मंगलवार, 11 मई 2010

जरिया(लघुकथा)----------------->>>दीपक 'मशाल'


''अंकल मैं उस कॉमिक्स का दो दिन का किराया नहीं दे पाऊंगा.'' कॉमिक्स को एक दिन ज्यादा रखने का किराया देने में असमर्थता ज़ाहिर  करते हुए बल्लू ने दुकानदार से कहा. लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव ना देख  बेचारगी सी दिखाते हुए बोला-
''प्लीज एक ही दिन का किराया ले लीजिये ना अंकल..''
''हम्म.. पैसा तो पूरा देना पड़ेगा'' सपाट सा जवाब मिला और फिर थोड़ी देर तक खामोशी
''रहता कहाँ है वैसे तू? किसका लड़का है?'' उसे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए सवाल हुआ..
जेब में सिर्फ अठन्नी लिए बल्लू को कुछ आशा जगी- ''अरे अंकल वो नाले के पास छिद्दन कारीगर को जानते हैं, उन्हीं का बेटा हूँ.''
''ठीक है माफ़ कर देता हूँ.. और मेरा काम करेगा तो फ्री में भी पढ़ सकेगा'' कुछ सोचने के बाद जवाब आया
''लेकिन कल दोपहर १ बजे आना जब दुकान के आसपास कोई ना हो, सब समझा दूंगा''
खुशी से झूमता बल्लू सर हिला के चला गया लेकिन रास्ते भर सोचता रहा कि कौन सा काम होगा जिसकी वजह से उसे इतनी ढेर सारी कॉमिक्स फ्री में पढ़ने को मिलेंगीं. खैर जो भी हो करने का निश्चय कर लिया उसने और अगले दिन नियत समय पर दुकान पर पहुँच गया.
''आ गया तू!! किसी ने देखा तो नहीं?''
''नहीं'' उसने सिर हिलाकर संक्षिप्त सा उत्तर दिया
''हम्म.. चल अन्दर वाले कमरे में''
थोड़ी देर खामोशी छाई रहने के बाद अन्दर वाले कमरे से आवाजें आ रहीं थीं- ''छिः अंकल ये गन्दा काम है.. मुझे घिन आती है''
''तुझे कॉमिक्स पढ़नी है या मैं किसी और को फ्री पढ़ाऊं?''
कुछ पल की खामोशी के बाद अब बल्लू फ्री में कॉमिक्स पढ़ने के नए ज़रिये के लिए राज़ी हो गया था.
दीपक 'मशाल'
 

शनिवार, 8 मई 2010

माँ------------------------>>>दीपक 'मशाल'


माँ दिवस पर 'अनुभूतियाँ' से एक कविता माँ के लिए...

माँ
आज भी तेरी बेबसी
मेरी आँखों में घूमती है
तेरे अपने अरमानों की ख़ुदकुशी
मेरी आँखों में घूमती है..

तूने भेदे सारे चक्रव्यूह
कौन्तेयपुत्र से अधिक
जबकि नहीं जानती थी 
निकलना बाहर
या शायद जानती थी 
पर नहीं निकली हमारी खातिर
अपनी नहीं अपनों की खातिर

ओस सी होती थी 
जो कभी होती तेरी नज़रों में नाराजगी
जो हमें छाया मिलती थी
वो तेरी छत्र के कारण थी

पर तू खुद तपती रही 
गलती रहीं माँ
क्योंकि तेरी अपनी छत्र
तेरे अपने ऊपर नहीं थी

इसलिए 
हाँ इसीलिए 
दुनिया की हर ऊंचाई
तेरे कदम चूमती है
माँ 
आज भी तेरी बेबसी
मेरी आँखों में घूमती है...
दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल से साभार

