शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

बेलफास्ट(यू.के.) में पहले हिन्दी कवि सम्मलेन की झलकियाँ और अन्य तस्वीरें-------->>>दीपक मशाल

आज सोच रहा था कि जैसा आपसे कल कहा था कल रात के कवि-सम्मलेन की रिपोर्ट दे दूँ आपको.. लेकिन लगता है कि आज शाम से पहले समय नहीं मिल पायेगा.. तब तक कवि सम्मलेन की झलकियाँ और अन्य तस्वीरें देखिएगा... महेंद्र अजनबी जी और गजेन्द्र सोलंकी जी के कारण आपके इस अनुज को भी साथ में कविता पाठ का मौका मिला, वहाँ तो नहीं कह पाया लेकिन यहाँ उनका आभार प्रकट करता हूँ... :)
अगर आप सुन्दर तस्वीरें देखने के शौक़ीन हैं तो तस्वीरों पर चटका करके उन्हें बड़ा करके देखिएगा.. बन्दे की हौसलाअफजाई होगी और आपकी ज़रा सी मेहनत..
बुश मिल्स, बेलफास्ट.. (आपने बुश मिल्स व्हिस्की
का नाम  तो सुना  ही होगा...  इसी जगह बनती है)
जाइंट कॉजवे, उत्तरी आयरलैंड(यू.के.)
यूँ ही जाइंट कॉजवे के प्रवेश द्वार के बाहर से लिया 
ये भी बाहर से ही लिया 
अब थोड़ा और अन्दर की ओर बढ़े जाइंट कॉजवे
के विश्व प्रसिद्द षटकोणीय पत्थर देखने 
और नज़दीक पहुंचे 
रास्ते से ऊपर की तरफ देखा 
पहुँच गए.. हुर्रे...
अब उनके बिलकुल करीब से 
उन्हीं के ऊपर बैठ कर कुछ आगे की तस्वीर ली 
अगल-बगल की 
थोड़ा सा आगे की 
पत्थरों का आकार दिखाने
के लिए अपने पैरों के नीचे की
भी तस्वीर ले ली भाई..
दूसरी तरफ जाते वक़्त एक और उतार ली.. :)
महेंद्र अजनबी जी(दिल्ली) और
शशि तिवारी जी(आगरा) के साथ 
कवि सम्मलेन प्रारंभ होने से कुछ क्षण पहले
बाएँ से दाएँ- गजेन्द्र सोलंकी जी, महेंद्र अजनबी जी,
तीन बार के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष(उत्तर प्रदेश)
और कार्यक्रम के भी अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी जी,
रामेन्द्र त्रिपाठी जी, शशि तिवारी जी, शिवरंजनी जी..
हो गई शुरुआत..
अंत में लोर्ड राणा और लेडी राणा कवियों से मिलती हुईं
सबसे बाएँ यहाँ के आई.सी.सी.(इंडियन कम्युनिटी
सेंटर) के प्रमुख और कार्यक्रम के आयोजक अशोक शर्मा जी 
रामेन्द्र जी के साथ 
केशरी नाथ जी को कई लोगों ने घेर रखा था
फिर भी अच्छा लगा कि उन्होंने इस बन्दे
की कविता के बारे में बात की..
सभी कवि और ये अनाड़ी
इंटरप्रेंयोर लोर्ड और लेडी राणा के साथ  
भाई गजेन्द्र जी शादीशुदा नहीं इसलिए
सोने  और कविता पढ़ने के अलावा बाकी टाइम
फोन पर बतियाते रहते हैं किसी से.. :)
दीपक मशाल

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

वो निगहबान हो तो बात बने-------->>>दीपक मशाल

ऐसे ही सरे राह चलते कुछ पंक्तियाँ मन में आगईं तो उन्हें मन में दबाया ना गया.. हिन्दुस्तान के गरीबों का सा हस्र ना किया गया उनका मुझसे.. लेकिन आखिरी पंक्तियाँ समझ नहीं आयीं कि कौन सी बेहतर रहेंगीं इसलिए जो २ शेर टाइप कुछ समझ में आये वो लिख दिए.. अब उन दोनों में से जो बेहतर आपको लगे सुझाने की तकलीफ उठाइएगा उस्ताद...
अगर दोनों में से कोई ठीक ना लगे तो अपनी तरफ से कुछ बनाइये.. उम्मीद है निराश नहीं करेंगे..


