गुरुवार, 13 मई 2010

वतन के रखवाले (लघुकथा)------------------------------->>>दीपक 'मशाल'


''आप कैसे ये जनरल बोगी खाली करा सकते हैं जबकि इसके बाहर 'सैनिकों के लिए आरक्षित' या इसके जैसा कुछ भी नहीं लिखा?'' उन १०-१२ सैनिकों के कहने पर चुपचाप उस सामान्य बोगी से उतरते लोगों में से उस पढ़े-लिखे से युवक ने एक मिलिट्री वाले से सवाल कर दिया.
''तुझे हम सबकी वर्दी नहीं दिख रही क्या?'' सैनिकों में से एक ने जवाब में सवाल की गोली चला दी.
शायद युवक भी जल्दी हार मानने वाला नहीं था ''पर रेलवे ने पहले से तो ऐसा कुछ बताया...''
''हाँ-हाँ ठीक है भूल होगी रेलवे की.. अब अपना सामान सिमेटो और जल्दी निकलो यहाँ से.'' युवक की बात काटते हुए दूसरा सैनिक बोल पड़ा.
बिना अपना सामान उठाये वो फिर बोला- ''पर अगर ये आर्मी के लिए है तो मेरे चाचा जी भी लेफ्टिनेंट कर्नल हैं.. कैंसर सर्जन हैं वो आर्मी होस्पीटल में. देखिये सर मुझे सुबह ड्यूटी ज्वाइन करनी है और ये रात भर का सफ़र है, मुझे यहीं रहने दीजिए प्लीज़.. आप चाहें तो मैं अंकल से बात करा देता हूँ... अगर विश्वास ना हो तो.''
कहते-लहते वह जेब से मोबाइल निकाल अपने अंकल का नम्बर डायल करने लगा.
उसके मोबाईल वाले हाथ को सख्ती से पकड़ एक सैनिक कुछ ज्यादा ही तैश में आते हुए बोला ''ओये ज्यादा नौटंकी नहीं.. चुपचाप उतर जा या धक्के मार के उतारें.. बाकी के सब चू** थे क्या जो आराम से उतर गए.. बड़ा आया अंकल वाला''
मायूस होकर उसे वतन के उन रखवालों की मंशा पूरी करनी ही पड़ी. उसके डब्बे से नीचे उतरने के साथ-साथ दो लड़कियां उसी बोगी में चढ़ने की कोशिश करने लगीं. जिन्हें उसने समझाने की सोची कि इनलोगों से बात करना फ़िज़ूल है. पर उससे पहले ही- ''ये कम्पार्टमेंट पूरा खाली है, क्या हम इसमें बैठ सकती हैं?''
अन्दर से ३-४ समवेत स्वर उभरे- ''हाँ-हाँ क्यों नहीं? आ जाइये.''
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से 

33 टिप्‍पणियां:

  1. एक दादागिरी ऐसी भी । वैसे सुरक्षा बलों के सिपाहियों में अनुशासन होना ही चाहिए । या फिर यह सिविल लाइफ का असर है!

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  2. बहुत वाजिब प्रश्न छिपा है इस लघुकथा में
    सुन्दर

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  3. are bahut badhya likhte ho dipak..
    aur haan ye dadagiri karte hain ye loh..apni vardi ka beja faayda uthate hain...vardi mein hain to kya hua andar ki kamiyaan to hoti hi hain...
    hamesha ki tarah lajwaab..
    ...didi

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  4. ये देश ऐसे ही वीर जवानों का है जी। इन्‍हीं की याद में दि‍ल्‍ली में स्‍मारक बनेंगे। इन्‍हें आप उन युद्धों में इस्‍तेमाल के लि‍ये पालते हैं जहां दबदबे कायम करने हों, जि‍नसे नफरत के अलावा कोई अमृत नहीं नि‍कलता। एक देश को इनकी जरूरत महज इसलि‍ये पड़ती है कि‍ क्‍योंकि‍ अन्‍य देशों से लगती सीमाओं पर भी ऐसे ही वि‍वशकर इंतजाम हैं और अपने अन्‍दर की जनता का डर .... खैर आपने इसी उदाहरण में देखा जनता तो उनसे भी डरती है जि‍नको उसने ही नि‍युक्‍त कि‍या है। अपने बच्‍चों को बताईये कि‍ हम उसे क्षेत्र के ही वासी नहीं जि‍से भारत करते हैं वरन उस एक ही पृथ्‍वी के वासी भी हैं जि‍स पर अन्‍य 5 अरब हम जेसे लोग भी हैं ताकि‍ कि‍सी भी ऐसे डरावने उपायों की जरूरत ना पड़े ना अन्‍दर ना सीमाओं पर।

