रविवार, 28 फ़रवरी 2010

मुँह में भांग की गोली है.. भीगी हर इक चोली है..(बुरा ना मानो होली है.. पोल तुम्हारी खोली है पार्ट-२)---->>>दीपक 'मशाल'

दोस्तों घबराइए नहीं मैं वापस आ गया हूँ और कल जो वादा कर के गया था वो भी मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है... आपको क्या लगता है??? आप सबकी इज्ज़त के चीथड़े उधेड़े तो बाकी लोगों के छोड़ दूंगा.. नहीं साहब बिलकुल नहीं.. देखिये अब बाकी लोगों की बारी है तो.....   दिल थाम के पढ़ियेगा और अपनी बोली लगने का इंतज़ार कीजिएगा.. और हाँ आज बेलफास्ट की पिछले साल की होली की दो तस्वीरें हैं उन्हें देख के विदेशी होली का भी अंदाज़ा लगाइए..


गंजा कानून उर्फ़ दिनेशराय द्विवेदी जी--
ब्लॉगवुड हर कदम इक नई जंग है...
हार जाओगे तुम.. ये केस बड़ा झंड है...

'हँस कहे कौआ मों को.. चों रे चम्पू' समझे के नाहीं ई हैं तिरंगे के बीच वाले चक्के के चोर हमरे प्रिय कवि अशोक चक्रधर जी--(इसे 'मेरे महबूब क़यामत होगी की तरह गुनगुनाएं..)
बूढ़े यादव जब क़यामत होगी... तेरे सर पे ही सारी तोहमत होगी...
मैं तो खुश हूँ के ब्लॉग को रंग लेता हूँ... तेरी धोबी के कुत्ते सी हालात होगी..
हिंदी को किताबी जो बनाएगा अगर... तेरे जैसों की हिंदी की खिलाफत होगी....

गुरु ग्रहदशाल याने पं. डी. के. शर्मा 'वत्स'--
मेरी हर पोस्ट पे लटके हैं तारे..
टिप्पी तेरी मांगें.. तू आजा रे..(डैडी फिल्म के गाने 'आसमा की छत की तरह गुनगुनाएं)

पर्सनल कंप्यूटर वायरस या पी.सी. गोदियाल जी--
मेरी पोस्ट पर तुम टिप्पणी ना फेंको.. पंगा हो जायेगा..
इस पंगे से मैं भड़क गया तो देखो... दंगा हो जायेगा...(तुम प्यार से मेरी तरफ ना देखो...)

विचारों के अचार भाई सतीश सक्सेना जी--
मैं तेरे साथ हूँ जहाँ तू है...
गर हिंदी का रहनुमा तू है...

डॉ. खतरा ऊप्स डॉ. दराल--
ओssssss कि कूड़ा जान कर तुम तो कहीं भी टीप जाते हो...
ये मेरी दिल्ली है जो तुम ब्लॉग पर देख जाते हो.. ओssssss

कुलबुलाते कीटनाशक ताऊ रामपुरिया जी--
हम तुम इक पोस्ट लिख रहे हों.. और होली आ जाये..
मैं होली से कह दूँ.. पहेली बूझ देssssss तो मुझे रंग जाए..

देशी स्नोव्हाइट रानी विशाल जी--
ब्लॉग के रंग में रंगने वाली.. ब्लोगर हो या हो.. विशाल(जी) की रानी..
या हो तुम कोई पोस्ट पुरानी... मेरे सवालों का... जवाब दो... दोssss ना...

कलम कातिल अर्थात रश्मिप्रभा जी--
ब्लोगर की तरह लिखती ही रही हूँ मैं....
कभी इस रंग से कभी उस रंग से.. रचती ही रही हूँ मैं...

कमसिन मोहब्बत या अवधिया जी--
आजकल मेरे-मेरे ब्लॉग के चर्चे हैं बाज़ार में..
रंग को मालूम है और भंग को खबर हो गयी...

राहू-केतु की नानी अरे अपनी संगीता पुरी जी--
कलम से सितारे लपेटे हुए.. वो जाने कोई फिर पोस्ट लिख रही हैं...
ज़रा कम लिखें तो.. रंग छा जाये...

गिलगिला शरीफा उर्फ़ वंदना जी--
छोड़ दें पोस्ट लिखना होली के लिए...
ये मुनासिब नहीं हमारे लिए...

अब पेश है चाय.. चाय?? हाँ जी.. लिप्टन टाइगर के बाद अब आई है-
ब्लोगिंग टाइगर चाय.. चूहादिल हैवानों के लिए यानी ललित शर्मा जी के लिए--
है अगर ब्लोगर ज़माना.. ग़म नहीं ग़म नहीं.. 
जो भी आये .. रंग लाये हम भिड़ेंगे कम नहीं.. कम नहीं....

बिल्लोचनी ज्योति वर्मा--
आपकी नज़रों ने समझा ब्लॉग के काबिल मुझे..
मेरी पोस्टों पर ठहर जा.. दे दे तू टिपिया मुझे...

नाक में दम गिरिजेश राव भईया--
यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ मत पूछो कहाँ-कहाँ
शब्द गलत हैं हाँ...
ओ अपनी हिंदी हैं माँ.. ओ अपने हिंदी हैं माँ...

ज़हरीली मौत उर्फ़ कुलवंत हैप्पी--
नशा ये भांग का नशा है.... नशे में रंग में डूब जाओ..
लिखो ना ब्लॉग पे दिवानों.. ओ दिवानों...

रक्तपिपासु मृग याने शाहिद भाई--
और इस ब्लॉग में क्या रखा है...
होली का पोस्ट छुपा रखा है...

'ओ तेरी नाश हो' दिगंबर नासवा जी--
तुमने पुकारा ना पर.. हम चले आये...
हर पोस्ट पर चटका हम लगाये रे...

लच्छू डोन या देवेन्द्र पाण्डेय जी--
दिखाई के ब्लॉग बनारस वाला
लगा दूँ खुली अकल का ताला...

सादा गुलाल मनोज कुमार जी--
ये ब्लॉग है ज्ञान की खानों का..
हिंदी की संतानों का..
पर बेनामी का क्या कहना..
अच्छा है चुप ही रहना..

विज्ञान की दुकान डॉ. अरविन्द मिश्र जी--
ना ब्लोगर बनेगा ना इंसान बनेगा..
इस देश का हर बच्चा विज्ञान बनेगा..

वीरान बंगला उर्फ़ श्यामल सुमन जी--
हमसे प्यारा ब्लॉगवुड में होगा.. होगा ना कोई ब्लॉग..
के आज रंग में भांग की राख आ गई...

