सोमवार, 14 जून 2010

पहली बार दारु.. मैगी, सुट्टे के बाद(झाँसी के किस्से... हास्य से)--------->>>दीपक 'मशाल'

अब जब मैगी और सुट्टे के प्रथम पान की कथा आपसे बिन पूछे ही कह सुनाई तो सोचता हूँ कि मदिरापान पुराण क्यों छोड़ा जाए??? वैसे भी इस मामले में मैं मोतीलाल नेहरु जी को ठीक मानता हूँ कि जब गांधी जी ने उनसे एक बार कहा कि, ''मोती तुम्हे अगर पीना ही है तो घर के अन्दर पियो, इस तरह महफ़िलों में लोगों के सामने पीयोगे तो तुम्हारे बारे में लोग क्या राय कायम करेंगे?''
तो पंडित मोतीलाल नेहरु जी का जवाब था, ''बापू, मैं जिस दिन पीना बंद करूंगा तो कहीं नहीं पियूंगा.. और जब तक पियूंगा तब तक सबको बता के पियूंगा.. मुझसे दिखावा नहीं होता..''..
और वैसे भी किसी शायर ने क्या खूब ही कहा है कि, 'पाल ले इक रोग नादाँ.. ज़िंदगी के वास्ते.. सिर्फ सेहत के सहारे ज़िंदगी कटती नहीं.'
तो एक दिन की बात है मैं किसी बात को लेकर जरा ज्यादा ही ग़मगीन था.. मेरे गोरखपुरी अजीजों से देखा न गया और लगे पूछने कि 'भाई बता बात क्या है?' पर मैं था कुछ अंतर्मुखी सा और फिर आपसे कोई कुछ भाव देकर पूछ रहा हो तो मनौवा लेने का मज़ा भी एक अलग ही सुख देता है. बढ़ते-बढ़ते बात यहाँ तक पहुँच गयी कि उनमे से एक भाई बोले कि 'बोल के तो तुम रहोगे.. चाहे कुछ भी हो जाये'
मैं भी अड़ गया कि 'नहीं बोलूँगा'.. कई नुस्खे आजमाए गए.. मार सेंटी-वेंटी बातां हुईं.. आखिर में शर्त लगी कि उनकी पिलाई शराब मुझे मेरे दिल का गम लोगों को बताने पर मजबूर कर देगी(सुधि पाठकों को सनद रहे कि इससे पहले तक ये शुभ हरकतें मेरी नज़र में पाप की श्रेणी में आती थीं.. ठीक वैसे ही जैसे 'झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है').. मैंने वो भी आजमाने की हामी भर दी. पर दारु खरीदनी/पिलानी उन्हें थी, मुझे सिर्फ गटकनी थी. तो मेरे २ गोरखपुरी अज़ीज़ भाई और एक मैं एक सुनसान से ढाबे पर पहुंचे.. बाकायदा एक टेबल पर ३ कांच के सस्ते से गिलास, बर्फ, स्टील की तश्तरी में प्याज-निम्बू-मिर्ची-खीरे का सलाद सजाया गया, मूंगफली के चिरपिरे-चटपटे बेसन कोटेड दाने लाये गए(कुल मिलाके मुझ नए-नवेले पियक्कड़ के लिए वैसे ही इंतजामात थे जैसे नयी नवेली दुल्हन के लिए होते हैं). अब बस व्हिस्की का खम्बा खोला गया(वैसे ये खम्बा नाम से भी मैं पहली बार परिचित हुआ था.. खम्बे के चित्र के दर्शन के लिए कृपया ऊपर जाएँ..).. दौर चला.. चलता गया. वो दोनों महाशय माहौल को मयमय बनाने के लिए सिगरेट के लच्छे बना रहे थे... और मैं निष्क्रिय धूम्रपान कर रहा था क्योंकि तब तक मैं इस सक्रिय सुट्टापान कला से विरक्त हो चुका था.
अब हर २ पैग बाद मुझे टटोला जाता कि पट्ठा कितने पानी में उतर गया..