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  5. दीपक जी, सही लिखा है, कुछ लोग हैं हमारी सेना में इस तरह के, जिनकी वज़ह से पूरी सेना बदनाम हो रही है!

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  6. दीपक जी , यह भी एक भावनातमक सच्ची कहानी हो सकती है मगर ज्यादातर तस्वीर इन सबके विपरीत होती है जिसे आम इंसान समझ नहीं पाता ! क्योंकि मैंने यह जिन्दगी बहुत करीब से १६ साल देखी है इसलिए आपकी कहानी का पूर्ण समर्थन नहीं कर सकता ! आप कल्पना कीजिये की आप एक सिपाही है , केरल( अपने पैत्रिक स्थान ) से छुट्टी खाकर ड्यूटी पर लौट रहे है ! पोस्टिंग आपकी बारामुला कश्मीर लें है, और आपके लिए सरकार ने ट्रेन वारंट तो दिया है मगर ट्रेन में सीट की गारंटी नहीं दी ! अंतिम जुगाड़ बस यही रह जाता है कि कम्पार्टमेंट के बाथरूम के बगल में अपना विस्तरबंध खोल किसी गंद की परवाह किये बगैर लेट जाइए !

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  7. प्यारे भाई ! ये सचाई है और लगभग हर रोज़ की सचाई है . फौजी लोग आम नागरिक को जिस हेय दृष्टि से देखते व गलीज़ भाषा में संबोधित करते हैं वो किसी से छुपा नहीं है लेकिन हम लोग चूँकि सैनिकों की क़द्र करते हैं इसलिए कोई शिकायत नहीं करता ..............

    आप ने जो बताया उसके अलावा भी ऐसी बहुत सी बातें हैं जो वितृष्णा पैदा करती हैं ..किसी दिन विस्तार से ज़रूर लिखूंगा.......

    आपका आलेख अच्छा लगा ........

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  8. कहानी एक सन्देश देती है....वतन की रक्षा करने वालों को सहिष्णु होना चाहिए...पर कभी कभी वर्दी का गलत प्रयोग भी कर दिया जाता है....लड़कियों की सीट दे कर उनकी मानसिकता पता चल रही है....पर शायद सभी ऐसे ना हों...और सरकार को भी चाहिए की सैनिकों के लिए आरक्षित सीट्स की व्यवस्था हो.तब ऐसी घटना कम होंगीं....
    वैसे सैनकों की सुविधा का आम देशवासियों को भी ख़याल रखना चाहिए...लेकिन यदि सैनिक गलत व्यवहार करेंगे तो कौन इसके लिए पहल करेगा...

    अच्छी कहानी.....काफी कुछ सोचने पर विवश करती हुई

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  9. आपने जो लिखा है वो सच्चाई का एक पहलु है ... एक दुखद पहलु है ... जहाँ तक आपके लेखन की बात है, तो वो मुझे बहुत अच्छा लगा, काफी रोचक ढंग से लिखते है आप ...
    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया ... आप सबकी तरफ से जो उत्साह मिलता है वही प्रेरणा देता है की कुछ लिखूं ...

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  10. सम्माननीय श्री गोदियाल सर, आपसे सहमत हूँ कि इन लोगों की भी अपनी परेशानियां होती हैं. पर मैंने ऐसा १-२ बार नहीं बल्कि कई बार होते देखा है तभी इस तरह लिखा और ये भी सच है कि ऐसी ओछी हरकतें ज्यादातर सिपाही या हवलदार रैंक के लोग ही करते हैं या फिर रंगरूट. सभी ऐसा नहीं करते. यकीन मानिए मेरा इस लघुकथा के मार्फ़त यही सन्देश है जो आदरणीय संगीता जी ने पकड़ा है. आभार आपका.