एशियन पेंट रंजना भाटिया--
के तुमने आते आते बहुत देर कर दी..
बासी हुई पोस्ट जब.. टिप्पणी तब कर दी..  

बोडम बारूद अजय कुमार जी--
टोपी के नीचे क्या है.. पोस्टों के पीछे..
रे पोस्टों में रंग है मेरी... भांग का....

नक्षत्र डायमंड लावण्या दीदी शाह जी--
ज्योति कलश छलके.. कलश से रंग अबीर ढुलके...

बेगानी शादी में संजय दीवाना अर्थात संजय बेंगाणी--
राम से बड़ा राम का नाम...लोग करते मुझको बदनाम..

टॉफी वाले अंकल यानि सुमन नाईस--
आया रे टॉफी वाला.. नाईस टॉफी लेके आया रे.. आया रे..
हर ब्लॉग के बच्चों को दुलराया रे..  दुलराया रे..

'निचुड़े गन्ने' महेंद्र मिश्र जी--
पढ़ते हुए.. आते हैं सब.. टीपता हुआ जो जायेगा..
वो दुआओं का समंदर, मेरी सब ले जायेगा...#

'बागड़बिल्ला' रावेन्द्र रवि जी--
नगरी नगरी द्वारे द्वारे घूमूं मैं ब्लोगरिया....

'हनी बी' लता 'हया' दी--
मेरे पास टाइम नहीं.. ओ ब्लोगिंग को टाइम नहीं...
होली पे गर पोस्ट ना डालूँ.. ये तो कोई क्राइम नहीं...

निंचुड़े निम्बू सुलभ भाई सतरंगी--
ब्लोग्वासी-ब्लोग्वासी जाना नहीं...
बिना टीप के.. बिना टीप के..

'खामोश पानी' सरवत ज़माल जी--
मांगने वाला है इंसान.. बांटने वाला है इंसान..
टिप्पणी का क्या खेल रचा.. ये कैसा तेरा विधान....

'भटकती आत्मा' शमा या क्षमा जी--
शमा सुनाओ हमें वो कहानी..
जिसमे सच की मिली हो निशानी...

करेले की चाय उर्फ़ राजकुमार सोनी उस्ताद--
जाने वाले जरा होशियार.. आगे पीछे तू रंग ना मार..
हम हैं ब्लॉग के राजकुमार...

'बोगड़वसंत' तेजप्रताप--
कोई जब हमारा ब्लॉग देख ले.. देख कर जब कोई उसे टीप दे..
तभी वो यहाँ से जाए प्रिये...

अगली हिन्दुस्तानी मिसाइल याने वाणी दी--
सुबह से लेकर शाम तक.. शाम से लेकर रात तक...
ब्लॉग पढूं... मैं तो बस ब्लॉग पढूं
चाणक्यावतार डॉ. आदित्य कुमार जी--
तेरे ब्लॉग पे खड़ा एक जोगी.. तेरे ब्लॉग पे खड़ा एक जोगी..
ना मांगे वो टिप्पा-टिप्पी मांगे रंग लगाही.. तेरे ब्लॉग पे...

सज्जन सांड उर्फ़ राकेश वर्मा जी--
तेरे मेरे ब्लॉग अब एक रंग हैं...
तू जहाँ भी ले जाये संजीव हम संग हैं...

खतरा फैक्ट्री या सुरेश चिपलूनकर भैया जी--
मैं छेडूंगा तो बोलेगा के छेड़ता है..
मेरा लहू लाल नहीं भगवा है...

खूंखार मेमना मतलब पवन सिंह जी--
अपनी मर्जी से कहाँ ब्लोगिंग के सफ़र पे हम हैं...
शौक़ ग़ज़ल का है.. इसलिए हम हैं...

'ऑक्सीजन सिलेंडर' या शीबा असलम फहमी जी--
ब्लोगिंग के सब साथी.. अपना ना कोय.. हे राम.. हे राम..

खुलता रंग उर्फ़ भाई संजीव कुरीलिया--
(इसे परदेस फिल्म के गाने 'दीवाना दिल..' कि तरह पढ़ें)
दीवाना रंग... है लगवाना...
है लगवाना.... मुझे तो रंग..
पर पहले पोस्ट को मेरी टीपो..ब्रश से रंग लगाना सीखो..
दीवाना रंग...

'भुंजीभांग' किशोर भाई चौधरी--
मेरी ब्लोगिंग रे.. मेरी ब्लोगिंग रे..
सनम ब्लोगिंग उड़ा ले गई.. मेरी निंदिया रे..

गेंहू की धुन या जाकिर अली 'रजनीश' भाई--
अवार्ड की धुन सुनाता हूँ.. डांट फिर भी खाता हूँ..
ओ डिस्को ब्लोगरा.. ओ डिस्को ब्लोगरा..

सुरीली घटा उर्फ़ रूचि बीबे--
ठांडे रहियो ओ टिप्पाकार रे.. मेरे ब्लॉग के आये तुम द्वार रे..
करके लायी मैं पोस्ट श्रृंगार रे...

'दाढ़ी में तिनका' काजल कुमार--
रे कार्टून जा जा जा... रे कार्टून जा जा जा..
जल्दी से सारे टीपू को.. पोस्ट पे ले आ...

छछूंदर का तेल मायने श्रीश पाठक 'प्रखर'--
मैं चटका लगा आया हूँ तेरी पोस्ट पे...
बस कमेंट का वास्ते.. बस कमेन्ट के वास्ते...

'बुद्धिजीवी उड़न छिपकली' जिन्हें पारुल भी कह सकते है--
सौ साल पहले मुझे ब्लॉग से प्यार था.. आज भी है और कल भी रहेगा...

'सूखे बहेड़े के पेड़े' जनकवि योगेन्द्र मौदगिल जी--
'रंग उडाता हूँ मैं... खूब हँसाता हूँ मैं..
मैंने ब्लोगिंग का वादा किया था कभी..
पर अक्सर उसे भूल जाता हूँ मैं...
और आखिर में इस धरती का सबसे शैतान जीव..'बेनामी'--
अँधेरी रातों में... सुनसान ब्लोगों पे...
इक बेनामी निकलता है.. उसे लोग लफंगा कहते हैं...

