सोमवार, 31 मार्च 2014

तीन नई कवितायें

1- सार्वभौमिक खालीपन/ दीपक मशाल

कोई असल में वो नहीं होता 
जो वो अक्सर दिख जाया करता है राह चलते
मुस्कुराते, खिलखिलाते
हाथ मिलाते गले लगाते
नहीं होता कोई वो
जो आसानी से
सामान्य अवस्था में रहता है

बल्कि कोई वो होता है
जिसकी झलक
वो दिखला जाता है कभी-कभार भावावेश में

अतिअनुकूल
और अतिप्रतिकूल परिस्थितिओं के दरमियान
धनात्मक और ऋणात्मक भावों के अधीन
खुद का प्रस्तुतीकरण ही
तय करता है
किसी की उच्चतम और निम्नतम सीमायेँ

जिनके बीच भटकते रहते हैं
करते रहते हैं दोलन
या पानी भरे टीन के डब्बे में
गंधक के टुकड़े सी गति से करते रहते हैं मिलान
हाँ वैसे ही
जैसे जाना जाता है किसी भी बर्तन का आकार
उसका नाम
उसकी सीमाओं से
वर्ना अंदर का खालीपन तो बाहर सा है
सबका एक सा है
बात बहुत पुरानी है
है हर बार नई पर
क्योंकि पीढ़ियाँ नई हैं और सीढ़ियाँ भी 
 
2-
नामौजूद प्रेम / दीपक मशाल

एक सुबह
सूरज लाल नहीं था
एक सुबह नीला नहीं था आकाश
नहीं था गुलाबी गुलाब
घास सादा थी
लाल बत्ती पर मुश्किल था फ़र्क़ करना
बीच लाल और हरे के.…
एक सुबह सारे पोस्टर
हो रखे थे श्वेत श्याम
कुल मिलाकर उस सुबह में रंग नहीं थे
एक सुबह
नहीं बजा अलार्म
नहीं रँभाई गायें ना मिमियाईं बकरियाँ
नहीं टनटनाईं साइकिलों की घंटियाँ
कूड़े दूध और अखबार वाले गूँगे रहे
नहीं सुनाई दिए मोटरों के हॉर्न
पायलों-रुनकों की छनक
बर्तनों की खनक
एक सुबह खामोश रही बच्चों की खिलखिलाहट
कुल मिलाकर उस सुबह में आवाज़ नहीं थी
एक सुबह
फीकी थी चाय 
कॉफी थी पानी सी
आमों में मिठास गायब थी
पराठों-आम्लेटों नमकीनों में नहीं था नमक
सैंडविच ब्रेड या पाव भी रोज से न थे
और न मसाले
मिर्च तीखी नहीं थी
एक सुबह करेले तक कड़वे न थे
कुल मिलाकर उस सुबह में स्वाद नहीं था
एक सुबह
बेला-चमेली में खुश्बू नहीं थी
न धूप-अगरबत्ती में
न केसर ना केवड़े में
न साबुन शैम्पू में
ना ही इत्र या परफ्यूम में सुगंध थी
जलेबियों से मीठी गंध नहीं उठी
बासमती में नहीं मिला सोंधापन
एक सुबह दिखा हवा में कुँवारापन
कुल मिलाकर उस सुबह में महक नहीं थी

एक सुबह 
स्पर्श-स्पर्श नहीं था
चाय गर्म नहीं पानी में ठंडापन नहीं
ना लगी कमीजों में ढँक लेने जैसी बात
घर और बाहर तापमान एक था
नहीं थी मुस्कान में ताज़गी
न आलिंगन में ऊष्मा 
न चुम्बन में सिहरन
न भय में कँपकँपी
कुल मिलाकर उस सुबह में एहसास नहीं था

सच कहें तो वो सुबह सुबह नहीं थी
उसमे सुबह जैसा कुछ नहीं था
क्योंकि उस सुबह प्रेम नामौजूद था
बीती रात नफरतों ने घेरकर क़त्ल कर दिया था उसका
डर जाता हूँ सोचते हुए
क्या हो जो
दुनिया की हर रात होने लगे ठीक ऐसी ही काली  
 
3- अनुभवों की सड़क पर / दीपक मशाल
जो मैं कहूँ
कि मेरे जैसे हो तुम
तो तनिक तो डर जाओ