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  11. AAPKI KAHANI ACCHHI LAGI KUCH KUCH YATHARTH KI DHARA PAR APNE PAIR JAMATI HUI SI...LEKIN AKSAR AISA HOTA NAHI LEKIN KEHTE HAIN NA EK MACCHHLI SARE TAALAAB KO GANDA KAR DETI HAI. AISA HI KUCHH LAGTA HAI.

    PEHLI BAAR APKE BLOG PAR AAYI HU ACCHHA LAGA APKO PADHNA.

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  12. Afsos!
    Mai to aapki follower hun..mijhe jaankaari kyon nahi mil rahi aapke lekhan kee...baat samajh me nahi aayi..!
    Mai to aapke kisi link pe click kar yahan aayi!

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  13. क्षमा जी पता नहीं कैसे पर ये गड़बड़ कुछ दिनों से चल रही है.. ऐसे ही मैं भी जिन ब्लोग्स को ब्लोगरोल में डाले हूँ उनमे से कई की जानकारी नहीं मिलती. आशा है आप इसे मेरी भूल न समझ माफ़ करेंगीं.

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  14. रुग्न मानसिकता। दादागिरी।
    बेहतरीन लघु कथा।

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  15. भाईया यह बात सिर्फ़ इन फौजी लोग की नही भारत मै जिस की भी चलती है वो यह सब करते है,इस मै कसुर इन फौजी लोग का नही हमारी मानसिकता ही ऎसी है, फ़िर इन लडकियो को खुद ही नही जाना चाहिये था उस डिब्बे मै, हम सब बिगडे हुये है ओर सिर्फ़ हम लातो की भाषा समझते है, सभ्य बनाना हमे अच्छा नही लगता

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  16. Deepak ji aisi ek ghatna ka saamna main kar chuka hun...wo din yaad aaya...aisa hi ek baar ek kashmiri naagrik ke sath hua tha....unko aam nagrikon se itna door rakha jaata hai ki wo aam nagriko ko hey drishti se dekhne lagte hain....par fir bhi desh ke liye marte to hain isliye unki thodi talkhi manjoor

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  17. काफी अच्छे मुद्दे उठाते हो अपनी लघु कथाओं में, लिखने में महारथी हो, आशा है आगे भी ये सिलसिला जारी रहेगा.

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  18. बहुत कुछ कहती है ये लघु कथा .देश के रखवाले ही जब इस तरह के गेर जिम्मेदाराना और अशोभनीय व्यवहार करें अपनी वर्दी का नाजायज़ फायदा उठायें तो बाकियों को क्या कहा जाये.वैसे ये तो क्या इस तरह के वतन के रखवालों को आप सड़कों पर इव टीजिंग करते हुए भी देख सकते हैं ...

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  19. लघुकथा पूरा संदेश देते हुए अपने होनी का निर्वहन कर रही है. मैं समझता हूँ सभी ने यह दृष्य देखे होंगे..शायद भिन्न भिन्न रुपों में..इसीलिए सीधे चोट करती है.

    बेहतरीन लघुकथा. बधाई.

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  20. फौजी लोग आम नागरिक को जिस हेय दृष्टि से देखते व गलीज़ भाषा में संबोधित करते हैं.बेहतरीन लघुकथा. बधाई.

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  21. ek bahut hi gambhir mudda uthaya hai aur sahi bhi hai..........chahe kuch hi log hon aise magar hote hain sabhi jagah..........sangita ji ne sahi kaha hai chotarfa prayason se hi aisi samasyaon ka hal nikal sakta hai.

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  22. दीपक..क्या कहानी लिखी है....लोगों की मानसिकता पर सटीक प्रहार...लड़कियों के लिए जगह निकल ही आती है....जबकि सख्त जरूरत होते हुए भी लड़के की मिन्नत की परवाह नहीं की.
    और ये वर्दी का रुआब गांठने से तो लोग बाज आते ही नहीं...
    बिलकुल सच्चाई बयाँ कर दी है..वो भी इतने रोचक तरीके से

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  23. रश्मि जी मानसिकता पर प्रहार तो है लेकिन यही मानसिकता है जिसे बदलना मुमकिन है...लेकिन मेरी एक जिज्ञासा है कि इसे बदला भी क्यों जाये, ये तहजीब है शायद हमारे देश की.

