रविवार, 30 मई 2010

छमिया(लघुकथा)---------------------->>>दीपक 'मशाल'


नए शहर में पहले दिन बाज़ार से कुछ खरीदने गई थी रमा.... कि तेज धूप में अचानक सड़क पर गिरते उस लड़के को देख वो भी अपनी स्कूटी ले उसकी तरफ बढ़ गई. १०-१२ लोग लड़के को घेर कर खड़े हो गए, मगर सभी उसे देख केवल उसकी बीमारी के बारे में कयास लगाए जा रहे थे.... कोई उसको हस्पताल पहुँचाने को राजी ना था. उसका मन उन इंसानी मशीनों को देख नफरत से भर आया.
शॉपिंग का विचार छोड़ एक साइकिल वाले की मदद से सड़क पर पड़े उस अधबेहोश लड़के को उसने किसी तरह अपनी स्कूटी पर बिठाया और धीरे-धीरे स्कूटी चलाते हुए उसे पास के एक क्लीनिक तक ले गई.
डॉक्टर ने ग्लूकोज की बोतल चढ़ाई और कमजोरी बता कर कुछ टोनिक और हफ्ते भर का आराम लिख दिया.
थोड़ी देर में जब लड़के को होश आया तो डॉक्टर का शुक्रिया अदा करने लगा. तब डॉक्टर ने ही बताया कि रमा ही उसे वहाँ लेकर आयी थी.
''बहुत-बहुत धन्यवाद रमा जी.. मैं आपका अहसान कभी नहीं भूल सकता, आपका जो पूरा दिन ख़राब किया वो तो नहीं लौटा सकता पर अभी घर पहुँच कर जो भी खर्च हुआ वो आपको देता हूँ...'' आभार प्रकट करते हुए उसने कहा
''अरे नहीं.. उसकी कोई जरूरत नहीं है, आखिर इंसान ही इंसान के काम आता है'' रमा ने विनम्रता से कहा
''वैसे मेरा नाम समीर है और यहाँ से थोड़ी दूर राईट हैण्ड पर जो नारायण कॉलोनी पड़ती है ना.. बस उसी के ब्लॉक-सी में रहता हूँ.. पता नहीं कैसे अचानक चक्कर आ गया. शायद सुबह घर से कुछ खा-पीकर  नहीं निकला और आज धूप भी तेज़ थी इसलिए..''
''अरे वाह.. मैंने भी उसी कॉलोनी के ब्लॉक-बी में फ़्लैट लिया है, चलिए फिर आपको घर भी छोड़ देती हूँ..'' रमा ने कहा तो समीर मना ना कर पाया.

३ दिन बाद रमा को ब्लॉक-सी में कुछ काम था तो सोचा 'यहाँ तक आई हूँ तो समीर का हाल लेती चलूँ'. रास्ते से कुछ फल लेकर उसके घर पहुँची और उसका हाल-चाल लेकर वापस जाने के लिए जैसे ही स्कूटी स्टार्ट करने लगी कि घर से थोड़ी दूर खड़े ३ लड़कों की फुसफुसाहट ने उसके कान खड़े कर दिए..
''ओये देख.. समीर की 'छमिया' '' एक बोला
''ओये रहिन दे, फेंक मत'' दूसरा बोला. पहले ने विश्वास दिलाते हुए कहा,''हाँ बे कसम से.. समीर भाई ने ही बताया.. यही तो उस दिन उनको हस्पताल से लाई थी, कहते थे बड़ा मज़ा आया चिपक के बैठने में''
अब तीसरा कैसे चुप रहता,''हायssssss... उस दिन मैं क्यों ना गिरा सड़क पर..''
गुस्से से भरी रमा स्कूटी स्टार्ट कर चुपचाप वहाँ से निकल गई.
आज फिर कहीं जाते हुए रमा ने किसी आदमी का एक्सिडेंट होते देखा.. पर अबकी उसकी स्कूटी नहीं रुकी.
दीपक 'मशाल'
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चित्र साभार गूगल से 
         
 

गुरुवार, 27 मई 2010

बड़ा आदमी(लघुकथा)----------------------------------->>>दीपक 'मशाल'