जान लो कि उस दौर से गुज़रा हूँ
जिस में जी रहे हो अभी तुम
मान लो कि तुम्हारी हर मुस्कान समझता हूँ
सब नहीं मगर
कई गम जानता हूँ
मैं ढला किसी में
तुम भी मुझमे ढलोगे
याद रखना
किसी भी दिन
दो बार लाल होता है सूरज
वक़्त एक फैशन है
जो लौट-लौट आता है
ज़रा सा फेरबदल लेकर
एक सी हैं कहानियाँ सभी की
एक से रिश्ते लिए
बस किरदार बदले हैं
या कभी नाम बदले हैं कहीं
और सबकी जिंदगी के
एक से हैं पर्दें
भले रंग अलग हों
अलग सी हों छाप लिए

जानता हूँ नहीं समझोगे तुम फिर भी
मैं ही कौन सा समझा था
सुनकर ये सब किसी और से

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

समय और नीरो की बंसी/ दीपक मशाल

समय बिगबैंग का एक उत्पाद 
शेष सभी उत्पत्तियों को 
जकड़ लिया जिसने अपने बाहुपाश में 
जिसकी देखरेख में पनपीं कितनी उत्पत्तियाँ 
आकाशगंगायें 
सूर्य तारे सितारे 
ग्रह उपग्रह 
सबने समय की अंगुली पकड़ 
सीखा चलना दौड़ना
धुरी पर घूमना 
फेरे लगाना  
भभक कर मिट जाना 
विखंडित होकर अपने अंश से करना नवसृजन 
 
जन्मे जीवन
संघ उपसंघ 
समुदाय उपसमुदाय  
पादप-जंतु 
जातियाँ, उपजातियाँ उपउपजातियाँ 
धर्म और विरादरियाँ 
बोध अकड़ मान सम्मान अपमान के 
करते हुए विकास 

विकास 
जो है उस मुहाने पर बने 
विनाश के मकान की गली का नाम 
विकास एक खूबसूरत झाँसा
जिसका उच्चतम शिखर उस पहाड़ की चोटी 
जिसकी दूसरी तरफ उजाड़ विनाश 
जिस तक पहुँचकर फिसलना है एक तयशुदा प्रोटोकॉल   

वो समय जो नहीं रुकता किसी स्टेशन पर 
चढ़ते-उतरते रहते हैं जिसके गोल चक्के पर जीवन 
कच्ची सड़क की गीली मिट्टी की तरह 

धागे से दो छोर लिए जीवन  
जिसे घिसता रहता है ये समय ओर से छोर तक  

समय नहीं सम्बन्धी 
फिर भी है सम्बंधित जान-बेजान से 
निर्मम निर्मोही बन नाता तोड़ता है 
जैसे तोड़ा डायनासोरित्व को 

खिलखिलाओ कि फिलहाल ये समय 
पाल-पोस रहा है मनुष्य को 

एक दिन या एक रात 
समय के ही किसी किनारे पर 
हमारे बारे में पूर्वाभास कर विलाप करेगी बैंसी 
समय नीरो की तरह फिर से चैन की बंसी बजा रहा होगा 
 