दोनों पूछते,''अब बता दे साले क्या हुआ? घर में कोई टेंशन है?''
मैंने कहा ''ऊँहूँ''.. अगला सवाल- ''महबूबा से झगड़ा हुआ?''
जवाब दिया, ''ना''
''पैसे की जरूरत है?''
अबकी सर हिला के जता दिया कि ना.
कोई नहीं फिर २ दौर चले.. और फिर एक सवाल- ''घर की याद आ रही है?''
''क्क्च'' गाल अन्दर से घुमाकर मोड़ा और अजीब सी आवाज़ निकलते हुए नकारात्मक उत्तर उन्हें फिर थमा दिया.
ऐसे-ऐसे होते-होते तीन-सवा तीन घंटे में २ खम्बे और १ अद्धा तीन लोगों ने फिनिश कर दिए और जानबूझकर ज्यादातर मुझे ही पिलाई गयी कि ये गम बताएगा अपना.. पर मैं कनखजूरा चुपचाप रह कर ही गम-गलत करने के मूड में था.
आखिरकार दोनों ने मुझे गरियाना शुरू किया कि ''इतनी दारू पी गया और बता कुछ रहा नहीं है, अब हमें आधे महीने आधे पेट दिन काटने पड़ेंगे कमीने'' 
बस अब वापस चलने को हुए तो तीनों की ही हालत स्प्रिंग वाले बन्दर की सी हो रही थी(आप चाहें तो अपनी समझ के कुत्ते दौड़ा इसे ब्रेकडांसर की सी हालत भी कह सकते हैं.. खैर विकल्पों पर न जाएँ अपनी अकल लगायें).. सोचा चलो ऑटो करते हैं.. बस स्टैंड से मेडिकल जाने वाले रास्ते के बीच में यूनिवर्सिटी पड़ती थी और हम लोग स्टैंड और यूनिवर्सिटी के बीच में ही कहीं थे.. पर खुद को होश नहीं आ रहा था कि दादा लोग थे कहाँ?
मेनरोड पर आकर एक ऑटो(विक्रम) रोका गया.. अब उसमे अन्दर झांक कर देखा तो ३-४ लड़कियां पहले ही विराजमान थीं.. सो संस्कारों के वशीभूत होकर मैंने बाकी के दोनों साथियों से कहा कि, ''भाई इसे जाने दो दूसरा ऑटो रोकेंगे.. इसमें लड़कियां हैं''
पर कहते हैं न कि 'जो मजबूत नहीं वो पहिये की धुरी क्या... जो आराम से मान जाये वो गोरखपुरी क्या??'(वैसे आपने इससे पहले ये सुना हो इसकी गुंजाइश मुझे तो नहीं लगती.. क्योंकि इस लोकोक्ति की प्रसूति अभी-अभी मेरे द्वारा ही हुई है..)
तो भाई को नहीं मानना था सो नईं माने.. उल्टा उस बेचारे ऑटो वाले की मातृशक्ति एवं भगिनीशक्ति को अपमान से विभूषित और उसे अविचलित करने वाली उपमाओं से नवाजने लगे और जा बैठे सबको ठेलते हुए ऑटो के अन्दर.. हमारा अन्दर घुसना था कि प्लांक सिद्धांत को सही ठहराते हुए हम तीन दिग्गजों के आयतन के अन्दर जाते ही उसी अनुपात में तीन बेबस, बेचारी, मासूम, शरीफ लड़कियों का आयतन चुपचाप ऑटो से कम हो गया.. वो बाहर आकर ऑटो वाले से बाकी के पैसे लेकर किसी नए साधन का इंतज़ार करने लगीं..
हम अपने गंतव्य पर पहुंचे और शान से ३ के बजाये १ रुपये देकर उतर लिए.. अब एक तो यूनिवर्सिटी के लड़के ऊपर से सुरा का प्रताप कि वो वाहन चालक कुछ नहीं बोला(वैसे ये तय है कि उसने पीठ पीछे जी भर के गालियाँ दी होंगीं).
