शुक्रवार, 18 जून 2010

मेरी किस्मत कहाँ ऐसी--------------->>>दीपक 'मशाल'




कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ,
मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ.


तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल,
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ.

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली,
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ.

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब,
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ.

नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये,
जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ.

मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू,
मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ.


कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से,
कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ.
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से 

34 टिप्‍पणियां:

  1. kamal kar diya bhaya........
    bahut sunder abhivykti.......

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  2. मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ.

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  3. प्रिय दीपक
    यूं मानिये कि सब दुआयें क़ुबूल हुईं , थोड़ी से मेहनत और ...समझिये "क्लास" !

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  4. आज कविता और पाठक के बीच दूरी बढ़ गई है । संवादहीनता के इस माहौल में आपकी यह कविता इस दूरी को पाटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है ।

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  5. लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब,
    सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ.

    नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये,
    जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ.
    अरे तुम्हारे जैसी किस्मत किस की भगवान का शुक्र किया करो। अगर कविता की बात करूँ तो लाजवाब है जल्दी से तुम्हारी जीत हो बहुत बहुत आशीर्वाद।

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  6. सीधी सादी सुन्दर अभिलाषायें ।

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  7. वाह!!......जवाब नहीं इस रचना का ......लाजवाब प्रस्तुती .

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  8. ’तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल,
    मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ’

    इतनी चाहत।
    अमां गुलजार कर दो महफ़िल को।
    ’हंसो आज इत्ना कि इस शोर में सदा इन दिलों की सुनाई न दे’

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  9. बेहद उम्दा और लाजवाब प्रस्तुती ................लगे रहिये !

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  10. तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली,
    तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ

    खूबसूरत रचना....भावनाप्रधान

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  11. बेहद अच्छी कविता...दीपक जी
    दिल खोल कर रख दिया है आपने

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  12. लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब,
    सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ.
    waaaaaaaaaaaaaaaah

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  13. तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली,
    तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ.
    मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू,
    मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ.

    बहुत ही सुन्दर भावों से सजी गज़ल्।

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  14. बहुत ही सुंदर भाई आप की यह रचना,

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  15. तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली,
    तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ.

    kitni pyari baat kahi, aapne!!
    aapke soch ko salam!!

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  16. नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये,
    जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ.
    वाह दीपक जी. बहुत सुन्दर. बधाई.

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  17. waah waah waah...
    jilleilaahi kamaal kar diya...
    are itne first class shayar ho tum ki kya kahein...
    padh kar laga ki kuch padha...
    behtareen..
    didi..

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  18. तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली,
    तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ.


    एक एक लफ्ज लाजवाब है!

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  19. ग़ज़ल रुपी यह पोस्ट बहुत लाजवाब लगी....

    --
    www.lekhnee.blogspot.com


    Regards...


    Mahfooz..

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  20. कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ,
    मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ.

    अहा!! तोड़ू शेर!! हर तार झंकृत हो गये. वाह!

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  21. कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से,
    कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ.

    लाजवाब !!

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  22. तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली,
    तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ.

    सीधे शब्दों में कही अच्छी रचना ... हल्की सी उदासी नज़र आ रही है ....

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  23. मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू,
    मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ.

    बहुत ही सुन्दर सरल शब्दों में बाँधा है भावनाओं को...बहुत सुन्दर

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  24. आपके भावनाओं की कद्र करता हूं ।

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  25. मंगलवार 22- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  26. दीपक जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मेरा आशीर्वाद और दाद दोनों कबूल करें...वाह...दिल खुश हो गया पढ़ कर..
    नीरज

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  27. दीपक
    पहली बार आपकी कविता पढ़ी और मन में उतर गई ।यूं लगा मन में पनपते जज़्बातों को लेखनी से पन्नों पर उतारा गया है।

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  28. वाह जनाब ...सही रही हर एक पंक्ति
    मजा आ गया पढकर
    कौन है जो इतने नखरे दिखा रही है :)

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  29. Deepak Bhai, Subah Subah aapka blog padhkar dil sahi mein bagh bagh ho gaya. Hame bilkul aasha nahi thi ki aaj ke samay mein aapke jaise log hain. Jo hindi mein itna zabardast lekhan kar rahe hain. Aur woh apne naukri ke alawa. humari hindi ka to dasvi kaksha ke baad kabara ho gaya hai. Isliye humri bhasha ko kshama karen. Isi tarah likhte rahiye

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