वो निगहबान हो तो बात बने
वो मेहरबान हो तो बात बने
कब से खोये हुए हैं मेले में
कोई पहचान हो तो बात बने


आइना तो रोज़ वाह कहता है
वो कदरदान हो तो बात बने


सबके बारे में बुरा कहते हो
खुद के गिरेबान हो तो बात बने


वक्त ने इसबार फिर हराया है
हम पहलवान हो तो बात बने


गम जो दुनिया के रोज़ पीते हो
हम पे अहसान हो तो बात बने


इक तड़पन सी उठी है सीने में(समीर जी)
वो भी हलकान हो तो बात बने


तेरी नज़रों ने मुझको मारा है
पास श्मशान हो तो बात बने(समीर जी)


हिन्दू औ मुसलमाँ खूब हैं मशाल
जो कोई इंसान हो तो बात बने
दीपक मशाल


आदरणीय राजेन्द्र स्वर्णकार भाई साहब ने सच में इसे ग़ज़ल बना दिया.. उनका ह्रदय से आभारी हूँ.. देखिएगा उनके द्वारा तराशे जाने के बाद ग़ज़ल को-



ग़ज़ल
वो निगहबान हो तो बात बने
और… मेहरबान हो तो बात बने

वो तो खोये हुए हैं मेले में
हमसे पहचान हो तो बात बने

आइने ज्यूं ही उनकी नज़रों में 
कुछ मेरी शान हो तो बात बने

उनके लब पर भी देख कर हम को
एक मुसकान हो तो बात बने 

सबको कहते बुरा ; कभी ख़ुद का  
गर गिरेबान  हो तो बात बने

वक़्त को जीतलूं  ;  कोई मुझमें
इक पहलवान हो तो बात बने

पीने वालों ! पियो मेरे भी ग़म
हां, ये अहसान हो तो बात बने

ख़ूब हिन्दू भी हैं , मुसलमां भी
कोई  इंसान  हो  तो  बात  बने

तू  तड़पता  'मशाल' आए दिन / रोज़ाना     
वो भी हल्कान हो तो बात बने
दीपक मशाल 

आज यहाँ बेलफास्ट में हिन्दुस्तान से आये अतिथि कविगण श्री केशरी नाथ त्रिपाठी जी, श्री रामेद्र त्रिपाठी जी, गजेन्द्र सोलंकी जी, महेंद्र अजनबी जी, शशि तिवारी जी और शिवरंजिनी जी शाम को कवि सम्मलेन में समाँ बांधेंगे.. कल उनके साथ कुछ आसपास की खूबसूरत जगहों पर घूमने गया था उन्हीं में से एक दो की तस्वीरें देखिएगा..




मंगलवार, 24 अगस्त 2010

राखी पर्व पर शुभकामनाएं..-------->>>दीपक मशाल




आज राखी के पावन पर्व पर अपनी प्यारी छोटी बहिन रानी(गार्गी) और सृष्टि के अलावा सारी बड़ी बहिनों(दीदियों) अदा दी, रश्मि रवीजा दी, लता हया दी  और शिखा वार्ष्णेय दी का सादर चरण वंदन.. और आप सबको भी प्रेम के इस पर्व पर शुभकामनाएं..  साथ ही मेरी सब बहनों को नज़र करती ये हालिया रचना.. जिसका शीर्षक है 'डर'


डर चाहे पूरब के हों
या पश्चिम के...
एक जैसे होते हैं


उनमे होता है आपस में कोई
खून का रिश्ता
तभी वो उभारते हैं
एक जैसी लम्बी लकीरें माथों पर
एक जैसा देते हैं आकार आँखों को


पप्पू, पोम, रेबेका या नाजिया की तरह
उनके नाम भले उन्हें अलग पहिचान दें
लेकिन उनका रहन-सहन, बोल-चाल
चाल-ढाल होते हैं एक से