आप सबको परिवार सहित होली की शुभकामनाएं... बुरा ना मानें.. ये सब स्वस्थ मजाक के वास्ते लिखा गया है.. ईश्वर साक्षी है कि मेरे मन में किसी के लिए कोई दुर्भावना नहीं..
 दीपक 'मशाल'

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

'बुरा ना मानो होली है.. पोल तुम्हारी खोली है' - part-1----- दीपक 'मशाल'

आज की रात.. होना है जो.. वो होने दो...    अरे नहीं नहीं भाई, रात को कुछ नहीं होने वाला.. वो तो असल में आज ज़रा मस्ती के मूड में आ गया हूँ..  अब आप सोचेंगे ये गंभीर ब्लोगिंग की बातें चिल्लाने वाला अचानक अपने उसूल कैसे भूल बैठा???
तो साहेबान कदरदान, पानदान, पीकदान, थूकदान होशियार.. खबरदार.. कान खोल के सुनियेगा, क्योंकि आज मैं बहुत ही ऊंचे दर्जे की बकवास करने जा रहा हूँ.. सच तो ये है कि फागुन कि बयार ही ऐसी है कि अच्छे अच्छों को बहका देती है.. मेरी बिसात क्या है, मैं भी इस बयार में बिना भांग खाए बहक गया.. और 'बुरा ना मानो होली है.. पोल तुम्हारी खोली है' की तर्ज़ पर ब्लॉग भाइयों और उनकी बहिनों पर कुछ उम्दा खयालात और नाम पेश किये हैं(किसी बात को दिल पर ना लें.. ये सिर्फ होली का मजाक है.. :) )
समय और अजीजों की संख्या देखते हुए पोस्ट को दो भागों में बाँट दिया है.. कुछ आज मिलेंगे और कुछ नाम कल.. :D बुरा ना मानियेगा साहिब.. देखिये हम पहिले ही हाथ जोड़ बिनती कर लेत हैं.. ठीक रहिन के नाहीं??
तो इहाँ हम कोशिशवा करे रहे के ब्लॉग और होली का सम्मिश्रण कर देवें.. देखिये कैसे होत रहे--

सबसे पहले सबकी जुबां पर रहने वाली कातिल जवानी यानि समीर लाल जी कि खिदमत में पेश है-
रंग बरसे भीगे ब्लॉग वाली... रंग बरसे..

अब हसीना मान जाएगी उर्फ़ अनूप शुक्ल जी-
जाने हम आदि ब्लॉगर से.. ये नए बच्चे क्यों जलते हैं....

तकनीक की रानी पाबला जी-
किसी बात पर मैं किसी से खफा हूँ... इक पिल्ला है वो, मैं जिससे खफा हूँ...

लापता हुस्न खुशदीप भाईसाब-
क्या से क्या हो गया.......... ब्लोगिंग तेरे प्यार में...

अब बारी है दिमाग की बत्ती मोमबत्ती से सस्ती शिखा वार्ष्णेय जी-
परदेशियों को ना ब्लॉग पे बुलाना..
ब्लोगरों को है होली मनाना..

दुर्ग की दुखी आत्मा अर्थात शरद कोकास भाई-
होली की भोर रंगों से कटती नहीं..
बिना ब्लोगिंग के गुजिया भी पचती नहीं
वल्लाह ये ब्लोगर...
ना जाने कब लौट.. के आयेंगे जी
दिल तो ब्लोगर है जी..

बेवफा सनम महफूज़ भाई-
कोई बोले तू चिकना है बड़ा..
कोई बोले तुझमे बड़ा है दम..
मैं सबसे बोलूँ एक ही बात
कई किस्से भई मेरे पास
मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ.... मैं हूँ ब्लोगर न. १

मदर ब्लोगिन्डिया याने निर्मला कपिला मासी-
सूरज कब दूर किरन से.. मैं हूँ कब दूर ब्लोगिंग से..
ये बंधन तो ब्लॉग का बंधन है.. नए रिश्तों का उद्गम है...

वैराग की सीमा नीरज गोस्वामी जी..
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
बांधूं होली पे पग घुँघरू..
सबके ब्लॉग पे जाता.. मैं जाता रहा..

ब्लॉग कोकिला.. हाँ नईं तो.. अदा दी..
अहसान तेरा होगा मुझ पर
दिल चाहता है जो कहने दो..
मुझे ब्लॉग से मोहब्बत हो गई है..
मुझे ब्लोगिंग की छाँव में रहने दो..

दिलफेंक पत्नीव्रता आशिक उर्फ़ अजय झा भईया--
सर जो तेरा चकराए.. या दिल डूबा जाये..
आजा प्यारे ब्लॉग पे हमारे.. होली खेली जाए-२...

अब आये हैं पवित्र पापी अनिल पुसदकर भाऊ जी--
यार हमारी बात सुनो.. ऐसा इक इंसान चुनो..
जो रंग में ना डूबा हो.. जो ब्लोग्गर ना हो..

भड़कीली ख्वाहिशें राजीव तनेजा जी--
कहत राजीव सुनो भई ब्लोगर ..
पोस्ट लिखूं मैं खरी..
के दुनिया एक नेकरी..
तो मैं.....

मैं चुप रहूंगी माने राजीव जी से हैरान परेशान संजू भाभी जी--
मोसे छल किये जाए..
हाय रे हाय हय हय.... ब्लोगर बेईमान...

सीधे सादे वादे एम्. वर्मा जी-
होली के दिन ब्लोगर मिल जाते हैं... रंगों के पोस्ट खिल जाते हैं...

धड़धडाती मोहब्बत संजय कुमार जी--
तेरा साथ है पर भांग की कमी है..
मेरे ब्लॉग पे मिल रही टिप्पणी है..

धुकधुकाती साँसें.. कुमारेन्द्र(चाचा) जी--
मैं हिन्दी का साथ निभाता चला गया..
हर टिप्पणी को धुएँ में उड़ाता चला गया...

जवानी दीवानी हुई अविनाश वाचस्पति जी की-
होली खेले ब्लोगीरा.. ब्लॉग पे.. होली खेले ब्लोगीरा...

बाल ब्रह्मचारी.. जहाँ देखी आँख मारी.. गुरुदेव पंकज सुबीर जी--
ये ब्लोगिंग ये महफ़िल.. मेरे काम की नहीं.. मेरे नाम की नहीं...

छैल-छबीली रश्मि रवीजा दी--
ब्लोगिंग तोसे नैना लागे रे..
जाने क्या हो, होली पे ओ रे...

मटकीली बेगम शोभना चौधरी--
मेरा नाम है चमेली.. मैं हूँ ब्लोगर अलबेली..
चली आयी मैं होली पे.. जोधपुर से...

जीने नहीं दूंगा गौतम राजरिशी भाई--
मैं शायर बदनाम...
ब्लोगिंग मेरा मकाम...

तीखी मिर्ची अलबेला खत्री जी--
ये शमा तो जले.. ब्लोगिंग के लिए..
मेरी पोस्ट से अगर कोई जल जाए तो..
ये कवि क्या करे...