बुधवार, 22 जनवरी 2014

दो लघुकथा और तीन कवितायें

ठेस / दीपक मशाल 
- फ़िल्म तो अच्छी थी लेकिन इस एक्टर के बजाय किसी मस्क्युलर हीरो को लेते तो ये और बड़ी हिट होती 
शो ख़त्म होने पर सिने कॉम्प्लेक्स का एग्जिट गेट धकेलकर बाहर निकलते हुए प्रेमी ने प्रेमिका पर अपना फ़िल्मी ज्ञान झाड़ा 
- हम्म, हो सकता है 
प्रेमिका ने धीरे से कहा 
- क्या हुआ तुम इतनी चुप क्यों हो?
प्रेमिका की उँगलियों में उँगलियाँ डाल उसका हाथ थामे लड़के ने शिकंजा कसते हुए पूछा 
- नहीं हुआ कुछ नहीं समीर, बस तुम्हें बताना था कि अगले एक-दो हफ़्तों के लिए तुम्हें कहीं किसी दोस्त के यहाँ शिफ्ट करना होगा
- अरे ये क्या बात हुई 
दोनों के हाथ छूट चुके थे 
- समझा कर यार, सुबह पापा का फोन आया था। परसों वो किसी काम के सिलसिले में यहाँ आ रहे हैं, इसी बहाने मेरे साथ रहेंगे और शहर भी घूम लेंगे। मैं नहीं चाहती कि घर वाले जानें कि मैं लिव-इन में रहती हूँ
- ऐसे कैसे विधि! चार दिन बाद तो वैलेंटाइन्स डे है 
लड़का परेशान हो उठा और उसने तंज मारा
- तुम तो कहती थीं कि तुम्हारी फैमिली बड़ी ब्रॉडमाइंडेड है, तुम्हारे मम्मी-पापा ने भी तो लव मैरिज की है? फिर दिक्क़त क्या है यार, उन्हें बता दो ना 
- समीर मैं तुम्हें सिर्फ एक महीने से जानती हूँ, अभी हमें एक दूसरे को जानने को कुछ और वक़्त चाहिए और अगर पापा मेरे किसी फैसले में दीवार नहीं बनते तो इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं मर्यादा का पर्दा भी गिरा दूँ। 
लड़का फिर हँसने लगा और प्यार से बोला 
-  तुम भी अजीब हो सुमी, एक तरफ़ मॉडर्न बनती हो और दूसरी तरफ़ मर्यादा की बात करती हो, फिर प्यार तो एक नज़र में होता है 
- अच्छा! तो इसका मतलब अगर तुम्हारी बहिन तुमसे अपने लिव-इन रिलेशन के बारे में बताये तो तुम खुशी-खुशी मान जाओगे?
- सुमी!!!
समीर भीड़ की परवाह किए बिना चीख पड़ा और इस बार आवाज़ में प्यार नहीं गुस्सा था, ठीक वही गुस्सा जो ठेस से उपजता है। 

अच्छा सौदा/ दीपक मशाल 
क्रिसमस के अगले दिन आज बॉक्सिंग डे सेल का दिन होने की वजह से बाज़ार की रौनक देखने लायक थी, हर कोई दुम में रॉकेट लगाए भाग रहा था। लगता था मानो ज़रा सी देर हुई नहीं कि दुनिया का आखिरी सामान बिक चुका होगा और उनके हिस्से कुछ ना आएगा। 
सिटी सेंटर के पास की संकरी गली के अन्दर बने कपड़ों के जिस छोटे से शो-रूम में आम दिनों में इक्का-दुक्का ग्राहक ही जाते थे, आज की सुबह उसकी भी किस्मत जागी थी। शो-रूम के भीतर कई जगह बड़े-बड़े और मोटे अंग्रेज़ी अक्षरों में 'सेल में बिका हुआ माल ना वापस होगा और ना ही बदला जाएगा' की उद्घोषणा करते पम्पलेट चिपकाए गए थे। शायद यह वाक्य ही दुकान के कपड़ों की क्वालिटी का साक्षी बना हुआ था जिसका नतीजा यह हुआ कि सुबह के दस बजते-बजते एक को छोड़कर शो-रूम में टँगे बाकी सभी कोट बिक चुके थे। तभी एक के बाद एक दो नवयुवक शोरूम में घुसे और सीधे कोट सेक्शन की ओर बढ़ गए. उनमे से एक थोड़ा तेज़ निकला, उसने कोट हैंगर समेत निकाला और ट्रायल-रूम की तरफ बढ़ गया। दूसरे को देखकर लगता था कि वह भी अगले ही पल उसी कोट को देखने वाला था। खैर पहले नवयुवक को वह कोट पहनकर देखने पर बिलकुल फिट आया। उसने सेल में आधी कीमत में मिल रहे उस कोट का काउंटर पर भुगतान किया और बाहर आ गया। वह खुश था कि उसने बढ़िया सौदा किया, उसे अपने पसंदीदा रंग और डिजाइन का कोट इतने सस्ते में मिल गया। 
कोट की तरफ बढ़ने वाला दूसरा नवयुवक मन मसोस कर रह गया, उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों वह ज़रा सी देर से रह गया। उसे गुस्सा इस बात पर भी था कि वह आज सुबह जल्दी सोकर क्यों ना उठा। अगर वह उठ गया होता तो इतना अच्छा सौदा उसके हाथ से ना निकलता. इस वक़्त उसे लग रहा था जैसे कोहिनूर हीरा उसके हाथ से फिसल किसी और की झोली में जा गिरा हो। 
दुकान मालिक खुश था कि आठ महीने से दुकान में पड़ा वह पुराना कोट आखिरकार सही कीमत में बिक गया वर्ना दोपहर बाद वह उस कोट की कीमत और भी कम करने की सोच रहा था। मगर अब तो उसे लागत निकलने के अलावा कुछ फायदा भी हो गया था, अच्छा सौदा रहा। 
दुकान के सेल्स-मैन के चेहरे पर भी इस सौदे से खुशी झलक रही थी क्योंकि कल रात की क्रिसमस पार्टी में वह यही बिक चुका कोट पहन कर गया था जहाँ किसी से टकराने से रेड वाइन से भरा पैग उस कोट पर गिर गया था, लेकिन गहरे रंग का होने की वजह से उस पर पड़ा दाग ग्राहक की नज़र में ना आया और वह मालिक की डाँट खाने व खुद कोट का भुगतान करने से बच गया। 