और एक जैसा ही होता है
दिलों में उनके घर करने का तरीका
तरीका उनके रौंगटे खड़े करने का
धडकनें बढ़ाने का

उन्हें जनने वालीं परिस्थितियाँ
भले अलग हों
पर उनके चेहरे मिलते हैं बहुत
इसीलिए
डर चाहे पूरब के हों 
या पश्चिम के 
एक जैसे होते हैं
दीपक मशाल 


शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

दुश्मनी के उत्तराधिकार---------->>>दीपक मशाल

दुश्मनी के उत्तराधिकार

अंधेरों की बेलों से बाँध
थमा दिए गए इंसान को..
जिन्हें बैलगाड़ी के
लोहे से बंधे
सख्त पहियों की मदद से
खींच रहा है नया युग..


रफ़्तार पकड़ते
स्वचालित वाहनों की दौड़ में
हम मन के कसैलेपन के
मरगिल्ले बैल ले के
ढो रहे हैं अपनी विरासत की कहानी


कुछ धुएं के फ़कीर फिर भी
अपनी पानी वाली लकीरों को
थोपे जा रहे हैं..
कब्रों के सिरहाने
रक्तपात के बीज बोते जा रहे हैं


बीच-बीच में छोड़े जाते हैं
दूधिया कबूतर
और फिर ज़मीन से


साधे जाते हैं निशाने उनपर
इंसानियत के सिपाहियों की दलीलें
दब जाती हैं तोपों की अट्टाहसों में
सरहद के सिपाहियों की गोलियां
कर देती हैं छलनी उन्हें
अपनी-अपनी तरफ के गिद्धों के
वतनपरस्ती के आलापों के बीच




एक भयानक वेदना के बाद
ठंडी पड़ने लगती हैं चीखें
पर उनसे जुड़ें कुछ और चीखें
सालों के सन्नाटों में गूंजती रहती हैं
खुद के कानों के परदे फाड़ती रहती हैं
वीरानियाँ बोती रहती हैं
और ये उत्तराधिकार सुरक्षित रहते हैं..
दीपक मशाल 
(यह कविता परिकथा साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है)
कभी निगाहें नहीं मिलतीं...


उनसे मेरी आहें नहीं मिलतीं..
मंजिलें तो कभी एक ना थीं..
अब तो अपनी राहें नहीं मिलतीं..
दीपक मशाल 