शुक्रवार, 7 मई 2010

आयरनमैन(लघुकथा)------------------>>>दीपक 'मशाल',

'तड़ाक... तड़ाक... तड़ाक...' तीन-चार तमाचों की तेज़ आवाज़ और गालियों के साथ किसी के गर्जन को सुन बरात के बीच से नन्हे  मुग्ध  का  ध्यान  अचानक  डांस से हटकर उस ओर चला गया. अपने दोनों गालों और कानों को अपने नन्हे हाथों और बाजुओं से ढंके उसका ही हमउम्र सा  (करीब ९-१०साल का) एक मैला-कुचैला  बच्चा सिहरा हुआ खड़ा था और हिचकियाँ ले रहा था. उस बच्चे के साथ ही खड़ा एक शक्तिशाली आदमी जो शायद लाइटहाउस का और उस बच्चे का मालिक लग रहा था, उसे लाल आँखों से घूरते हुए, अंट-शंट गालियाँ बके जा रहा था.
''हरामजादे.. अब इसका पैसा क्या तेरा बाप भरेगा आके? जब टांगों में जान नहीं तो क्यों आ जाते हो मरने? गमला उठाएंगे ये स्साले..''
बीच-बीच में कभी पतली फंटी को उसकी फटे-चीथड़े हाफ पेंट से कहने भर को ढँकी कमज़ोर टांगों पर फटकारता जाता, तो कभी उसके बाल पकड़ जोर से भभोंच देता. उन्माद में डूबे किसी बाराती ने उस आदमी को रोकने की कोशिश नहींकी.
लोगों की बातों से पता चला उस मजदूर बच्चे के हाथ से लाइट हाउस के गमले का एक ट्यूबलाइट टूट गया था.. वो भी शायद उसकी गलती नहीं थी बल्कि किसी बाराती के पैर में तार उलझ गया और अचानक तार में पैदा हुए खिंचाव से वो बेचारा गमला सम्हाल ना पाया.
उसकी निर्मम तरीके से पिटाई देख मुग्ध के मुँह से भी सिसकारी निकल गई. चलते-चलते, हँसते-गाते बारात लड़की वालों के दरवाजे पर पहुँच गई पर अब उसका अपने प्यारे चाचू की शादी में भी डांस करने का या कुछ खाने-पीने का मन नहीं कर रहा था. वो इसी सोच में उलझा था कि उस ट्यूबलाइट में ऐसा क्या था जो उस बच्चे को उसकी वजह से इतनी मार और गालियाँ खानी पडीं. जबकि उसकी खुद की तो तब भी इतनी डांट नहीं पड़ी थी जब उससे गलती से टी.वी. खराब हो गया था और पापा को फिर नया टेलीविजन ही खरीदना पड़ा था.. कुछ भी तो नहीं कहा गया था उससे सिवाय इतने प्यार से समझाने के कि- ''मुग्ध बेटा, आगे से अगर इसका कोई फंक्शन समझ ना आये तो किसी से पूछ लिया करना'' 
''जरूर कुछ और बात रही होगी.. शायद वो ट्यूब लाइट बहुत ही महंगा हो... लेकिन फिर इतनी मार खा के भी वो रोया क्यों नहीं?? हम्म्म्म समझा जरूर वो बच्चा आयरनमैन होगा''
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

बुधवार, 5 मई 2010

''लोग क्या कहेंगे?''(लघुकथा)-------------->>>दीपक 'मशाल'