थोड़ा आगे चले तो शर्मा पी.सी.ओ. था.. बस मैं बिदक गया कि एक कॉल करके आता हूँ.. एक जगह(कहाँ का नंबर लगाया ये नहीं बताऊंगा) कॉल किया पर भेद खुलने के डर से ज्यादा बात नहीं की, अब ज्यों ही मैं फोन रखने वाला था कि दोनों में से एक मदहोश साथी मेरे पास आये और बोले,''मैं भी बात करूंगा'' किसी तरह मैंने समझाया कि ''देख तेरे मुंह से बहुत बदबू आ रही है.. दूसरी तरफ जो लाइन पर है वो सूंघ के समझ जाएगा/जायेगी'' मद्यदेवी का कमाल देखिये कि बंदा तुरंत मान गया और बोला, ''कोई नईं तो हम सुबह बात करेंगे''.. उसके बाद नवाबी में अपने खाते में पैसे लिखाये और चल दिए अपने-अपने कमरे की तरफ.. उनका तो पता नहीं कैसे कहाँ पहुंचे पर मैं उस ईद वाले दिन अपने कमरे पर सकुशल पहुँच गया.
लेकिन बिस्तर पर बैठा ही था कि जाने कहाँ बिस्तर, जाने कहाँ फर्श, जाने कहाँ छत और कहाँ दीवारें.. कुछ न पता जी. बस सीधा लहरा के बिस्तर पे धम्म.. ठीक वैसे-जैसे मैराथन जीतने के बाद खिलाड़ी ज़मीन पर गिरता है... अब हर पांच मिनट में पलंग के नीचे घूमती दुनिया देखने के लिए झांकते और सब खाया-पिया बाहर कर देते, रामजाने कित्ती देर ये सिलसिला चला होगा. वो तो भला हो एक अन्य गोरखपुरी मित्र का जो किसी काम से कमरे पर आये और आके प्रत्यक्ष नरक के भोगी बने. फिर वो विभिन्न गंधों से महकते कमरे को कब धो गए, कब मुझे पनाले पर ले जाके  सामान्य किया कुच्छ न पता चला.. जाना तो बस सीधा अगले दिन जब वो अज़ीज़ अपना-अपना हैंगओवर(ये बड़ा ही शुद्ध साहित्यिक शब्द है जिससे पियक्कड़ बन्धु अच्छे से वाकिफ होंगे) उतार कर आये जिनके साथ हम हमप्याला हुए थे.. और मेरी मकान मालकिन ने उन्हें जी भर के गालियाँ दीं कि ''शरीफ लड़के की क्या दशा कर दी? कितनी शराब पिला दी.. पीना सिखा रहे हैं.. बिगाड़ रहे हैं..भागो यहाँ से. खबरदार जो कभी इस बच्चे के आसपास भी दिखाई दिए तो.''
अब मैं भी नवाज़ शरीफ बन गया.. कैसे कहता कि मैं भी महज़ जूनियर कलाकार नहीं था इस कलाकारी में..
अब जब भी कभी कहीं पार्टी में या किसी के साथ चीयर्स बोल रहे होते हैं तो वो पीने का उद्घाटन जरूर याद करते हैं और साथ ही तय कर लेते हैं कि कितना पीना है..( वैसे मैं रोज या हफ्ते वाला नहीं भाई.. इस तरह के महासम्मेलन द्विमासिक या त्रिमासिक ही होते हैं और अब ज्यादातर बीयर से ही काम चला लिया जाता है..)
और आखिर में अगर शराब, सिगरेट छुड़ाने की मुफ्त तकनीक चाहिए हो तो अगली पोस्ट में बता दूंगा जो आपकी आज्ञा हो तो..
अब मेरी पसंद के दो चिट्ठे-
पंकज उपाध्याय http://pupadhyay.blogspot.com/
शरद कोकास http://kavikokas.blogspot.com/2010/06/blog-post.html
दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल बाबा की किरपा से...