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

कुम्भ के बिछड़े भाई-बहिनों का मिलन..-----दीपक मशाल

अभी पिछले हफ्ते ८ अगस्त को लन्दन के भारतीय उच्चायोग से सम्बद्ध सांस्कृतिक केंद्र नेहरु सेंटर में कुछ साहित्यिक हलचल थी.. मौका था यू.के. हिन्दी समिति के गठन के २० वर्ष पूर्ण होने पर कहानी सम्मेलन का आयोजन. जिसमे कि यू.के. के प्रतिष्ठित कहानीकारों को उनकी रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था.. आदरणीय महावीर शर्मा जी की अस्वस्थता के चलते उन्होंने ये सौभाग्य मुझे प्रदान किया.. कई दिन से शिखा वार्ष्णेय दी से भी मिलने को, उनके हाथ का बना खाना खाने को चाह रहा था(यूँ तो वादा तो मैंने ये किया था कि मैं आके बनाऊंगा.. लेकिन फिर.... :) ) , सो वो हसरत भी पूरी होने का मौका था. सोचा अच्छा है
एक बटन दो काज हो जावेंगे(अरे वही एक पंथ दो काज). अब यात्रा कहाँ से कैसे शुरू हुई? वायुमार्ग के बजाय जलमार्ग से लन्दन जाने का मेरा फैसला कितना सही कितना गलत था? किन-किन साहित्यिक हस्तियों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ? आयोजन कैसा रहा? उसके दूरगामी लाभ(मुझे भी और हिन्दी साहित्य को भी) क्या होने वाले हैं? रास्ते में क्या-क्या नज़ारे देखने को मिले(रात में और दिन में)? बस का १४ घंटे आने और १४ घंटे जाने का सफ़र कैसा रहा? इन सारे सवालों का जवाब आगामी पोस्टों में दूंगा.. अपने आप को ही दूंगा वैसे आप भी पढ़ सकते हैं.. :)
लेकिन यहाँ पर तो सिर्फ और सिर्फ शिखा दी की बात होगी.. जिनसे मिलने पर कहीं से लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं और वो गाना याद आ गया 'तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई...'
आदरणीय शिखा दी में जितना अपनापन दिखा ठीक उतना ही दिखा जीजा जी में.. और वेदांत, सौम्या का तो कहना ही क्या..
मैं विक्टोरिया कोच बस स्टेशन लन्दन पर सुबह ६ बजे उतरा(उससे पहले के मजेदार वृतांत आगे मिलेंगे) तो थोड़ा सा घूमते-घामते विक्टोरिया रेलवे स्टेशन पहुंचा. और टिकट बाबू ने गेटविक जाने वाली ट्रेन का रिचार्ज मार दिया.. जब अहसास हुआ कि  १० के बजाए १७ पौंड कट रहे हैं तो वही अपनी देशी इश्टाईल से वापस लिया पैसा और १० पौंड देके आगे बढ़े.. वहाँ से नोर्थ बाउंड सर्किल लाइन की ट्रेन पकड़ी और फिर आगे के लिए सेंट्रल लाइन को पकड़ के गेंट्सहिल पहुँच गए भैया..
उस अंधड़खाने से बाहर निकले तो शनिवार की सुबह और वो भी ७ बजे होने की वजह से किसी आदमजात का मुखड़ा ना दिखा वहाँ.. थोड़ी देर में अपनी झाडूकार में बैठ झाडू वाले भाईसाब आये तब लगा कि यहाँ भी इंसान बसते हैं.. जीजा जी की नींद में खलल डाला और वहाँ से आगे को कूच करने के निर्देश पाए.. बाद में पता चला कि आप सभी पहले ही सुबह ४ बजे के जागे हुए थे.. 'गेशाम'(नाम पर मत जाइए ;) ) गली पहुंचा और जीजा जी घर के बाहर खड़े मिले.. घर में कदम रखते हुए लगा ही नहीं कि पहली बार आया हूँ या दी से पहली बार मिल रहा हूँ.. (वैसे पुनर्जनम वाला भी कोई केस नहीं था)
अब चाय-वाय-नहाना-धोना-नाश्ता-पानी सब फास्ट फॉरवर्ड में....
छुट्टी का दिन था सो जीजा जी भी खुश थे, हम भी, दीदी भी और सौम्या भी.. पर बेचारा प्यारा वेदान्त.. हाय री किस्मत उसे तो आज भी ट्यूशन जाना था(मुझे भी अचम्भा हुआ कि लन्दन में भी ट्यूशन).. पता चला वो एक विशेष प्रतियोगी परीक्षा(हाँ यही ठीक है.. मुझे और आपको दोनों को समझने में आसानी रहेगी) की तैयारी के लिए गणित पढ़ने जा रहा था.. 
उसके बाद दीदी ने जो खाना बनाने और खिलाने का सिलसिला शुरू किया वो अगले दो दिन तक थमा ही नहीं.. मुझे राखी का वो फ़िल्मी संवाद याद आ गया कि 'लोग अपने दुश्मन को पानी के लिए तरसा-तरसा के मारते हैं लेकिन हम तुम्हें पानी पिला पिला के मारेंगे.. पिला-पिला के मारेंगे..'
बस यहाँ लगता था कि मुझे खाना खिला-खिला के मारने का सोचा गया था.. शनिवार की सुबह छोले भठूरे से जो सिलसिला चालू हुआ वो इडली-साम्भर, डोसा-साम्भर होता हुआ कहाँ कहाँ नहीं पहुंचा.. 
जीजा जी और बच्चों के साथ क्रिकेट, शाम की स्पेशल पार्टी, और इस तरह बहुत सारी यादों की तस्वीरें जिन्दगी के एल्बम में चस्पा कर लीं मैंने.. अदा दीमहफूज़ भाई और रश्मि रवीजा दी भी मानसिक रूप से हमारे साथ ही रहे वहाँ.. और इतवार को लगभग सारा दिन हमने नेहरु सेंटर में ८ बड़ी कहानियाँ पढ़ते-सुनते गुज़ारे.. जिसकी बेहतरीन रिपोर्टिंग की मोस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में गोल्डमेडलिस्ट श्रीमती शिखा वार्ष्णेय जी ने... उसके बाद शाम को तो चाय और  डिस्प्रिन ने ही संभाल पाया.. :)
अगले दिन वेदान्त के साथ शतरंज की वो बाज़ी.. मज़ा आ गया कसम से..
और सबसे बाद में वापस आने से पहले जब उसके साथ लंच कर रहा था तो उसका ये कहना कि ''आप एक दिन और नहीं रुक सकते क्या?''
भला किसका दिल और आँख नहीं भर आयेगी ये सब सुन..
दी कुछ समझ नहीं आ रहा क्या कहूं.. आभार कह देता अगर पराया होता तो पर अब तो चुप रहना ही अच्छा है.. वरना आपके थप्पड़ की धमकी कौन सुने.. :)
कितनी बातों पर.. कितनी सारी चीजों को देख अचानक एक जैसी बात मुख से निकलना.. किसी परिस्थिति पर एक जैसी सोच.. कितना कुछ एक सा लगा. तभी लगा मुझे कि हो ना हों कुम्भ के बिछड़े भाई-बहिन हैं.. 
बहुत कुछ ऐसा ही स्नेह मिला था खुशदीप भैया, राजीव तनेजा जी, संजू भाभी जी, अजय झा भैया और वर्मा जी आदि से, जब दिल्ली गया था और जब नंगल निर्मला कपिला मासी के पास था..
ये जो रिश्ते आभासी जगत ने हमें दिए हैं इनका मोल चुकाना हमारे वश की बात नहीं.. इतना स्नेह.. कि कुछ कहते नहीं बनता और कहना चाहता भी नहीं.. अब अपने परिवार की तारीफ़ ज्यादा करेंगे तो लोग मियाँ-मिट्ठू ही कहेंगे ना.. :)
दीपक मशाल 
चित्र वेदान्त, शिखा दी, क्रूज मेम्बर्स और मैंने निकाले हैं..