अभी तो मैं जवान हूँ सरिता अग्रवाल जी--
देखो ब्लोगिंग वालों अपने..
ब्लॉगवुड पे ये इलज़ाम ना आये...

चमकौअल देवी उर्फ़ शेफाली जी--
मोहे रंग दे.. मोहे रंग दे.. मोहे रंग दे..
मोरे ब्लॉग को रंग दे..

पुराने चावल डॉ. रूप चन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी--
देखो ब्लोग्वालों ऐसा काम ना करो..
ब्लॉग का नाम बदनाम ना करो...

सुगबुगाती ख्वाहिशें राज भाटिया सर--
ब्लोगर साथवा कितना प्यारा.. कम लगता वा जीवन सारा..
इस ब्लोगिंग की लगन में हमें आना पड़ेगा.. होली में दोबारा...

डॉक्टर जानलेवा.. डॉ. अनुराग--
हम जैसा कहीं आपको ब्लोगर ना मिलेगा..

जंगल की रानी अपूर्व शुक्ल--
थोड़ा रुक जाएगी तो तेरा क्या जायेगी..
ब्लॉग पे आ जायेगी तो चैन आ जायेगी....

बिन ब्याही माँ जतिंदर परवाज भाई--
दर्दे-दिल, दर्दे-जिगर ब्लॉग पे जगाया आपने..
काला रंग दिखलाया पर.. तारकोल लगाया आपने...

पिक्चरवाली आंटी अनीता कुमार जी--
आजा रे टिपेरे.. मैं तो कब से खड़ी हूँ इस पार रे...
मेरा ब्लॉग भी जरा सा तू निहार रे..

क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' भाई जी--
आजा प्यारे.. तोहे ब्लॉग दूँ..
अपने ब्लॉग पे मैं.. तुझे संवार दूँ..
किसलिए है तू इतना उदास..
फेल ब्लॉग को मैं करता हूँ पास...

ये आग कब बुझेगी विवेक रस्तोगी जी--
फागुन महके रंग उडाये
रागों की सन्दूक खुलाये
यहाँ आजा परदेसी
मेरा ब्लॉग बुलाये रे...

एक छोटी सी लव स्टोरी मिथिलेश दुबे--
आज ब्लॉगवुड की चोटी से हमने ये ललकारा है..
दूर हटो.. दूर हटो.. दूर हटो ए ब्लोगिंग वालों.. ये घर-बार हमारा है..


टूटा सितारा सलीम खान--
सजन रे झूठ मत बोलो..
हमारे ब्लॉग पे आना है..

कुलच्छिनी दर्शन शाह 'दर्पण'--
एक था गुल और एक थी बुलबुल..
दोनों ब्लॉग में रहते थे...

निशाचर प्राणी यशवंत फकीरा--
पोस्ट जहाँ पर रहते हैं.. उस जगह को सब ब्लॉग कहते हैं..
हम पोस्ट जहाँ पर रखते हैं.. उसे ब्लॉग का मंदिर कहते हैं...

चिरयुवा कन्या कुश भई--
नफरत करने वालों के.. ब्लोगों पे प्यार भर दूँ..
मैं ऐसा हूँ ब्लोगर.. लत्ते को सांप कर दूँ..

खलबलाती तंदूरी संजय भास्कर--
सितमगर इक.. के सितमगर दो
जिस दिन से हुआ है ये ब्लोगिंग शुरू...

पिलपिला पपीता देवेश प्रताप भाई--
ब्लॉग पे रंग लगाना.. सजन मोरे ब्लॉग पे रंग लगाना...

शेष दोस्त कल तक अपनी इज्ज़त की नीलामी रुकने की खुशियाँ मनाएं.. ही ही ही... :D
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से..

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

आज लौट के आया हूँ तो ब्लॉगवुड में एक और नए नाम से आपका परिचय करा देता हूँ..-------->>>>दीपक 'मशाल'

आज लौट के आया हूँ तो ब्लॉगवुड में एक और नए नाम, अपने अज़ीज़  से आपका परिचय करा देता हूँ.. :)
नाम है संजय कुमार जी और बाकी परिचय आप स्वयं इस लिंक पर जाकर देखें और हमारी छोटी सी ब्लॉग दुनिया में इन नए साथी का स्वागत करें और इनका हौसला बढायें...

आपके ब्लॉग पर जाने के लिए इस लिंक पर चटका लगायें..--- http://sanjaykuamr.blogspot.com/ संजय कुमार

और हाँ ये भी वादा रहा कि अगले हफ्ते एक और नए ब्लोगर जो कि वरिष्ठ कवि भी हैं से ब्लॉग की दुनिया का संपर्क जोड़ेंगे.. :) साथ दीजियेगा..
साथ ही लीजिये हाज़िर है आपके सामने मेरी एक छोटी सी रचना-

संगठन में शक्ति है
ये लाख टके की बात
पढ़ी थी दो दर्जे में
कबूतरों और बहेलिये की कहानी में...
और अब इसी को सिद्ध करता है साइंस भी
क्योंकि साइंसजदों ने सिखाया है उसे
और हमें ये कर के दिखाया है कि
संगठन से परमाणुओं के 
संलयन से परमाणुओं के
बनने वाले हाइड्रोजन बम में
होती है कहीं हज़ार गुना ज्यादा ऊर्जा
विघटन से बनने वाले
परमाणु बम की तुलना में...
मगर ना जाने कब बनायेंगे हाइड्रोजन बम
ये टूटते परिवार
ये हर पल बँटते घर-द्वार...
दीपक 'मशाल'

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

ब्लॉगजगत और हिन्दीप्रेमियों से एक दरख्वास्त------------->>>>>दीपक 'मशाल'

आज की तारीख में वैसे तो हर कोई अपनी-अपनी मर्जी का राजा है और अपने-अपने ब्लॉग का भी.. लेकिन फिर भी मैं आप सभी से एक विनम्र  निवेदन करना चाहता हूँ.. वो है अपने उद्देश्य(हिंदी का संवर्धन) से ना भटकने का.. क्योंकि आजकल कुछ ज्यादा ही उठापटक दिख रही है.. जिसका साफ़ मतलब है कि अब हम लोगों को अपनी प्रतिष्ठा बड़ी लगने लगी है और हिंदी की छोटी...