45 टिप्‍पणियां:

  1. दीपक भाई राज तो फिर भी रह ही गया ना। पहली बार में इतनी हिम्‍मत कमाल ही लगता है, वैसे हम क्‍या जाने कि क्‍या होता है?

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  2. फ़ोन कहाँ किया , फिर भी नहीं बताया ....
    रोचक शैली ...!!

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  3. haan raaj jaanne ki tamanna to tamanna hi reh gayi...bata bhi dijiyega....khair ye somras se koson door hi raha ...par hostel me apne hi room me logon ko daba ke cheerful hote hue dekha hai....wo sab yaad aa gaya...jab dost kuch palon ke liye kuch jyada hi gehre ho jaate the...

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  4. पीना और जीना एक जैसा है
    Wine क्या Win जैसा नहीं है?
    पीने के महात्म्य का दर्शन मैने भी दिया है पता नहीं आपने देखा या नहीं :
    http://www.taauji.com/2010/05/m-verma_31.html

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  5. "और आखिर में अगर शराब, सिगरेट छुड़ाने की मुफ्त तकनीक चाहिए हो तो अगली पोस्ट में बता दूंगा जो आपकी आज्ञा हो तो.."

    दीपक जी पढ़कर हमें वैसे ही एक पेग का नशा चढ़ गया , हाँ ये जो आप करने जा रहे तो यही कहूंगा कि दिलजलो पर रहम करो यार !

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  6. का गुरु ,अपना किया धरा गोरखपुरियों पर ठेल रहे हो ।ऊ फोनियाने वाली बात हजम कर दिये ,जरा खुलासा तो करो ।

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  7. हा हा हा
    गोरखपुरियों की अच्छी कही। अपना कॉलेज याद आ गया। किसिम किसिम के पियक्कड़ ! एक सज्जन का तो प्रसिद्ध डायलॉग था - पीना कैसा जो उल्टी, टट्टी न कर दो। प्राय: हर रविवार की सुबह उनका कमरा वार्डब्वाय नाक पर रूमाल बाँधे साफ करता था।
    एक दूसरे थे जो टुल्ल होने पर वाहियात हरकतों के लिए विख्यात थे। एक फ्रेशर पार्टी में हमारे रंगीले वार्डन साहब को माइक पर कहना पड़ा ,"ए गुप्ता, हमहूँ पीयेलीं। जानेलीं कि केतना चढ़ेला।" नॉन भोजपुरियों के लिए अनुवाद - गुप्ता! मैं भी पीता हूँ और जानता हूँ कितनी चढ़ती है !
    कहना न होगा उसके बाद गुप्ता जी कहीं गुप्त हो गए :)

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  8. तीन तिप्पणियां
    1. पंडित जी की बात समझ ली होती तो हरिलाल की दुर्गत न होती.
    2. जो मजबूत नहीं वो पहिये की धुरी क्या... जो आराम से मान जाये वो गोरखपुरी क्या
    वाह वाह!
    3. पीने के बाद भी बात बताने की हिम्मत नहीं आई, कैसे आदमी हो भइ?

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  9. बहुत ही रोचक ढ़ंग से अपनी बात कही आपने दीपक जी। वाह।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  10. पीने के बाद अक्सर लोग अपने दिल की बात उगल देते हैं..मैंने ऐसा सुना है लेकिन ऐसे समय में भी अपने दिल की बात कैसे छुपा ली ये तो वाकई शोध का विषय है...