'अ' एक लड़की थी और 'ब' एक लड़का. बचपन से ही दोनों के बीच एक स्वाभाविक आकर्षण था, जिसे बढ़ती उम्र और मेलजोल ने प्रेम के रूप में निखार दिया. दोनों साथ में पढ़ते, घूमते-फिरते, कॉलेज जाते और कला-संगीत के कार्यक्रमों में रुचियाँ लेते. एक दूसरे की रुचियों में समानताएं होने से प्यार सघन होता गया. उनके अटूट से दिखते प्रेम को देख लोगों के दिलों से निकली ईर्ष्या के उबलते ज़हर की गर्मी उनके आसपास के वातावरण को जितना उष्ण करती उनके प्रेम की शीतलता उन्हें उतना ही करीब ले आती.  
पढ़ाई ख़त्म होते-होते दोनों के परिवारवालों को अपने-अपने बच्चों की शादी की चिंता सताने लगी. ये तो याद नहीं पड़ता कि कौन, किससे,  कैसे और कितना ज्यादा अमीर था लेकिन दोनों के परिवारों के बीच के पद-प्रतिष्ठा, धन और शोहरत के इसी अंतर ने उनके प्रेम के पिटारे में झाँकने की ज़हमत ना उठाई, चारों तरफ सवाल उठे- ''लोग क्या कहेंगे?'' और अ या ब किसी एक के घरवालों ने उनके प्रेम को परिवार की इज्ज़त को डंस सकने वाले ज़हरीले नाग का खिताब दे उस पिटारे को वहीँ दफ़नाने का हुक्म सुना दिया. दोनों के रिश्ते अलग-अलग परिवारों में अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक कर दिए गए. किसी से कहे बगैर मन ही मन दोनों ने अपने-अपने बच्चों के साथ ऐसा ज़ुल्म ना करने की ठान नियति के आगे सर झुका दिया.

सालों बीत गए.. अ और ब दोनों ने अपनी मेहनत और लगन से समाज में अच्छा रुतबा, धन-दौलत और वो सब जिसके लिए लोग खपते हैं, कमा लिया. दोनों अलग-अलग शहर में थे एक दूसरे से अन्जान, अलबत्ता यादों में दोनों अभी भी एक-दूसरों को याद थे. अ का बेटा अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका था और अ उसकी शादी के लिए सुयोग्य लड़कियां ढूँढने लगी थी और उधर ब अपनी खूबसूरत और खूबसीरत बेटी के लिए भी यही सब उपक्रम करने लगा था. दोनों ने सोचा क्यों ना एक बार अपने-अपने बच्चों से जान लिया जाए कि कहीं उन्हें तो कोई पसंद नहीं. दोनों का सोचना सही निकला. इधर अ का बेटा एक लड़की से बेइन्तेहाँ मोहब्बत करता था और वो लड़की भी तो उधर दूसरी तरफ ब की बेटी को भी एक लड़के से प्रेम था. कहीं ना कहीं अ और ब की सी कहानी दोनों तरफ पनप रही थी.
अ ने अपने बेटे की प्रेमिका के बारे में कहीं से जानकारी जुटाई तो पता चला वो एक मॉडल थी.. लोगों ने बीच में मिर्च-मसाला लगा इस पेशे की बुराइयां गिनानी शुरू कर दीं- ''मैडम, आप तो जानती ही हैं इस पेशे में क्या-क्या उघाड़ना पड़ता है और क्या-क्या छुपाना पड़ता है.. अपनी इज्ज़त का कुछ तो ख्याल कीजिए. लोग क्या कहेंगे?''
उधर ब की बेटी को जो लड़का पसंद था उसके ना माँ का पता था ना बाप का.. अनाथालय में पला-बढ़ा था. लोगों ने यहाँ भी कहना शुरू किया, ''इंटेलिजेंट है तो उससे क्या? खानदान भी तो देखना पड़ता है कि नहीं? अगर इकलौती बेटी के लिए भी ढंग का खानदानी लड़का ना ढूंढ पाए तो लोग क्या कहेंगे?''

एक बार फिर दो अलग-अलग शहरों में दो प्रेम कहानियों का ''लोग क्या कहेंगे?'' के शोर के बीच क़त्ल कर दिया गया.. अब अ और ब की मर्जी के मुताबिक उनके बेटे-बेटियों की कहीं शादियाँ हो रही थीं. फिर शहनाइयों के बीच २५ साल पुराने 'अपने बच्चों के साथ ये ज़ुल्म ना होने देंगे' जैसे संकल्प दोहराए जा रहे थे.
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

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