मैं चाहता तो था कि एक ऐसा दोहा लिखूं जो महाकवि बिहारी जी की तर्ज पर हो.. लिखने को शायद लिख भी लेता लेकिन अपने को उस लायक नहीं समझता कि उस कवि शिरोमणि की रचना पर पैरोडी भी बनाऊं.. और फिर वैसे भी वो प्रसिद्द प्राचीन प्रसंग यहाँ सुनाकर भी अपनी बात को स्पष्ट कर सकता हूँ.. और  उम्मीद कर सकता हूँ आप सबसे कि अपनी कलम की धार को बरक़रार रखते हुए उसका उपयोग हिंदी की प्रगति की राह में उग आयी झाड-झंखाड़ को काटने में करें.. ना कि स्वयं को उभारने में और बेशक अगर आप इस पुण्य कार्य में सफल होते हैं तो दुनिया अपने आप ही आपका नाम जानेगी.. कहने की जरूरत ही नहीं.. अगर नहीं भी जानेगी तो 'नींव का पत्थर' तो याद होगा ना..
वो प्रसंग जिसको कि हमारे ब्लॉग संसार को स्मरण कराने की जरूरत है वो इस प्रकार है-

जयपुर-नरेश मिर्जा राजा जयसिंह अपनी नयी रानी के प्रेम में इतने डूबे रहते थे कि वे महल से बाहर भी नहीं निकलते थे और राज-काज की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे। मंत्री आदि लोग इससे बड़े चिंतित थे, किंतु राजा से कुछ कहने को शक्ति किसी में न थी। बिहारी ने यह कार्य अपने ऊपर लिया। उन्होंने निम्नलिखित दोहा किसी प्रकार राजा के पास पहुंचाया -

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
अली कली ही सा बिंध्यों, आगे कौन हवाल।।
(अली- भंवरा मगर इशारा जय सिंह की तरफ था, कली- जयसिंह की नयी रानी)

इस दोहे ने राजा पर मंत्र जैसा कार्य किया। वे रानी के प्रेम-पाश से मुक्त होकर पुनः अपना राज-काज संभालने लगे।
अपने देश में मुद्दों की कमी तो है नहीं, फिर आपस में एक दूजे पर ये छींटाकशी क्यों??
बाकी आप सब स्वयं समझदार हैं इसलिए मुझे भरोसा है कि इस अल्पज्ञ की बात को अन्यथा ना लेके सार्थक रूप में लेंगे.. बुरा लगे तो अपनी भड़ास भी निकाल सकते हैं.. छोटा हूँ ना.. शायद समझ ना पा रहा होऊं..  :)
आज से कुछ दिनों के लिए ब्लॉग लेखन को विराम देता हूँ.. जल्दी ही फिर मिलेंगे, नए जोश के साथ...
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

प्रेम तुम------------------>>>>>.दीपक 'मशाल'

प्रेम तुम शब्द नहीं शब्दकोष हो
प्रेम तुम अंत नहीं अनंत हो
व्याप्त हो तुम
ऊष्णता में रवि किरणों की
चाँदनी में निशिराज की
और हर क्षेत्र में तमस के..
क्योंकि तुम सर्वव्यापी हो, समव्यापी हो
तुम जितने चुम्बन में उतने चरण-स्पर्श में भी
जितने स्पर्श में उतने ही प्रणाम में भी...
प्रेम! परिभाषा नहीं हो तुम
क्योंकि
परिभाषा तो बांधना है शब्दों में
तुम तो हर वर्ण में व्याप्त हो
कण-कण में व्याप्त हो
प्रेम! तुम हो जननी में, भगिनी में
तात में और भ्रात में भी.
जिसकी आँखों में जहाँ देख लेते हैं लोग
हाँ उस काजल के कोर में भी
तुम सिन्दूर में भी उतने ही हो
जितने वन्देमातरम में...
तुम शब्द नहीं, तुम ध्येय नहीं
संस्कृति हो.. धर्म हो...
तुम ऐसा सार्वभौमिक अदृश्य रूप लिए हो
कि अनंत को भी अपने में आवेष्टित किये हो...
दीपक 'मशाल'
चित्र मेरा ही

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

वर्ना मैं तुझ जैसों के मुँह नहीं लगता.....-------->>>>>दीपक 'मशाल'

एक लघुकथा-

उसके कंधे पे हाथ रख कर पहली बार इतनी आत्मीयता से बात करते हुए उस सुपर स्टार पुत्र ने वीरेंदर, जो कि उसका ड्राइवर था, को अपनी परेशानी बताते हुए कहा-

''यार वीरेंदर, मुझे पहली बार किसी बहुत बड़े डायरेक्टर के साथ काम करने का मौका मिला है..''

''ये तो बड़ी खुशी की बात है सर'' अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए वीरेंदर बोला

''लेकिन रोल कुछ ऐसा है कि वो तेरी मदद के बिना पूरा नहीं हो सकता..'' अपनी बात को आगे बढ़ाता वो नया 'हीरो' बोला..

''वो कैसे सर....'' अब वीरेंदर उस अचानक उमड़े प्रेम का कारण कुछ समझ रहा था

''मुझे एक बड़े स्टार के ड्राइवर का रोल मिला है जो कि कहानी का मुख्य चरित्र है.. एक तुम्हारे जैसे गरीब, मजबूर आदमी का रोल है... इसके लिए मुझे तुम्हारी दिनचर्या.. उठना-बैठना, रहन-सहन समझना होगा बस्स.. कुछ दिन के लिए'' अपनी मजबूरी बताते हुए और वीरेंदर की जेब में १०००-१००० के १० करारे नोट घुसेड़ता हुआ वो तथाकथित हीरो बोला..

''लेकिन सर ये तो...'' अपनी स्वामिभक्ति दिखाने के लिए रुपये लेने से इंकार करता वो कुछ बोलना चाहता था...

''अबे रख ले चुपचाप साले.. अब ज्यादा मुँह मत खोल वर्ना इतना भी नहीं देता .. वो तो मेरी मजबूरी है आज तक किसी 'स्लम डॉग' की लाइफ को करीब से नहीं देखा.. इसलिए.. वर्ना मैं तुझ जैसों के मुँह नहीं लगता...'' अचानक ड्राइवर को उसकी औकात बताते हुए उसने झिड़क दिया..

होंठ तो चुप रह गए लेकिन अब वीरेंदर का दिमाग अपने आप से बोल रहा था 'अगर मैंने सब सच बता दिया तो क्या ये आदमी मेरा रोल अदा कर पायेगा परदे पर???'
दीपक 'मशाल'

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

खान की मदद से खान पकड़ा गया.... खान की डीवीडी ज़ब्त हुईं और खान बर्बाद होने से बच गया-------->>>>>>दीपक 'मशाल'

सबसे पहले तो ये बात समझ लें कि कोई प्रबुद्ध जी इससे आगे ना पढ़ें.. मैं कोई लफड़े-वफड़े में नईं पड़ना चाहता भाई... औसत बुद्धि का सामान्य ब्लॉगर हूँ.. कायसे के आज कल लत्ते के सांप भोत(बहुत) बन रये  हैं.. आगे पढ़ें तो अपनी रिस्क पे.. बाद में ना कहें के बताया नईं था..