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  11. वाह, बहुत खूब,

    हमने भी बस स्टैंड से कोछाभांवर का विक्रम खूब किया है। इलाईट चौराहे, सदर बाजार के भी कभी किस्से लिखना

    नीरज रोहिल्ला

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  12. बताईये, आप झाँसी में आदतों से जूझ रहे थे और गोरखपुर पर अन्तर ही नहीं पड़ता था ।

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  13. बहुत बढिया है हम तो बिना पिये ही जी रहे है अब इसे जीन कहते है कि नही ये पता नही लल्लू.

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  14. baap re rakam rakam ki bottal dekh kar man hi ghabda gaya hai...chalo kal padhenge ab ..abhi sirf chatka lagate hain...sab jo kah rahe hain bahut badhiya hai.. to hoga hi....mera raaj dulaaara jo likh raha hai...
    ..didi

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  15. प्रिय दीपक
    काफी दिनों से टिपियाने के मूड में था पर आप अलग अलग ब्लाग्स में दिखे तो कन्फ्यूजन बना रहा ...कि किसे बुक मार्क किया जाये ! एक बार एक ब्लॉग को पकड़ा तो वहां अगली रचना किन्ही दूसरे साहब की थी ! मैं ज़रा लीक पकड़ इंसान हूँ इसलिए बराये मेहरबानी बता दीजिये कि मुझे कौन सी कुंडी खटखटाना चाहिये ! आज आपकी पोस्ट पर उद्धृत गोरखपुरियों का पक्ष इंजीनियर गिरिजेश राव को लेना पड़ा ,"ए गुप्ता, हमहूँ पीयेलीं। जानेलीं कि केतना चढ़ेला।" मुझे लगा कि जैसे वे माइक पर कह रहे हो " ए दीपक ............. :)

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  16. Phone par bhi soongh aa jayegi..wah! Yah baat bhi aapke dost maan gaye!
    Shaili to baandhe rakhti hee hai!

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  17. कमाल का संस्मरण..... अपने दिन भी याद आ गए....

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  18. बाकायदा एक टेबल पर ३ कांच के सस्ते से गिलास, बर्फ, स्टील की तश्तरी में प्याज-निम्बू-मिर्ची-खीरे का सलाद सजाया गया, मूंगफली के चिरपिरे-चटपटे बेसन कोटेड दाने लाये गए(कुल मिलाके मुझ नए-नवेले पियक्कड़ के लिए वैसे ही इंतजामात थे जैसे नयी नवेली दुल्हन के लिए होते हैं)
    हा हा हा ..कमाल लिखा है ..बेहद रोचक संस्मरण

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  19. भैया छोड़ने छुड़ाने की बातें मत करो, हमें तो पीने के नए तरीके और बहाने सीखने हैं!

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  20. अब तो पुरानी बात हो गई...अब तो बिना पिये भी बता सकते हो...बताओ..बताओ..या एक बार फिर टनाटन पिलवायें. :)

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  21. अली सर, बस एकबार आपका ध्यान खींचना चाहता था.. जानकर ख़ुशी हुई कि आप पहले भी पढ़ते रहे हैं, टिप्पणी बड़ी बात नहीं, बस मार्गदर्शन करते रहें..

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  22. हाहाहा वाह भाई, जी खुश कर दित्ता... कमाल आदमी हो मियाँ सब कुछ उगला दिया पर बात नहीं उगली आप ने.. अच्छे agony uncle होगे आप अपने दोस्तों के बीच ... और इस लाइन ने मूड बना दिया..

    जो मजबूत नहीं वो पहिये की धुरी क्या... जो आराम से मान जाये वो गोरखपुरी क्या??

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  23. अच्छी तरह से लिखा है खुद की यादों को

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  24. अब क्या कहें!
    शानदार भी है और जानदार भी!

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  25. दीपक पीने की बात तो हज़म हुई पर ये तथ्य गले नहीं उतरा.............
    तीन लोग.....
    तीन सवा तीन घंटे...........
    दो खम्बे..........
    एक अद्धा..........

