मंगलवार, 8 जून 2010

कीमत(लघुकथा)------------------------>>>दीपक 'मशाल'

रमा के मामा रमेश के घर में कदम रखते ही रमा के पिताजी को लगा कि जैसे उनकी सारी समस्याओं का निराकरण हो गया.
रमेश फ्रेश होने के पश्चात, चाय की चुस्कियां लेने अपने जीजाजी के साथ कमरे के बाहर बरामदे में आ गया. ठंडी हवा चल रही थी.. जिससे शाम का मज़ा दोगुना हो गया. पश्चिम में सूर्य उनींदा सा बिस्तर में घुसने कि तैयारी में लगा था.. कि चुस्कियों के बीच में ही जीजाजी ने अपने आपातकालीन संकट का कालीन खोल दिया-

''यार रमेश, अब तो तुम ही एकमात्र सहारा हो, मैं तो हर तरफ से हताश हो चुका हूँ.''

मगर जीजाजी की बात ने जैसे रमेश की चाय में करेले का रस घोल दिया, उसे महसूस हुआ की उस पर अभी बिन मौसम बरसात होने वाली है.. लेकिन बखूबी अपने मनोभावों को छुपाते हुए उसने कहा-

''मगर जीजाजी, हुआ क्या है?''

''अरे होना क्या है, वही पुराना रगडा... तीन साल हो गए रमा के लिए घर तलाशते हुए. अभी वो ग्वालियर वाले शर्मा जी के यहाँ तो हमने रिश्ता पक्का ही समझा था मगर..... उन्होंने ये कह के टाल दिया की लड़की कम से कम पोस्ट ग्रेज़ुएट तो चाहिए ही चाहिए. उससे पहिले जो कानपूर वाले मिश्रा जी के यहाँ आस लगाई तो उन्होंने सांवले रंग की दुहाई देके बात आई गई कर दी.''

''वैसे ये लड़के करते क्या थे जीजा जी?''

''अरे वो शर्मा जी का लड़का तो इंजीनिअर था किसी प्राइवेट कंपनी में और उनका मिश्रा जी का बैंक में क्लर्क..'' लम्बी सांस लेते हुए रमा के पिताजी बोले.

''आप कितने घर देख चुके हैं अभी तक बिटिया के लिए?'' रमेश ने पड़ताल करते हुए पूछा.

''वही कोई १०-१२ घर तो देख ही चुके हैं बीते ३ सालों में'' जवाब मिला.

'' वैसे जीजा जी आप बुरा ना मानें तो एक बात पूछूं?'' रमेश ने एक कुशल विश्लेषक की तरह तह तक जाने की कोशिश प्रारंभ कर दी.

''हाँ-हाँ जरूर''

''आप लेन-देन का क्या हिसाब रखना चाहते हैं? कहीं हलके फुल्के में तो नहीं निपटाना चाहते?'' सकुचाते हुए रमेश बोला.

''नहीं यार १६-१७ लाख तक दे देंगे पर कोई मिले तो..'' जवाब में थोड़ा गर्व मिश्रित था.

रमेश अचानक चहका-
''अरे इतने में तो कोई भी भले घर का बेहतरीन लड़का फंस जायेगा, जबलपुर में वही मेरे पड़ोस वाले दुबे जी हैं ना, उनका लड़का भी तो पिछले महीने ऍम.डी. कर के लौटा है रूस से... उन्हें भी ऐसे घर की तलाश है जो उनके लड़के की अच्छी कीमत दे सके.''

रमा के पिताजी को लगा जैसे ज़माने भर का बोझ उनके कन्धों से उतर गया..
मगर परदे के पीछे खड़ी रमा को इस बात ने सोचने पे मजबूर कर दिया कि यह उसकी खुशियों की कीमत है या उसके होने वाले पति की????

दीपक 'मशाल'
चित्र सभार गूगल से..

37 टिप्‍पणियां:

  1. ladke ki kimat .....pata nahi kyun ladke bikaau hote hain aur ladki ko ehsaan manne ko kahte hain

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  2. क्या कहूँ समझ नहीं आ रहा ये ऐसा विषय है जिस पर डंडा लेकर निकल जाने को दिल करता है ...
    तुमने बहुत ही सटीक तरह से बात रखी है ..बहुत बढ़िया.

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  3. deepak ji ..yahan sab kuch hai daanv par ..sundar prastuti!

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  4. आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

    आचार्य जी

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  5. सुन्दर और सटीक प्रस्तुति....माता पिता का तो स्वयं ही मन करता है बेटी को देने का...पर ये लडके वाले सोचते क्यों नहीं....वैसे आज कल पढ़े लिखे लडके थोडा विरोध करने तो लगे हैं पर कितने? जब उनको भी आराम से सब मिलता है तो शायद वो भी लालच में आ जाते हैं...

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  6. यह सच्चाई आज भी बहुत सी लड़कियों को परेशान करती है। अच्छा लिखा है आपने।

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  7. रुपए देकर बेटी के लिए खुशियां खरीदने की बात हो रही है।

    लेकिन रुपयों से खुशियां कहां मिलती है?

    यक्ष प्रश्न है।

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  8. आज भी बहुत से घरों की यही कहानी है

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  9. yah ek sachchi baat hai, hindustan main hi ladki ko bojh maana jaata hain, kaaran yhan ke logon ke paas pason ka abhav, aur gareebi

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  10. इससे लड़के व लड़की को कोई अन्तर नहीं पडता है पर समाज को एक दूसरे की मजबूरियों का फायदा उठाने में पता नहीं क्या आनन्द मिलता है ।

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  11. sochne ko majboor kar diya sirji ek baar fir...sundar aur samvedansheel rachna...