भाई कल एक खबर पढ़ने को मिली टाइम्स ऑफ़ इंडिया में.. खबर थी कि ''मुंबई में 'माई नेम इज खान' की पाईरेटिड डी वी डी पकड़ी गईं''... बस उस खबर को पढ़ लिया.. आप लोग कह रहे होंगे कि इसमें ख़ास क्या था वे लल्लू?????. ऐसी ख़बरें तो कितनी हर अखबार के हर पन्ने के आठों कोनों में त्रिकोण-चतुर्कोंण घेरती मिल जायेंगीं.
लेकिन भाई जी ख़ास बात जे नईं थी के पुलिस के छापे से डीवीडी पकडीं गईं.. बल्कि खासमखास बात थी ये कि-----
इस गिरफ्तारी में जिसने अहम् भूमिका निभाई वो हैं मुंबई पुलिस के पूर्व अधिकारी.. ए.ए.खान, जिनकी मदद से ये गैंग पकड़ा गया.. जो गिरफ्तार हुआ या जो आरोपी था वो था शेहनाज़ नासिर खान... देखा फिर खान.. :) बरामद हुईं ३००० डीवीडी में जिस फिल्म की काफी ज्यादा डीवीडी मिलीं वो थी 'माई नेम इज खान' फिर खान :) और इस प्रकरण से जिसकी फिल्मों की कुछ और कमाई बढ़ेगी या नुक्सान होने से बचेगा वो है शाहरुख़ खान...
तो अब समझे आप कि क्यों है इस पोस्ट का नाम रखा गया-- ''खान की मदद से खान पकड़ा गया.... खान की डीवीडी ज़ब्त हुईं और खान बर्बाद होने से बच गया''


हाँ लेकिन बस इसी बहाने एक बात मैं कहना चाहूंगा विद्वत्जनों से कि ''चारों अंगुलियाँ बराबर नहीं होतीं.. (पांचवा तो अंगूठा होता है ना...) ;)'' ही ही ही... भाई गुस्सेवालों मेरे दाँत मत तोड़ देना.. वैसे भी अभी तो ३२ के ३२ निकले भी नहीं २८ ही आये हैं(अक्कल डाढें बाकी हैं)
कुछ भी हो बात सच हो गयी कि दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग हैं.. अच्छे और बुरे..
दीपक 'मशाल'

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जाने कैसे पडोसी हैं, उसे सोने नहीं देते.------>>>> दीपक 'मशाल'


झूठ मैं कह नहीं पाता, सच वो कहने नहीं देते
क्यों मुझको मिरे माफिक, जग में रहने नहीं देते

क्यों तुमने बनाया है, अमरित ये हलाहल सा
(ये क्या सौगात भेजी है, अमरित भी हलाहल भी)
कभी जीने नहीं देते, कभी मरने नहीं देते

हैं इतनी सख्त दिवारें, फर्श जैसे हैं दलदल से
खड़ा मैं रह नहीं पाता, क़दम गिरने नहीं देते

बेरहम कातिल कहीं अच्छा, तुम्हारे उन उसूलों से
जो मकतूल के ग़म में, उसे रोने नहीं देते
(जो मजबूर के ग़म में, मुझे रोने नहीं देते)

इकबार में बाज़ार में, मुझे नीलाम कर दो तुम
ये हरदिन के मोल-भाव, मुझे जीने नहीं देते

'मशाल' सपने मुहब्बत के, बुनना चाहता लेकिन
जाने कैसे पडोसी हैं, उसे सोने नहीं देते.
दीपक 'मशाल'

इसी ग़ज़ल का नया रूप जिसे संवारा है आदरणीया रश्मिप्रभा जी ने-
झूठ मैं कह नहीं पाता, सच वो कहने नहीं देते
क्यों मुझे  मिरे माफिक, जग में रहने नहीं देते
क्यों तुमने बनाया  अमृत को  हलाहल सा
जो कभी  जीने नहीं देते औ  कभी मरने नहीं देते
हैं इतनी सख्त दिवारें, फर्श  हैं दलदल से
खड़ा मैं रह नहीं पाता औ  क़दम गिरने नहीं देते

बेरहम कातिल कहीं अच्छा, तुम्हारे उन उसूलों से
जो मकतूल के ग़म में, उसे रोने नहीं देते
(जो मजबूर के ग़म में, मुझे रोने नहीं देते)
इकबार  बाज़ार में, मुझे नीलम कर दो तुम
ये हरदिन के मोल-भाव, मुझे जीने नहीं देते
'मशाल' सपने मुहब्बत के, बुनना चाहता लेकिन
जाने कैसे पडोसी हैं, उसे सोने नहीं देते.


चित्र साभार गूगल से..

1-पवन जी.. singhsdm, यशवंत भाई, बेनामी जी 2-डॉ.टी.एस.दराल सर, अदा दी, समीर जी 3-अपनत्व ब्लॉग वाली मैम, मनोज कुमार जी, बड़े भाई खुशदीप जी, संजय जी------>>>दीपक 'मशाल'

परिणाम घोषित करने से पहले... आप लोगों से मुआफी माँगना निहायत ही जरूरी है.. वो इसलिए कि ये चेहरे ना बूझ पाने का कारण ये नहीं कि आप इन्हें पहिचान नहीं पा रहे या मैंने राजीव तनेजा जी की तरह कोई नकाब पहना रखा है.
बल्कि इकलौता कारण है कैरिकैचर बनाने में मेरा कच्चापन.. अब्बल तो मैंने पहली बार बनाने का प्रयास किया.. वो भी १०-१२ मिनट में पहले ४ चित्र बनाये..( सोचा एम.ऍफ़.हुसैन की स्पीड से बना के देखता हूँ) हाँ उर्मिला बनाने में जरूर ३०-४० मिनट लगे.. और ऊपर से अतिआत्मविश्वास ने भी मेरा शिकार कर लिया ;)
खैर अपने आप को ये समझा  लिया ये सोच के कि भाई ५ साल पहले बनाये थे.. कोन आज के बने हैं.. और फिर पहली बार इस कला को आजमाया..
तो बता ही देता हूँ कि कौन सा चित्र किसका बनाने की कोशिश की(और बना नहीं पाया :'(   )
यहाँ आपको दिखाने का यही मकसद था कि खुद से पता नहीं चलता कि कौन सा ठीक है और कौन सा नहीं.. तो आप से चल जायेगा...
आपने भरपूर सहयोग दिया इसके लिए आभारी हूँ.. हाँ ख़ुशी की बात ये भी है कि जो ५ बनाये उनके नाम लोगों ने बता तो दिए लेकिन किसी ने १ किसी ने २.. इस तरह से.. समीर जी ने भी ढंग से टांग खींची.. :)
तीसरे चित्र जॉन और बिपाशा को सिर्फ संजय कुमार जी(मेरे जीजा जी) पहिचान पाए .. मुझे खुद नहीं समझ आ रहा कि पहिचाना कैसे???
उत्तर इस प्रकार हैं-