    -------------------------------------------
    इतना पीने कोई पहली बार नहीं जाता है.....और इतना पिया भी नहीं जा सकता.............लगता है कि तुम्हारे दो पियक्कड़ गुरु टल्ली गुरु होंगे जो तुम जैसे नौसिखिये की आड़ में खम्बे पर खम्बे चट कर गए........
    इतने के बाद मैराथन खिलाड़ी जैसी स्थिति तो होनी ही थी अच्छा हुआ कि कमरे पर ही हुई...............
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  26. दीपक,
    सीरिज बढि़या जा रही है दोस्त, चलने दो और किस्से।

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  27. आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

    उत्तर देंहटाएं
  28. .
    .
    .
    प्रिय दीपक,

    हा हा हा हा,

    बहुत रोचक किस्सा... वैसे पहली बार कहाँ, कैसे, किन हालात में पीया और किसने पिलाया... भुलाये नहीं भूलता यह सब ।
    तुम ने भी पीने के प्रति कोई दुराग्रह नहीं पाला हुआ है और कभी-कभी इन्जॉय करते हो...यह भी जाना ।
    खुशवंत सिंह ने शायद कहीं लिखा है... कि जो कभी छूता तक नहीं...उस से बचकर रहो... बहुत खतरनाक होता है वोह आदमी... भरोसे लायक तो कतई नहीं... अपने आज तक के अनुभव से मैं भी मानता हूँ इस बात को!


    ...

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  29. मरम ना जानने वाले के लिये ………………।मशाल साहब रचना बेमिसाल्। अभार्……।

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  30. बहुत खूब दिपकजी!... पंडित मोतिलाल नेहरुजी का बापू को दिया गया जवाब सबसे ज्यादा ध्यान खिंच रहा है!... बहुत उमदा पोस्ट, धन्यवाद!

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  31. बहुत खूब अन्दाज़-ए-बयाँ है।

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  32. बहुत ही रोचकता से लिखी हैं सारी बातें....कई लोगों को अपने किस्से याद आ रहें हैं...क्यूँ ना एक परिचर्चा आयोजित की जाए इन मजेदार पहले अनुभवों की :)
    वैसे वह दोस्त तुम्हारा एक देवदूत की तरह पहुंचा...जिसने साफ़ -सफाई की और तुम्हे भी संभाला...वरना सोचो क्या हाल होता...पर अच्छा लगा जानकर ये कार्यक्रम कभी कभी ही होता है...जिम्मेवार हो...Liked that :)

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  33. आईये जानें ..... मैं कौन हूं !

    आचार्य जी

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  34. वाह !!...बहुत ही रोमांचकारी प्रस्तुती रही .....पढ़ कर मजा आगया .

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  35. तवज़्ज़ो देने के लिए आप सबका तहेदिल से इस्तकबाल करता हूँ..

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  36. ''देख तेरे मुंह से बहुत बदबू आ रही है.. दूसरी तरफ जो लाइन पर है वो सूंघ के समझ जाएगा/जायेगी'' मद्यदेवी का कमाल देखिये कि बंदा तुरंत मान गया और बोला, ''कोई नईं तो हम सुबह बात करेंगे''.
    हाहा
    बहुत खूब

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  37. Baap re! lekin humein poora yakeen hai ki agli post mein woh secret bahar aayega( woh bhi muft mein) jo sharaab bhi bahar nahi laa paayi,...:)
    Mazedaar post

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  38. वाह साहब!! जिस जिंदादिली से आपने अपनी दास्ताँ सुनाई है, बन्दे को अपने हॉस्टल क दिन याद आ गए!!!
    पहली बार आपका ब्लॉग पढने का मौका मिला और मज़ा आ गया!

    -himanshushekhar.com

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  39. सभी महानुभावों"(?) की तरह अपनेराम को भी पुराने दिन याद आ गये, जब हम तीन बैचलर्स एक साथ रूम शेयर करते थे।

    उस समय की कड़की, उस समय की बेताबी, उस समय की "टोपियाँ"… सब कुछ याद दिला दिया आपने…

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