मुजीब ढाबे से चाय पीने के बाद लौट कर अपने ट्रक पर आया, गाना चालू किया और एक बार फिर ट्रक को पुणे की तरफ दौड़ा दिया.. थोड़ी देर बाद जैसे ही दो गानों के बीच गैप आता, उसे ऐसा लगता कि ट्रक में कोई दूसरा भी है उसने इधर-उधर देखा तो कोई दिखाई ना दिया. अपने मन का वहम समझ वह आगे बढ़ता गया, अब यहाँ अकेले में पूछता भी तो किससे? अरे हाँ अकेले इसलिए कि पिछले हफ्ते ही उसका क्लींज़र हैजे की चपेट में आ दुनिया छोड़ गया था और अभी तक उसे कोई नया क्लींज़र नहीं मिला था. पर माल की डिलीवरी टाइम से देनी थी इसलिए उसे अकेले आना ही पड़ा.
लेकिन जब कई बार उसे ऐसा लगा कि कोई ट्रक में है जो सिसक रहा है तो जाने क्या सोच वो पसीना-पसीना हो गया. पर फिर भी हिम्मत कर उसने ट्रक सड़क से एक साइड में लगाया और अन्दर अच्छे से चेक करने लगा.
वो गलत नहीं था असल में उसकी ड्राइविंग सीट के पीछे एक १४-१५ साल का लड़का एकदम कोने में दुबका सिसक रहा था.
पहले तो काफी देर तक पूछताछ करने पर कुछ नहीं बोला पर जब-
''बताता है अपना नाम और पता या लेके चलूँ तुझे पुलिस थाने में?'' उसने सख्ती से पूछा
फटेहाल सा वो लड़का अचानक बहुत जोरों से रोने लगा, ''मुझे थाने मत ले जाइए मैं सब बता दूंगा.. लेकिन आप किसी से कहना नहीं. वर्ना वो मुझे फिर पकड़ ले जायेंगे और पीटेंगे.''
मुजीब को उसकी हालात पर कुछ तरस आया,
''ठीक है नहीं ले चलूँगा लेकिन कौन पकड़ कर ले जायेंगे? कोई चोर-वोर तो नहीं? तू किस मकसद से मेरे ट्रक में चढ़ा? या कहीं से भाग कर आया है?' उसने ताबड़तोड़ सवाल कर दिए '
''हाँ साब, मेरा मालिक मेरे गाँव से बापू से ये कह कर अपने साथ ले आया था कि मुझे नौकरी पर रखेगा, अच्छी तनख्वाह देगा और पढ़ायेगा भी.. लेकिन...'' कहकर लड़का फिर सिसकने लगा
''लेकिन क्या...''
''बापू ने कहा था कि वो बड़ा आदमी है मेरी जिन्दगी सुधार देगा लेकिन वो यहाँ लाकर मुझसे दिन-रात सिर्फ काम कराता है, खाना भी ढंग से नहीं देता और कुछ कहने पर लात-घूंसों से पीटता है.. मैंने भाग कर शहर में लोगों से उसकी शिकायत करने की कोशिश की पर वो एक इंजीनियर है और उसको सब जानते हैं तो किसी ने मेरी बात नहीं सुनी और मुझे फिर से उसी के पास पहुंचा दिया''
लड़का अब कुछ निर्भीक सा होकर बोलता जा रहा था, ''घर पहुँच कर उस रात मेरी डंडे से बुरी तरह से पिटाई की गई, पीठ पर निशान पड़ गए और अभी भी नील पड़े हैं..''
कहते हुए वो मुजीब की तरफ पीठ कर अपनी कमीज़ ऊपर उठा निशाँ दिखाने लगा.
मुजीब से सहानुभूति और पुलिस को ना सौंपने का आश्वासन पा लड़का कुछ और सहज हो चला था. अगले ढाबे पर चाय पिलाते हुए उसने लड़के से पूछा-
''नाम क्या है तुम्हारा?''
''नाम राजेन्द्र है.. पर सब राजू-राजू कहते हैं'' जवाब मिला
''राजू-राजू या राजू'' उसने मसखरी की
चाय के गिलास में जल्दी-जल्दी डबलरोटी डुबो कर खा रहे सुबह से भूखे राजू के होठों पर मुस्कान तैर गई और उसने हँसते हुए कहा, '' राजू.. इसी रास्ते पर सौ किलो मीटर आगे मेरा गाँव है 'पनरिया' ''
मुजीब ने उसे समझाया, ''हम्म... देखो बेटा मैं कोई बड़ा आदमी तो हूँ नहीं जो तुम्हें नौकरी पर रख सकूं या पढ़ा सकूं लेकिन हाँ मैं तुम्हें तुम्हारे गाँव छोड़ दूंगा, तुम्हारे बापू के पास... ठीक है?''
राजू चुपचाप सिर नीचे किये चाय के गिलास को तके जा रहा था और बड़े आदमी का मतलब समझने की कोशिश कर रहा था.
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से  

बुधवार, 26 मई 2010

त्रिवेणी और एक कविता---------------->>>दीपक 'मशाल'