१- अभिषेक बच्चन(ये गेटअप ४ साल पहले अभिषेक जब दिल्ली यूनिवर्सिटी आये तो उस समय रखा था)


२-अजय देवगन(जबड़ा बिगड़ गया जी)


३-रक्त पिपासा ऊप्स बिपाशा- जॉन अब्राहम


४-शाहरुख़(ॐ शांति ॐ)


५-उर्मिला तोड़ मरोड़कर.. यानि मांतोडकर (२००२ लुक)


सबसे ज्यादा ३ सही बताये पवन जी.. singhsdm ने जिनका कि आभारी हूँ कि वो ब्लॉग पर पहली बार आये और फकीरा ब्लॉग वाले यशवंत भाई ने..
उसके बाद बेनामी जी ने भी ३ ही सही जवाब दिए.. आप नाम बताते तो और भी अच्छा लगता..
फिर डॉ.टी.एस.दराल सर, अदा दी और समीर जी ने २-२ सही बताये ..
अपनत्व ब्लॉग वाली मैम, मनोज कुमार जी, बड़े भाई खुशदीप जी, संजय जी सभी ने १-१ सही बताये..
हौसला बढ़ाने के लिए आप सभी के अलावा संगीता पुरी मैम, वंदना जी, पं.डी. के. शर्मा 'वत्स' जी, डॉ. रूप चन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी, रावेन्द्र कुमार 'रवि' जी, अजय झा भैया, विवेक रस्तोगी जी, संजय भास्कर जी, कुमारेन्द्र चाचा जी और राज भाटिया सर का बेहद शुक्रगुज़ार हूँ..

बुरा ना मानें तो आज ये जरूर बताते जाएँ कि कौन सा कार्टून
 कितने प्रतिशत मिल रहा है.. आप 0 % भी लिख सकते हैं
लेकिन बताइयेगा सच-सच.. जिससे कि आगे के लिए बनाना

आसान रहेगा..


(एक विनम्र निवेदन है कि आप लोग खुशदीप भाई की कल की बहुत ही महत्वपूर्ण पोस्ट के नीचे जो song  का लिंक दिया था वो सुनें जरूर.. वो एक ऐसा गाना है जो दिल रखने वालों के आँसू निकाल देता है..)
दीपक 'मशाल'

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

पहिचानिए इन्हें ये कौन स्टार हैं???? ---------->>>>>>दीपक 'मशाल'

पहिचानिए इन्हें ये कौन स्टार हैं???? किसके हैं ये कैरिकेचर???
बताने वाले होंगे विजेता....

पहला प्रयास था इसलिए ज्यादा सफल नहीं हुआ... sorrrry
दीपक 'मशाल'

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

ऐ डॉ. लव! ऐ लव गुरु!! तुम क्या समझोगे, क्या समझाओगे प्यार को..------->>>>दीपक 'मशाल'

आज प्रेम चतुर्दशी की पूर्व संध्या पर एक कविता, जो कि वास्तव में एक ताना है कुछ रेडियो चैनल वालों के लिए आपके सामने रख रहा हूँ... इसमें मैंने रेडियो पर प्रेम सिखाने या उसे बढ़ावा देने वालों से गुज़ारिश की है कि प्रेम के मामले में हस्तक्षेप ना ही करें.. मुझे डॉ. लव या लव गुरु जैसे लोगों से और उनकी अव्यवहारिक सलाहों से बड़ी ही कोफ़्त होती है...
साथ ही आपमें से जो भी लोग ये कहते हैं कि प्रेम के लिए एक दिन नहीं होना चाहिए उनसे पूछना चाहूंगा कि भगवान की पूजा के लिए तो सारे ही दिन शुभ हैं पर हम दिवाली, होली, संक्रांति क्यों मनाते हैं... जैसे उन दिनों से कोई ना कोई प्रसंग जुड़ा होता है ठीक वैसे ही इस दिन से भी जुड़ा है...

कविता-
ऐ डॉ. लव!
ऐ लव गुरु!!
तुम क्या समझोगे, क्या समझाओगे प्यार को..
खुद भी उलझोगे और उलझाओगे प्यार को
छोडो भी यार ये तुम्हारे बस की बात नहीं है
तुम्हारे बस का काम नहीं है.. तुम्हारे बस का रोग नहीं है...
ये शफक है आफताब की
किसी मयखाने की शाम नहीं है

तुम तो उलझे हो और उलझे रहोगे
खुद भी उलझोगे और लोगों को उलझाते रहोगे
हकीकत ये है कि ये समझने समझाने का खेल नहीं है
रूठने मनाने का खेल नहीं है
बार-बार छोड़ने अपनाने का खेल नहीं है
ये तो महसूस करने की चीज़ नहीं है
और समझने का खेल तो ऊपर वाले माले में होता है
और ये काम तो बीच वाले माले के हवाले है..
क्योंकि ये मोहब्बत है.

लेकिन तुम्हारे सारे काम तो
ऊपर और नीचे वाले माले में ही होते हैं....
इसलिए ऐ लव गुरु.... ऐ डॉ. लव....
जाने भी दो यार
तुम ना सिखलाओ लोगों को... तुम ना समझाओ प्यार को
रहने भी दो तुम ना उलझाओ प्यार को..

लैला-मजनूँ बनाने से नहीं बनते..
हीर-राँझा सिखाने से नहीं बनते
क्योंकि सीखने के लिए चाहिए दिमाग और सिखाने के लिए चाहिए दिमाग
और मोहब्बत दिल से होती है... हाँ मोहब्बत दिल से होती है..
अगर तुम समझा सकते हो
अगर तुम सिखा सकते हो
तड़पना दर्द में... और ठिठुरना सर्द में
तभी हाँ सिर्फ तभी मोहब्बत सिखाना तुम..
वर्ना खुदा पाक की मासूम खूबी पे
दाग ना लगाना तुम..
वैसे मैं जानता हूँ .. कि तुम बाज़ार में हो कुछ बेचोगे जरूर
प्यार नहीं छल ही सही..
इसलिए .. हाँ इसीलिए मैं कहता हूँ हाथ जोड़ के तुमसे
कि ऐ डॉ. लव, ऐ लव गुरु...
तुम क्या समझोगे.. क्या समझाओगे प्यार को..
खुद भी उलझोगे और उलझाओगे प्यार को....
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से...