१- चाबुक / दीपक मशाल 

नए समय की 
आंदोलनकारी औरतों की नई खेप
मुड़कर देखेगी पुरानी फ़िल्में 

देखेगी उनमें
सास की फटकार सुनतीं 
खाली पेट बर्तन माँजतीं आदर्श बहुएं
जीवन के विशेषतम लक्ष्य शादी के 
न हो पाने की दशा में कलपतीं नायिकाऐं 
'दुल्हन बनतीं हैं.…  नसीबोंवालियाँ' गाती हुईं

विधवा हो दर-दर भटकतीं 
कपास की फूल बनीं 
लालाओं के क़र्ज़ तले दबीं
गिरवीं और गहनों में अनुप्रास स्थापित करतीं 
घसीटी-खसोटी-नोचीं जातीं 
पुरुषों से भरी महफ़िल में नाचने को होतीं मजबूर 

या बदबू से महकते मुँहवालों के हाथों 
रोज शाम होतीं प्रताड़ित  

उनका हुआ ये शोषण न कर पाएगी बर्दाश्त
वो नई खेप 
मुँह मोड़ेगी सेंसर की कैंची का 
भूत में जाने के लिए  

उनके अगुआ करेंगे भर्त्सना 
उन गुजर चुके बदचलन 'रिवाजों' की 
उन अभिनेताओं, निर्माताओं-निर्देशकों, दर्शकों को 
किया जाएगा कठघरे में खड़ा 
जिनके या तो पैर होंगे कब्र में 
या समूचे ही कब्र में होंगे  

नेत्रियाँ गरियाएंगी उन कलमों को  
जिन्होंने उकेरे ऐसे चरित्र 

और मानेंगीं दोषी 
उस दुर्दशा के लिए पुरुष को 

पुरुष जो है 
जो आज है 
जो अभी है 
जो सामने खड़ा होगा 
जो प्रायश्चित करता पाया जाएगा 
वो सजा का हक़दार होगा 

रची जायेगी पुरुष की परिभाषा 
किसी महाखलनायक की तस्वीर सामने रखकर 

वो ज़ुल्म वो क़हर बरपाने वाला 
सितम ढाने वाला पुरुष 
सोते हुए मुस्कुरा रहा होगा कहीं 

कलेजे में ठंडक के वास्ते 
चाबुक वाले हाथ बदलेंगे 
कठोर से कोमल होंगे 
छिलने वाली पीठें बदलेंगीं
मुलायम की जगह मोटी खालों वालीं 

सब होगा 
बजाय उस चाबुक पर मिट्टी का तेल छिड़क 
उसे जलती दियासलाई दिखाने के 
  
भड़याई का दौर/ दीपक मशाल 

नामी उतरनें पहन 
पुरस्कारों के किलों की 
दीवारों पर 
चढ़तीं कवितायें 
महलों में सेंध लगातीं 
लाँघती खाइयाँ रिश्तों की बिना पर 

टाट पर लिखी कवितायें 
लिपटना चाहतीं मखमल में
अलमुनियम के कटोरों की नमी के ऐवज में
सोने की थालियाँ चाहतीं

ढूँढतीं अखबारों में
ख़बरों को अपनी मोटी दीवारों के बीच पीसते
दर्द के बदले दवा के एक्सचेंज ऑफर

