ़र हो या पिकनिक का या किसी अन्य शहर जाने का..
और एक जगह वही हुआ जिसके न होने के लिए मैं बराबर हनुमान चालीसा गाये जा रहा था.. यानी बस एक पवित्र स्थान पर ऐसी लटकी कि ज़रा से झटके में फ़िल्मी स्टाइल में स्पिनाती हुई खेत में जा गिरती.. लेकिन वो तो चालक  जी ने चालाकी से सबको फटाफट नीचे उतरने को बोला एक-एक करके पहले खेत वाली तरफ की सीटें खाली हुईं फिर नहर की तरफ वालीं.. मैं भी अपने कैमरे का झोला समेटे राम-राम करता नीचे उतर गया.. जान बची तो लाखों पाए..
उसके बाद ड्राइवर महोदय ने बड़ी कुशलता मगर कुछ मुश्किल से बस को सम्हाला और रास्ते पर लाया.. लेकिन फिर आगे जाने की बात आने पर हाथ खड़े कर दिए.. तभी हल्की बारिश भी चालू हो गयी.. किसी तरह भींजते-भांजते हम लोग करीब ६-७ किलोमीटर पैदल चलते उस गाँव पहुंचे..
पहुँचने पर हाज़िर हुआ ''रूह-अफज़ा..'' और जिसे पीने के बाद हम फिर से अनारकली की तरह नृत्य करने को उठ बैठे.. गाँव में बिजली सिर्फ तभी नज़र आती जब बारिश होती और बादल गरजते या फिर जब कोई शादी होती. . यहाँ भी सिर्फ कुछ बल्ब और ट्यूबलाईट जगमगाने के लिए जेनरेटर को मंगाया गया था...
(पोस्ट बड़ी होने जा रही लगती है.. है कि नहीं भाई साब/ बहिन जी.. चलिए बाकी १-२ दिन में सुना देंगे.. तब तक एक बिहारी विवाह का गीत झेलिये.. :) )


दीपक 'मशाल'

27 टिप्‍पणियां:

  1. दीपक जी जैसे आप बस में फंसे थे ,वैसे हमें भी फंसा दिया ,दिलचस्प मोड़ पर रोककर ।चलिये इंतजार करते हैं---

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  2. बड़ा रोमांचकारी सफर रहा/// भला हुआ सही सलामत गाँव पहुँच गये...आगे की कथा का इन्तजार है..तब तक तिलक का गाना सुन रहे हैं.

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  3. अरे वाह दीपक दी ग्रेट, क्या जुमले छोड़े हैं इस बार, गज्जब।
    ’पता नहीं दूल्हे-दुल्हिन ने कड़ाही हाथ में लेकर चाटी थी या कड़ाही में बैठ कर ही चाट मारा था कि अचानक ही बारिश शुरू हो गयी.’
    ’पता नहीं कि औरों के क्या हाल थे लेकिन मेरे जरूर अंडे सटक रहे थे’
    ’फ़िल्मी स्टाइल में स्पिनाती हुई खेत में जा गिरती’
    मजा आ गया, लेकिन लास्ट में कर गये तुम बदमाशी,
    अब इंतज़ार करना पड़ेगा।

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  4. अरे अरे अब इस बस मै बिठाया फ़िर पेदल चलाया अब बीच मै क्यो ब्रेक मार दिये भईया? मजिल तक तो पहुचा देते, सच्ची कहे आप की इस खटारा बस मै तो खुब मजे आ रहे थे

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  5. फिलहाल आगे के संस्मरण का इंतज़ार है !

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  6. पता नहीं कि औरों के क्या हाल थे लेकिन मेरे जरूर अंडे सटक रहे थे क्योंकि मैं खेत वाली साइड में खिड़की पर जो फंसा बैठा था..

    bada khulla likhte ho yaar. jai ho......

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  7. पता नहीं दूल्हे-दुल्हिन ने कड़ाही हाथ में लेकर चाटी थी या कड़ाही में बैठ कर ही चाट मारा था ।

    हा हा हा यही कहा जाता है जिसकी शादी में पानी बरसता है।
    शादी का सत्यानाश दो ही जने करते हैं एक कंजुस दूसरा मेह।

    जय बुंदेलखंड

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  8. बहुत सुन्दर रचना !दिलचस्प

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  9. एक खूबसूरत मोड़ देकर जुदा हो गए ....

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  10. रोचक वर्णन-- मगर हम तो तुम्हारी शादी का निमम्त्रण पाने का इन्तजार कर रहे हैं। तब उसका विवरण मै लिखूँगी। आशीर्वाद।

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  11. Waise he aapki post ka intezar rhta h aur aap h ki beech mein chod chal diye, jaldi wapas lautiye aur puri kariye apni post.

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  12. रोचकता बनी हुई हो तो पोस्ट लम्बी नहीं लगती, खैर आप एक-दो दिन में सुनाना चाहते हैं तो इंतजार के अलावा कोई चारा नहीं।

    प्रणाम

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  13. ओह्……………कहाँ लाकर मारा है……………यहाँ रोकनी जरूरी थी क्या हम तो पूरी पढने के लिये तैयार बैठे थे।

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  14. अरे कैसी जगह अटका दी पोस्ट बस की तरह :) बहुत दिलचस्प वाकया है ..मुझे अपने पहाड़ों के दिन याद आ गए वहां भी बारिश में रोड इसी तरह बंद हो जाया करती थी और कुछ इसी तरह का नजारा और नारे बाजी भी :)

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  15. पढ़कर सचमुच बीहड़ की शादी का अच्छा खासा अंदाजा हो गया है... आगे की प्रतीक्षा है...बढ़िया संस्मरण ..

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  16. पहले तो मुझे लगा,ये कैसा लड़का है......बारात में जाने से कतरा रहा है...जबकि बच्चे ऐसे मौके की तलाश में रहते हैं....पर जैसे जैसे पोस्ट बढती गयी...तुम्हारी दुविधा समझ में आने लगी.

    उस रपटीले रास्ते पर एक पुरानी बस की सवारी कैसी रही होगी...बखूबी चित्र खींचा है....खेत और नहर के बीच का फिसलन भरा रास्ता और उसपर बारिश में इतनी दूर पैदल भी चलना...लेकिन रूह आफ्ज़ा के बाद डांस करने से नहीं चूके .....रूह आफ्ज़ा वालों को एक विज्ञापन का आइडिया मिल गया..:)

    इतने मुश्किल सफ़र के बाद भी रूह आफ्ज़ा से स्फूर्ति मिलती है.....मेरे सामने तो सारा चित्र खींच गया...तुम्हारा डांस करते हुए :)
    आगे शादी के विवरण और तुम्हारी विडियोग्राफी के किस्से का इंतज़ार...जल्दी पोस्ट करना अगली कड़ी.(मुझे भी ये कहने का मौका मिला कहीं....अब तक सिर्फ सुनती आई हूँ :) )

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  17. रोचक किस्सा है..
    वाकई इस तरह की बारात का अपना ही अलग आनन्द है.
    कोई इसे भले ही फंसना माने मैं तो मानता हूं कि जीवन का एक अनुभव था यह भी.

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