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  24. मै आपकी इस कहानी से अंशतः सहमत हूँ वो इसलिए कि फौजी को कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए एवं आदेश सुनते हुए , उनके स्वभाव में शुष्कता आना लाजिमी है. और उनका इस तरह वर्दी का रुवाब दिखाना कही ना कही हमारी हुकूमत को कठघरे में खड़ा करती है जो अपने सिपाहियों के लिए उचित आवागमन कि सुविधा नहीं मुहैया करा पाती है. मै गोदियाल साहब के कहे से इत्तिफाक रखता हूँ.कि अगर एक सिपाही को मुल्क के एक कोने से दुसरे छोर पर जाना हो वो भी एक निश्चित अवधि के लिए , और उनकी छुट्टी कि भी कोई ठिकाना नहीं होता कि मिले या ना मिले, और इस कारण वो सीट आरक्षित भी नहीं करा सकते .परिणाम ये जो आपने लिखा .जहा तक लडकियों कि जगह देने कि बात है इसको इस नजर से भी तो देखा जा सकता है कि उन्होंने नारी का सम्मान किया.और वो उन लडकियों से रूखेपन से बात नहीं कर सके जो हमारे देश कि परंपरा रही है .जहा तक eve teasing कि बात है, हम सब जानते है कि कौन करता है eve teasing रोज , नगरो और महानगरो में.

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  25. ऐसी घटनाएं अक्सर हम लोग देखते रहते है ,जैसा कि कई लोगो ने माना भी है ....पर कमी ये है कि जब हम गलत होते देखते है तो उसे रोकने के लिए एकजुट नही होते.......पता नही क्यों डरते है ...इस घटना मे अगर वो विरोध करने वाला सही था तो बाकी लोगों ने भी उसका साथ देना था या उन सैनिकों मे से ही कोई एक अपने साथी को ऐसा करने से रोक देता.........तो दॄश्य कुछ और होता..

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  26. Archana ma'am doosra sujhaav to samajh me aata hai lekin general me safar karne wale jyadatar log gareeb ya nimn madhyam varg se aate hain jo apne aap ko har jhamele se bachaye rakhne ki pravratti paale hote hain..

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  27. vardi ka raub hai sirf aur kuchh nahin
    vardi utar jaye to rah jayenge sirf haad-maans ke putle

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  28. यार दीपक इसीके लिए कह रहे थे कि आज किसी का कोप भाजन बनना पडेगा ? क्यों भाई , ये तो एक सच है । आज भी यदि गिनने लगूं तो एक छोटी मोटी प्लाटून के लायक फ़ौजी तो हैं ही घर में , इसके बावजूद लिख रहा हूं कि ये सच है मैं खुद देख चुका हूं बहुत बार । मगर शुक्र है कि ये अभी भी अपवाद ही है , मगर है तो सही

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  29. कुछ लोग हैं हमारी सेना में इस तरह के

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  30. एक सशक्त लघुकथा,
    जो शब्द-रूप में समाप्त होने के बाद अधिक कहती है!
    --
    ऐसी लघुकथाओं का लेखन न के बराबर हो रहा है!
    --
    एक प्रभावशाली लघुकथा के लेखन के लिए लेखक बधाई का पात्र है!
    --
    बौराए हैं बाज फिरंगी!
    हँसी का टुकड़ा छीनने को,
    लेकिन फिर भी इंद्रधनुष के सात रंग मुस्काए!

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  31. बहुत बार ऐसा देखा है .. पर मिलिट्री वेल ही क्यों ... जिसका भी बस चलता है वो ही ऐसा करने लगता है ...
    अच्छी लगी आपकी कथा और इसका अंत तो बहुत ही लाजवाब है ... सच है अगर लड़कियाँ आ जाएँ तो सब क़ानून भी और दादागिरी भी छूट जाती है ... प्लीज़ करना चालू ....

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