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  12. "रमा के पिताजी को लगा जैसे ज़माने भर का बोझ उनके कन्धों से उतर गया.".......जब तक पिता बेटी को बोझ समझते रहेंगे ....तब तक उस बोझ की कीमत तय होती रहेगी....

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  13. Archna ji ki baat se sahmant hun...jab tak ladkiyon ko bojh samjha jaayega yahi haal hoga..
    ye to ghar ghar ki kahani hai..
    bahut sundar prastuti..
    ...didi

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  14. दीपक इस बार तुम्हारी कलम कुछ बहकती सी लगी................तारतम्य का अभाव दिखा..........
    १६ - १७ लाख की शादी करने की हिम्मत और पहले के दो लड़कों के बापों का मना करना कुछ समझ नहीं आया............ अब MD लड़का क्यों तैयार हो जाएगा जो रमा के पिता के सर से बोझ सा उतर गया?
    लड़का फंसना है तो पहले वाले ही फंस जाते. इतने लाख में तो राम पोस्ट ग्रेजुएट भी हो जाती और रंग भी सांवले से गोरा हो जाता.
    इस बार मामला कुछ जमा नहीं.............. इसमें फिरसे सुधार करो.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  15. लघुकथा के सांचे का अभाव दिख रहा है। अन्तिम पंक्ति में चमत्‍कार सा प्रभाव दिखना चाहिए जो मन को बड़ी देर तक चमत्‍कृत करता रहे।

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  16. हर घर की कहानी... बहुत सुंदर ....

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  17. आईये जानें … सफ़लता का मूल मंत्र।

    आचार्य जी

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  18. बहुत अच्छी रचना है
    आप तो सीधे चोट करते हैं
    मान गए आपको
    इस रचना के लिया आभार

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  19. हमारे समाज में लोग अभी भी शादी नहीं खरीद-प्रखोस्त करते है !

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  20. सुन्दर और सटीक प्रस्तुति..

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  21. कितने कोनों की सच्चाई...बहुत बढ़िया!

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  22. कहानी के भाव बहुत अच्छे हैं... माँ-बाप समझते हैं कि वे अपनी बेटी की खुशियों की कीमत अदा कर रहे हैं, लेकिन अगर खुशियाँ पैसों से खरीदी जा सकतीं तो दहेज देने के बावजू लोग अपनी लड़कियों को खो न बैठते, फिर तो हर वो लड़की खुश होती जिनके माता-पिता मोटा दहेज देकर उनकी शादी करते हैं.

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  23. sahi bat kahi deepak bhai ...dulha bikta hai ....kuch din baad neelami hogi .... 20 lakh ek ...20 laakh do ..bees lakh teen ...lo ji dulha falane parivar ko saunp diya gaya

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  24. एक कलंकित समाज और ये बच्चियां ....

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  25. आज खुशियां पैसे से तोली जाती है लेकिन कब तक !!!!!!!

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  26. ये कीमत है संस्कारवान बेटी होने की...

    जय हिंद...

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  27. पिता की खून-पसीने की कमाई का बड़ा हिस्सा यूँ जाया होता देख...बहुत गुस्सा आता है...इससे बेहतर तो वे अपनी बेटी को अपने पैरों पर खड़ा करें....पर सच्चाई वही है जो तुमने कहानी में बयाँ की है...और कहानी तो समाज की तस्वीर ही होती है...

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  28. samaj me betiyon ki sthiti tab tak nahi sudharegi jab tak mata pita kisoch nahi badlegi.sunder rachna..

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  29. क्या कहें ……………।यही तो त्रासदी है जिस से सभी जूझ रहे हैं……………मगर हल कोई नही ढूँढता आज सब पैसे की तराजू मे तोला जाता है।

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  30. अजित मैम, चाचा जी.. रचना काफी पुरानी है और आलस के कारण मैंने ना ही गलतियों पर ध्यान दिया और ना सुधार.. सुधार कर लूँगा.. जल्दी ही.. आभार..

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  31. समाज का आईना है आपकी लघु कविता .. शहद ये सच अभी हमारी उम्र के लोग नही देख पा रहे हैं ,.... इसके बदलाव को आज का युवा वर्ग ही ला सकता है ....

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  32. जिंदगी की तल्ख सच्चाई को आपने बहुत नफासत के साथबयां कर दिया है।
    --------
    ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

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  33. dshko se jvalnt prshn hai aapki lghukatha ka vishy aur dino dinlakh badhte ja rhe hai .

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  34. दहेज लेने वाले और देने वाले दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं, लेकिन हमारे समाज में यह समस्या बहुत गहरी धंसी हुई है। दो तीन साल पहले दिल्ली के एक कालेज की छात्राओं का इंटरव्यू लिया था एक अखबार ने, और हैरानी की बात है कि अधिकतर लड़कियां ही दहेज के हक में थी और कुछ ने तो बहुत बोल्डली कहा कि वे जरूरत पड़ने पर जिद करके अपने पेरेंटस से अपने लिये दहेज लेंगी।

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  35. समाज का असली चेहरा दिखसया है मगर इस समस्या का कोई हल नही दिखाई देता। दिन ब दिन बढती ही जा रही है । बहुत अच्छी लघु कथा है बधाई

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