पहली बार गुलज़ार साब द्वारा विकसित विधा 'त्रिवेणी' लिखने की कोशिश की है, ज्यादा नहीं पता इसके बारे में इसलिए आपकी अमूल्य राय अपेक्षित है(इसको भ्रष्टाचार से जोड़ कर देखिएगा)... कई लोग आजकल मेरी लघुकथाओं से ऊब से गए हैं इसलिए आज लघुकथा से ब्रेक लेकर ये कल ही लिखी गई एकदम ताज़ी, जिहन के तंदूर से निकली कविता आपके सामने रखता हूँ.. जिसमे कि किसी व्यक्ति के जीवन के उस मोड़ के बारे में लिखा गया है जब वो संतृप्त हो जाता है.. और हाँ अगर आप लोग चाहें तो अभी भी १८ लघुकथाएं शेष हैं आपकी नज़र में लाने के लिए :) बताएं जरूर लाऊं कि नहीं ?????

१- 
अब ख्वाब भी हो गए हैं रेवड़ियों की तरह
जो हर निंदिया की झोली में नहीं गिरते

चलो अबकी किसी पहिचानवाले से बंटवाए जाएँ.

२-
जाने कोई ख्वाहिश नहीं बची क्या अब
क्यों ख्वाब नहीं आते वर्ना
या कि वो....  वो सब सांचे टूट गए
जिनमें दिमाग की सोच ढलकर बन जाती थी सपने

अब खुली आँखों से भी तो नहीं दिखती मंजिल कोई
न बरबस ये हाथ ही बनाने लगते हैं कोई तस्वीर
नाखून भी तो नहीं मचलते
इस कलई वाली दीवार पर कुछ-कुछ उकेरने को

आज संदेशा आया है कि इस बार साल का
सबसे बड़ा सम्मान मेरे नाम हो गया
और अभी कुछ दिन पहले
वो चला गया दुनिया से
जिसे लोग सूरज कहते थे
और मुझे सूरजमुखी

न तो उस दिन कतरा-कतरा करके
बहते दिखा दरिया दृग से कोई
न आज है सारंगी सी बज रही दिल में

अब क्या आँखों को पलकों की चादर ओढ़ा
पूछना चाहिए खुद से ये सवाल
कि ''क्या मैं बुद्ध हो गया हूँ...''
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से 

रविवार, 23 मई 2010

दाग अच्छे हैं(लघुकथा)-------------------------------->>>दीपक 'मशाल'


''निकल बाहर यहाँ से... बदतमीज़ कहीं का..'' बरसाती गंदे पानी से सनी चप्पलें पहिनें कल्लू को अपने घर में अन्दर घुसते देख शोभा आंटी ने अचानक काली रूप धारण कर लिया और उसकी कनपटी पर एक तमाचा जमाते हुए उसे घर से बाहर निकाल दिया.
''रमाबाई तुमसे कितनी बार मना किया है कि अपनी संतानों को यहाँ मत लाया करो.. सारा धुला-पुंछा घर जंगल बना देते हैं..''
आंटी ने अपनी कामवाली बाई को डांटते हुए कहा.
''आगे से नईं लाऊँगी मेमसाब.. मैं लाती नहीं पर क्या करुँ ये छोटा वाला मेरे पीछे-पीछे लगा रहता है..'' अपनी आँख में भर आये पानी को रोकते हुए घर के बाहर खड़े होकर कनपटी सहलाते कल्लू की तरफ देख बेबस रमाबाई बोली. 
रमाबाई ने चुपचाप पोंछा लेकर पायदान के पास बने कल्लू के तीनों पदचिन्हों को मिटा दिया.
थोड़ी देर बाद आंटी का बेटा प्रसून स्कूल बस से निकल कीचड़ में जूते छप-छप करते घर में घुसा तो उसे देख आंटी का वात्सल्य भाव जाग उठा, 
''हाय रे कितना बदमाश हो गया मेरा बच्चा!!!'' और प्रसून को सीने से लगा लिया..
''सॉरी मम्मी फर्श गन्दा हो गया'' प्रसून ने ड्राइंग रूम के बीच में पहुँच कर मासूमियत से कहा 
शोभा आंटी उसकी स्कूलड्रेस उतारते हुए बोलीं, ''कोई बात नहीं बेटा 'दाग अच्छे हैं' है ना??? अभी बाई फर्श साफ़ कर देगी डोंट वरी''
बाहर खड़ा कल्लू गंदे पानी से भीगी अपनी चप्पलें प्रसून के कीचड़ सने जूतों से मिला रहा था. 
दीपक 'मशाल' 
चित्र साभार गूगल से      

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