रविवार, 16 मई 2010

तलब (लघुकथा)------------------------------->>> दीपक 'मशाल'


आँख खुलते ही सुबह-सुबह मुकेश को अपने घर के सामने से थोड़ा बाजू में लोगों का मजमा जुड़ा दिखा. भीड़ में अपनी जानपहिचान के किसी आदमी को  देख उसने अपने कमरे की खिड़की से ही आवाज़ देते हुए पूछा-
''क्या हुआ अरविन्द भाई? सुबह से इतनी भीड़ क्यों लगी है?''
''यहाँ कोई भिखारिन मरी पड़ी है मुकेश जी, शायद सर्दी और भूख से मर गई.''
जवाब सुन कर उसे बीती रात का घटनाक्रम याद आ गया..
१० बजे के आसपास सिगरेट की तलब उठते ही वो नाईट ड्रेस में ही १४-१५ रुपये डाल पान की दुकान, जो कि गली के मुहाने पर थी, की तरफ  बढ़ गया. रास्ते में एक मरगिल्ली सी भिखारिन २-३ रुपये के लिए गिगियाने लगी-
''ऐ बाबू जी, दू ठो रुपईया दे देओ.. हम बहुत भूखाइल बानी अउर पेट दुखाता.. तनी दू ठो रोटी खा लेब''
एक पल को मुकेश ठिठका तो पर उसे ख्याल आया कि 'इसे २ रुपये दे दिए तो सिगरेट के पैकेट को कम पड़ जायेंगे और उसे वापस घर भागना पड़ेगा पैसे लेने के लिए. फिर ये तो मंगनी है कोई ना कोई दे ही देगा इसे.'
''अरे दे देओ बाबू जी.. ना तो भूखे हम मर जाइब, भगवान् भला करी'' भिखारिन अभी भी गिड़गिड़ा रही थी और वो ''खुल्ला नहीं है माई'' कह कर वहाँ से बच कर निकल लिया था .

दुखी मन से दातुन करते हुए अब उसे पछतावा हो रहा था कि उसकी सिगरेट की तलब किसी की भूख पर भारी पड़ गई.. एक ज़िंदगी पर भारी पड़ गई.. वो उठा और सबसे पहिले सिगरेट के आधे बचे पैकेट को कमोड में बहा दिया, शायद कुछ दृढ निश्चय सा किया था उसने.
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

56 टिप्‍पणियां:

  1. लघुकथा अच्छी लगी, अंत बहुत ही अच्छे से किया है

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  2. na jane ye ghatna kuch paas se chhuti hui si nikal gayi...ham itne laaparwah kyu ho jate hai aur itne swarthi bhi. man ko chhu gayi ye laghu katha..isliye dukh hua.

    yahi shayed is laghu katha ki safalta hai.badhayi.

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  3. बहुत बढ़िया..अच्छा लगा अंत में उसका दृढ निश्चय.

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  4. मेरे पास होते तो भी ना देता, हां खाना उसे जरुर खिला देता

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  5. अत्यंत मार्मिक.....लघु कथा का अंत नि: संदेह प्रेरणादायक है...बहुत अच्छी लगी ये कहानी

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  6. दीपक जी
    अन्दर तक हिला कर रख दिया…………बेशक छोटी है मगर असर बहुत गहरा कर गयी।

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  7. बहुत सुन्दर
    अंत सकारात्मक

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  8. अत्यंत मार्मिक और सार्थक लघुकथा.
    धन्यवाद ऐसे लेखन के लिए..........
    .

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  9. लोगों को न सिर्फ जागरूक करती लघु कथा बल्कि कुछ खास परिस्थिति के प्रति सजग रहने का संदेश भी देती है।

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  10. बहुत बढ़िया..अच्छा लगा धन्यवाद ऐसे लेखन के लिए..........प्रेरणादायक है

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  11. सरल और सुन्दर ।मनुष्य की प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करती हुई लघुकथा ।

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  12. प्रेरणादायक लेखन ,,,,,//// 'भिखारी' इस शब्द के बारे में कुछ और जानिये http://athaah.blogspot.com/

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  13. दिल को छु गयी ये लघु कथा ......बेहतरीन

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  14. लघुकथा अच्छी लगी, अंत बहुत ही अच्छे से किया है...

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  15. bahut hi marmik Dipak ji...par kya pata ye talab jaane kab fir comode se bahar nikal aaye...laghukatha bahut hi marmsparshi hai...

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  16. मनुष्य प्रवर्ति को इंगित करती अच्छी लघु कथा ...परन्तु ये कैसे पता किया जाये कि भिखारी सच में भूखा है और कहने केलिए ही पैसे मांग रहा है.....या.....?

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  17. आम जीवन में घटने वाली इन घटनाओ को बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है

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  18. ऐसा ना जाने कितने लोगों के साथ घटता है पर ऐसा निश्चय सभी नहीं ले पाते ।

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  19. लघुकथा में कविता सी धार है....अंत अच्छा है.....सारी घटना बिलकुल अपने आसपास की सी लगती है...
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  20. यह लघुकथा अपने आप में किसी उपन्यास से कम नहीं !!
    बेहद उम्दा और सटीक !!

