यहाँ लिखी हर एक पंक्ति को आँख बंद कर एक बार दोहराएंगे तो यकीन मानिए आपको ये सब अपना सा लगेगा.. बिलकुल आपका लिखा हुआ.. आपके दिल से निकला हुआ. ये मेरा दावा है.. साथ ही कमियों की तरफ ध्यान दिलाएंगे तो मुझे भी खुशी होगी..
अलग-अलग वो बरसा छाया जो साथ था
अरे काफिला-ए-बादल आया तो साथ था
वहाँ धूप थी तो क्या मेरा साया तो साथ था
तू मर गया कभी का 'मशाल' अभी ज़िन्दा है
बड़ी घुटन होती है मुझे इस खुशबू-ए-शहर में
कहाँ है गंध माटी की मैं लाया जो साथ था
क्यों मुझको नहीं सुहाते तेरे तन्हा सुरीले गाने
मिरा गाना बेसुरा था पर गाया तो साथ था
कहीं दिखता नहीं यहाँ ज़मीर मेरा खो गया है
शहर के द्वार तक वो मेरे आया तो साथ था
एक नेता बन गया है दूजा बन गया है आदमी
माँ ने दोनों बच्चों को जाया तो साथ था
तू मर गया कभी का 'मशाल' अभी ज़िन्दा है
यूँ तो दोनों ने ही ज़हर खाया तो साथ था
दीपक मशाल





