शुक्रवार, 7 मई 2010

आयरनमैन(लघुकथा)------------------>>>दीपक 'मशाल',

'तड़ाक... तड़ाक... तड़ाक...' तीन-चार तमाचों की तेज़ आवाज़ और गालियों के साथ किसी के गर्जन को सुन बरात के बीच से नन्हे  मुग्ध  का  ध्यान  अचानक  डांस से हटकर उस ओर चला गया. अपने दोनों गालों और कानों को अपने नन्हे हाथों और बाजुओं से ढंके उसका ही हमउम्र सा  (करीब ९-१०साल का) एक मैला-कुचैला  बच्चा सिहरा हुआ खड़ा था और हिचकियाँ ले रहा था. उस बच्चे के साथ ही खड़ा एक शक्तिशाली आदमी जो शायद लाइटहाउस का और उस बच्चे का मालिक लग रहा था, उसे लाल आँखों से घूरते हुए, अंट-शंट गालियाँ बके जा रहा था.
''हरामजादे.. अब इसका पैसा क्या तेरा बाप भरेगा आके? जब टांगों में जान नहीं तो क्यों आ जाते हो मरने? गमला उठाएंगे ये स्साले..''
बीच-बीच में कभी पतली फंटी को उसकी फटे-चीथड़े हाफ पेंट से कहने भर को ढँकी कमज़ोर टांगों पर फटकारता जाता, तो कभी उसके बाल पकड़ जोर से भभोंच देता. उन्माद में डूबे किसी बाराती ने उस आदमी को रोकने की कोशिश नहींकी.
लोगों की बातों से पता चला उस मजदूर बच्चे के हाथ से लाइट हाउस के गमले का एक ट्यूबलाइट टूट गया था.. वो भी शायद उसकी गलती नहीं थी बल्कि किसी बाराती के पैर में तार उलझ गया और अचानक तार में पैदा हुए खिंचाव से वो बेचारा गमला सम्हाल ना पाया.
उसकी निर्मम तरीके से पिटाई देख मुग्ध के मुँह से भी सिसकारी निकल गई. चलते-चलते, हँसते-गाते बारात लड़की वालों के दरवाजे पर पहुँच गई पर अब उसका अपने प्यारे चाचू की शादी में भी डांस करने का या कुछ खाने-पीने का मन नहीं कर रहा था. वो इसी सोच में उलझा था कि उस ट्यूबलाइट में ऐसा क्या था जो उस बच्चे को उसकी वजह से इतनी मार और गालियाँ खानी पडीं. जबकि उसकी खुद की तो तब भी इतनी डांट नहीं पड़ी थी जब उससे गलती से टी.वी. खराब हो गया था और पापा को फिर नया टेलीविजन ही खरीदना पड़ा था.. कुछ भी तो नहीं कहा गया था उससे सिवाय इतने प्यार से समझाने के कि- ''मुग्ध बेटा, आगे से अगर इसका कोई फंक्शन समझ ना आये तो किसी से पूछ लिया करना'' 
''जरूर कुछ और बात रही होगी.. शायद वो ट्यूब लाइट बहुत ही महंगा हो... लेकिन फिर इतनी मार खा के भी वो रोया क्यों नहीं?? हम्म्म्म समझा जरूर वो बच्चा आयरनमैन होगा''
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

32 टिप्‍पणियां:

  1. मन को संवेदित करती सुन्दर लघुकथा दीपक जी।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. मन को द्रवित कर दिया आपने ।

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  3. बहुत मार्मिक लघुकथा....पढ़कर मन द्रवित हो गया.

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  4. बिलकुल सही पता नहीं कितने लोगों कि किस्मत में इस तरह से आयरनमैन बनना लिखा है

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  5. ये बच्चे सिर पर लाइट उठाते हैं, प्रकाश फैलाते हैं...शादी में पैसे लुटाए जाते हैं...ये बच्चे मनमसोस कर ही रह जाते हैं और लाइट टूटने के डर से वो पैसे भी नहीं लूट पाते हैं...वही पैसे जिनसे घर पर रोटी बननी है...मां की दवाई आनी है...छोटे भाई को स्कूल भेजना है...बचपन का श्मशान...फिर भी मेरा भारत महान...

    जय हिंद...

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  6. marmik prastuti...bechara wo balak...bachpan se jimmeedari ki jo maar padti rehti hai wo hi use ironman bana gayi...