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  21. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. जलजला भाई मुझे माफ़ करें ये सभी ब्लोगर मेरी पसंदीदा हैं और सबके लिए मेरे मन में सम्मान है.. आप ऐसा झगड़े मत करिए.. कॉमिक्स वाले जलजला हैं तो कॉमिक्स में ही वापस जाइए..

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  23. कथा का सकारात्मक और ठोस अंत अच्छा लगा..और किसी जिंदगी के नये करीने की शुरुआत जैसा..जैनेंद्र साब की कभी सलेबस मे पढ़ी एक कहानी भी याद आयी..’अपना अपना भाग्य’ जिसमे ऐसे ही गरीब लड़के की ठंड से रात मे मौत को नायक रात की मुलाकात के बावजूद नजरंदाज कर देता है..यह सोच कर कि अपना अपना भाग्य!!

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  24. dipak,
    tumhaari lekhni ke taab se ab bach paana kathin hai...blog jagat ke raushan sitaare ho tum...ek din mein itni laghu kathaayen likhnewaala maine apne jeewan mein nahi dekha tha ...lekin ab kah sakti hun dekha hai..
    sabse badi baat sabhi ek se badh kar ek...
    shabassh...
    ..didi

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  25. अच्छा हुआ, बेचारी को रोज़-रोज़ की जिल्लत से छुटकारा मिला...
    बेचारी किस-किस की सिगरेट छुड़वाती...

    जय हिंद...

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  26. प्रेरक लघु कथा दीपक जी ! कई बार चौराहे पर देना चाह कर भी इस लिए हाथ खींच लेते है कि किस-किस की मन्नत पूरी करोगे ! एक-आध हो तो चलता यहाँ तो ढेर सारे भिखमंगे है !

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  27. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. जानपहिचान ---------जानपहचान

    गिगियाने लगी ---------घिघियाने लगी

    पाहिले -----पहले

    मेरी नजर में उपरोक्त शब्द , मै गलत भी हो सकता हूँ.

    अच्छी लघु कथा .

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  29. बहुत ही सुन्दर कहानी ...एक सुन्दर सन्देश के साथ

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  30. आशीष जी बहुत आभारी हूँ आपका गलत लिखे गए शब्दों की तरफ ध्यान आकर्षित कराने के लिए.. कुछ कामों में व्यस्तता के चलते आजकल लिख कर खुद नहीं पढ़ पा रहा. स्नेह बनाये रखें.. ये सुधार तो मैं शाम को ही कर पाऊंगा.. :(

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  31. दीपक भईया बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति रही , तलब शायद इसे ही कहते हैं जो मनुष्य को अंधा बना देती है और इनकी सवेंदनाओं को भी खत्म कर देती है ।

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  32. कई बार अनजाने ही ऐसा कुछ हो जाता है जिंदगी में ...मगर दृढ निश्चय ने बता दिया कि ऐसी गलती अब कभी दोहराई नहीं जायेगी ...
    अच्छी लघुकथा ...

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  33. jeevan main is tarah ke hadse kabhi bhi ho sakte hain, kabhi kabhi humare liye jo baat chhoti hoti hai, vahi baat kisi ki jindagi bana ya bigaad sakti hai
    dipak ji
    aapki laghu katha bahut hi achchi hoti hain
    kuchh insan ko seekhne ko hi milta hai
    par insan soche jaroor in laghu katha ke baare main

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  34. दिल को छुं जाने वाली दास्ताँ ...
    आपकी शुभकामनायों के लिए धन्यवाद ...
    और हाँ ... हम न तो कवी हैं न ही कोई लेखक हैं भाई ... बस मन के विचार आप सबके सामने रखते हैं ...

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  35. प्रसंशनीय , अंत भला लगा ।

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  36. एक अपराधबोध, जो दृढ निश्चय में बदल गया.

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  37. कम शब्दों में भी कहानी अपना उद्देश्य व्यक्त करने में सफल रही है ...
    बहुत बढ़िया

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  38. आपकी एक तलब मै पूरी किए दे रही हू ......... व्यसन के आदी लोगो पर एक अच्ह व्यंग..............बधाई.....अपने उद्देश्य मे सफ़ल होओ..इसी आशीर्वाद के साथ....

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  39. सार्थक लिखा है ... अक्सर कुछ बातें दिल को हिला देती हैं अंदर तक ...जीवन में कुछ निश्चित परिवर्तन ऐसे पलों में ही आता है ...

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  40. लघुकथाओं का तो यहाँ अम्बार लगा हैं...... मज़ा आया.... अरे दे देओ बाबू जी.. ना तो भूखे हम मर जाइब, भगवान् भला करी''
    ये वाक्य तो भोजपुरी टाईप लग रहा हैं.... आप यू पी से हैं? पूर्वांचल की तरफ के?

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  41. Lord!!Great story...
    I hope Mukesh took a hold from then,,
    New 2 ur blog...fascinatin to see a hindi one..my first,,:)

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