नया युग न रीमिक्स का
न पैरोडी का
कवितायें अब सीधे चोरी देखतीं
अंधेरों में अंधेर करतीं
उठातीं फायदा अंधेरों का
भड़याई के दौर से गुजरतीं

दिन आयेंगे
खंजर की नोंक पर
इनकी डकैतियों के भी जल्द

लाठियों और भैंसों के मुहावरों की
चर्चा वाली रातों की जगवार होगी

जल्द नाम कमाने के आकुर्त के तिलिस्म
क्या इसी ज़माने में हुए पैदा
या निकलते रहते हैं वक़्त-बेवक़्त के हाइबरनेशन से 

३- विचार की फ्रेज़ाइलगी 

विचार कितने फ्रेजाइल हो तुम 
पल के हज़ारवें हिस्से में होकर विलीन 
सुदूर ब्रह्माण्ड की किसी दूसरी आकाशगंगा में 
के  समा जाते हो समुद्र की भँवर में 

या कहीं नहीं बस यहीं 
दिमाग के अथाह डस्टबिन में 
नहीं पता 
कुछ भी नहीं पता 
बस कयास हैं सारे



मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

शहर में भेड़िया, बंदियों की बीवियाँ/ दीपक मशाल कवितायें

दो कवितायें

१- शहर में भेड़िया / दीपक मशाल

अनुभव नया था
एक जीते-जागते भेड़िये को देखना
और देखना क़रीब से
जिज्ञासा से
फिर छूकर
मुँह खुलवाकर जानना उसके दाँतों का पैनापन
उसके बालों को सहलाकर
उसके साथ तस्वीर खिंचवा कर देखना

हज़ार साल पुराना रूप धरे वो मेला
तम्बुओं में बिकती
उसके जैसे दूसरे भेड़ियों की खाल
वहीं सहमा हुआ सशंकित जानवर
बार-बार हैरतभरी निगाहों से देखता
हाँडियों में पकती मल्ड वाइन
हांडियों के नीचे जलती आग

दिमाग के गर्तों-उभारों में उतरता-चढ़ता सवाल
सबूत के कन्धों पे चढ़ हल निकालने की कोशिश में संलग्न
पर रहता विफल

आखिर तक मन खुद से पूछता
खूनी या बलात्कारी
क्रूर अपराधी इंसान
क्यों कहा जाता भेड़िया
आखिर कितने प्रतिशत मिलती है उसकी जीन संरचना

लगा
शायद खूँखार भेड़िया शांत था
इसलिए कि शहर में था
इंसानों के बीच में

अच्छा है कि पाये जाते हैं ज्यादातर इंसान शहरों में
अच्छा है
जंगल के लिए
जानवर के लिए
और दुनिया बची रहने के लिए
 

 २- बंदियों की बीवियाँ/ दीपक मशाल


आधी बंदी होती हैं
बंदियों की बीवियाँ
हीलियम भरे गुब्बारे की तरह
जो एक सिरे से बंधा होता है किसी वजनी पत्थर से
या पर कतरे कबूतरों सी

दिनचर्या का हिस्सा होता है
कारागार की बाहरी दीवारों से टेक लेना
दुनिया की लानतें सुनना
मलानतें झेलना
अनकिये अपराध के लिए

बन जाती हैं बंदियों से कहीं ज्यादा उत्तरदायी
उनसे ज्यादा ताने सुनतीं
बंदियों की बीवियाँ

ज्यों उन्होंने ही कतरी हो जेब
लगाईं हो सेंध
चलाया हो छुरा
झपटी हो चेन
दिखाई हो दबंगई
किया हो बलात्कार
बहाया हो लहू

अकेलेपन से लड़ती
एकला स्त्री को शापित अपराधों की नज़र से
खुद को बचाती
आज से, समाज से बहिष्कृत
अपनों की ही आँखों में कील होती है

और अपरिमाणित सूखे आँसुओं को
नमी पाने की लालसा लिए
जब पहुँचती हैं सींखचों के पार खड़े
उन दर्दों के स्रोत के पास
तो जेल के भीतर की तक़लीफ़ों को
पूरा सुन पाने से पहले ही
मिलने की अवधि ख़त्म हो चुकी होती है

और वह हर बार
यह बताने से रह जाती हैं महरूम
कि जेल के भीतर रहना तब भी आसान है

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