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  7. aisa najaro me aata rahata hai .doudatee bhagtee jindgee me ek samvedansheel vyktitv hee drushtee dal pata hai ine dil ko choo dene walee ghatnao par..........
    Aabhar.......

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  8. किसी भी शादी-बारात के दौरान यह दृश्य दिख ही जाता है..... मगर हम भी ख़ुशी की रौनक में "बेयोंड द कर्टेन " क्या हो रहा है भूल जाते हैं......एक सामाजिक विषमता को करीने से उजागर करती मार्मिक लघुकथा पढवाने का धन्यवाद दीपक भाई.

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  9. बच्चे कि कल्पना के साथ एक संवेदनशील लघु कथा....बहुत अच्छी लगी..

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  10. संवेदनशीलता के चरम विन्दु पर है ये लघुकथा...बहुत मार्मिक प्रस्तुति दीपक ...

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  11. सुन्दर , इस लघु कथा के माध्यम से उस उपेक्षित वात्सल्य का बढ़िया चित्रण दीपक जी !

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  12. ओह!! दीपक ये क्या लिख गए...बहुत ही सुन्दर तरीके से एक मार्मिक प्रसंग का चित्रण किया है..

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  13. दीपकजी, यह आपके लिए और इन सभी के लिए एक लघु-कथा हो सकती है , पर ये मेरे जीवन का एक सच है !
    मैं भी गुजरा हूँ कभी इस दौर से , यह पढके बीता हुआ अतीत याद आ गया !

    आपने सही बात लिखी है , यह भी इन्सान के जीवन की एक सच्चाई है !

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  14. मार्मिक लघुकथा..!!

    असल में समस्या बाल मजदूरी से जुड़ा है / कई बच्चो के गार्जियन ही इन्हेंबचपन में मजदूर बना देते हैं. होटलों ढाबों में तो यह हर जगह देखने को मिलता है.

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  15. बहुत ही शानदार लिखा है आपने। बधाई स्वीकार करें। आपकी सलाह समय-समय पर मिलती रही है कोशिश करता हूं कि सुधर जाऊं। आपको पढ़कर अच्छा लगा।

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  16. हम जब अपने आसपास यह सब दॆखते है तो बीच मे बोअलते क्यो नही?? मै हमेशा बोल पडता हुं, जिस से जुल्म करने वाला सहम जाता है, ओर मेरे बोलने से बाकी लोग भी मेरा साथ देते है जो पहले मुक बने रहते है.... हमीं जब बोलेगे तो ही यह हालात सुधरेगे.
    एक बार मै अपने दोस्त के परिवार के संग शिप मै कही जा रहा था, मेरा बडा लडका ४,५ साल का था, मैने प्यर से उसे कहा आ तुझे बाहर फ़ेंक दुं ओर बाहॊं मै झुलाया, बाकी सभी गोरे मेरे को गुस्सा होने लगे, ओर जब मै उन्हे जबाब देने ऊठा तो मेरे दोस्त ने कहा अब चुपचाप बेठ जाओ सारे लोग तुम्हे बुरा कह रहे है ओर अगर तुम बोले तो पुलिस आ सकती है.... ओर मै चोरो की तरह से चुफ चाप बेठ गया, तो जनाब जब हम सब आवाज ऊठायेगे तो यह जुल्म भी कम होंगे इन गरीब बच्चो पर

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  17. dipak,
    cheezon ko alg tareeke se dekhna aur unmein samvedna khoj laane ki kala bahut acchi tarah aati hai tumhein...bahut sundar likha hai tumne...
    SUPERMAN...
    didi..

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  18. जश्न में मग्न शराबी बारातियों को भला कहाँ नज़र आता है बचपन का शमशान ।
    अच्छा लिखा है।

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  19. Dr. Harimohan Gupta8 मई 2010 को 2:31 am

    ek sach ke kareeb si hai ye laghukatha.

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  20. Dr. Harimohan Gupta8 मई 2010 को 2:32 am

    sach ke kareeb si hai ye laghukatha..

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  21. मार्मिक लघुकथा
    विसंगतियाँ इसे ही कहते हैं

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  22. Do alag-aag choron par khade bachpan ki marmik tasveer.

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  23. Dil kiya..kaash wo dusht kabhi mere haath lag jaye aur mai use thappad maar sakun..!

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