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

एक भीगी मुस्कराहट..---------->>>दीपक मशाल


मैं बहुत शर्मिंदा हूँ कि समय कुछ कम है इसलिए आजकल आपके ब्लॉग पर झाँक नहीं पा रहा.. पर वादा कि जल्दी ही आऊंगा.. अगर बुरा ना मानें तो इस कविता के बारे में और इसके शीर्षक के बारे में अपनी बेशकीमती राय जरूर दें.. क्योंकि इसे मैं अपने अगले काव्य संग्रह का शीर्षक बनाना चाहता हूँ..



जिंदगी के कड़ाहे में खौलते हालात..

चुपके से वक़्त का हलवाई
डाल देता है उसमे
उबलने के लिए साँसों को..

जलती, तड़पती, उछलती साँसें
बचतीं, उतरातीं..
तो कभी डूबतीं..

आखिर में जब इस सबसे गुजरी कोई साँस
इस तड़प इस दर्द को
बाँट लेती है कोरे पन्नों के साथ
एक रचना में ढाल...
तो बेजुबान पन्ने
जुबां वालों को करते हैं मजबूर
कभी आह तो कभी वाह उचारने को

पर किन्हीं आँखों का एक जोड़ा
महसूसता है कुछ अलग
वो बेसबब मुस्कुराती रचनाओं की सीपों के पीछे
तलाशने लगता है खारे मोती
तो बरबस भीग जाती हैं मुस्कुराहटें..

और सूखे ज़ज्बातों की रेत के बीच
निर्मित हो जाती है एक मृग मरीचिका
एक भीगी मुस्कराहट..
दीपक मशाल
 

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