लघु कथा------>>>दीपक 'मशाल'

------दोहरी मानसिकता------
दीपक 'मशाल'

बिलियर्ड्स की लाल गेंद की माफिक आफताब भी अस्ताचल में अपने होल में समाया जा रहा था.बड़ी देर से उस डूबते सुर्ख लाल गोले को देखे जा रहा था धनञ्जय- ''क्या बिलकुल ठीक इसी तरह अपनी अवाम की सच्चाई, ईमानदारी और शराफत जैसी अच्छाइयां भ्रष्टाचार, झूठ और घोटालों के अस्ताचल में नहीं समाई जा रही हैं?''
शायद इतने अधिक गंभीर दिखने की कोशिश करते हुए धनञ्जय यही सब शब्द चित्र अपने जिहन में उकेर रहा था. मगर एक बड़े गज़ब का या कहें कि शोध का विषय था कि उसके माथे पर औरों की तरह भाव नज़र नहीं आते थे और ना ही गंभीर मुद्रा में भी दार्शनिकों का सा प्रतिरूप झलकता था उसमें, बस मासूम सा चेहरा चिरस्थायी रहता था फिर भी वह लगातार चिंतन के महासागर में गोते लगाते हुए रिक्शे पर बैठा अपने गंतव्य की ओर हिचकोले खाता हुआ बढ़ता जा रहा था.
रास्ते में पड़ने वाले उतार-चढ़ावों को देख ख्याल आता कि- ''कब तक ये उतार-चढ़ाव की राजनीति के अवरोध देश की प्रगति में बाधक बनते रहेंगे और कब चिकनी सड़क पर दौड़ते वाहन की भांति अपना वतन प्रगति की ओर भागेगा? मगर क्या भाग पायेगा इन ज़हरीले नागों को आस्तीनों में भरकर? कितनी ही संस्थाएं हैं उसके नगर में जो समाजसेवा के नाम पर ठगी का धंधा चलाती हैं. बाबू से लेकर चपरासी तक की वर्दी रिश्वत के रंग में रंगी है. पौरुष, लिप्सारहित और साहसी का ढोंग रचने वाले पुलिस वाले भीतर ही भीतर इसे खोखला किये जा रहे हैं.
बाहर सीमा के रक्षकों से जो कुछ उम्मीदें थीं वो भी रक्षा सौदे की दलाली में फंसे ब्रिगेडियरों और कर्नलों ने तोड़ दीं. अरे सिर्फ वे ही क्यों देशभक्ति और ईमानदारी का राग अलापें, जबकि हर तरफ बेईमानी का विष फैला है और जब सफेदपोशों को अपनी सफेदी में दाग का डर नहीं तो खाकी रंग में कोई दाग दिखता कहाँ है.''
''ई लीजिये बाबू जी! आ गवा तोहार पंजाबी मारकिट.''
उस काले कलूटे कृषकाय रिक्शेवाले की हांफती और कंपकंपाती आवाज़ ने धनञ्जय के चिंतन में खलल डाला. रिक्शे से नीचे पैर रखते ही पहले जेब में अपना पर्स टटोला और फिर शर्ट की जेब से ३ रुपये के सिक्के निकाल कर रिक्शे वाले के हाथ में रख चुपचाप आगे चलने लगा.
'' ई का साहिब इतना दूर का तीने रुपईया दोगे मालिक!''
ये बात धनञ्जय को नागवार गुजरी या उसे अपनी तौहीन लगी, तभी तो चिल्ला उठा उस गरीब पे-
''अबे तो क्या तीन किलोमीटर के लिए किसी का घर लेगा क्या? तुम लोग स्साले इसीलिए नहीं पनप सकते कि ईमानदारी का तो मतलब ही नहीं जानते, साले सब के सब हराम की रोटी तोड़ना चाहते हो.''
शायद उमस और फूलती सांस ने शहर में नए आये उस रिक्शेवाले में बोलने तक की सामर्थ्य नहीं छोड़ी या तो फिर वो धनञ्जय के तर्कों से संतुष्ट था इसीलिए रिक्शा एक किनारे कर सुस्ताने लगा.
७ रुपये बचाकर अपनी बुद्धि को मन ही मन सराहता हुआ धनञ्जय डिस्को सेंटर की तरफ बढ़ गया... लेकिन ना जाने क्यों अब ज़माने भर के हजारों ज़हरीले साँपों का ज़हर उसके भी चेहरे की नशों में साफ़-साफ़ देखा जा सकता था.

दीपक 'मशाल'
चित्र-साभार गूगल से

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

शाबाशी गयी भाड़ में..... पहले ये बताओ कि मुझे धक्का किस कमीने ने दिया था------>>>> दीपक 'मशाल'

आप में से ज्यादातर लोगों ने ये चुटकला तो सुन ही रखा होगा कि- 'एक बार एक नदीं में कोई बच्चा डूब रहा था.. काफी भीड़ जमा हो गयी किनारे पर लेकिन गहरी और ठन्डे पानी वाली उस नदी में कूदने की किसी की हिम्मत ना पड़े.. सब एक दूसरे का मुँह तक रहे थे कि अचानक एक नौजवान नदी में कूदा और देखते ही देखते बच्चे को बचा के बाहर आ गया.
अब तो वो सब का हीरो बन गया.... लगे सब वाह-वाही करने और उसकी पीठ थपथपाने. मगर वो युवक बहुत गुस्से में एक पीठ थपथपाने वाले का हाथ झटक के बोला-- ''अरे शाबाशी गयी भाड़ में..... पहले ये बताओ कि मुझे नदी में धक्का किस कमीने ने दिया था????''
कल के एक गैर महत्वपूर्ण समाचार(गैर महत्वपूर्ण इसलिए कि ये मीडिया के लिए विशेष खबर हो सकती है आम आदमी के लिए अब ये कोई न्यूज़ नहीं रही) पर अचानक नज़र पड़ गयी... हुआ ये कि मीडिया महान का कहना है कि उनके माई-बाप राहुल गाँधी मुंबई की लोकल ट्रेन में चढ़े नहीं बल्कि चढ़ाये गए थे.. :) .. हुआ ये कि राहुल का प्लान था कि स्टेशन पर ही जनता-जनार्दन को दर्शन देकर कार से काफिले को आगे बढ़ाएंगे. लेकिन इतनी सुरक्षा के बावजूद जाने किसने उसे ऐसा धक्का दिया कि वो भी आम लोगों कि तरह हवा में तैरते हुए डब्बे के अन्दर पहुँच के अमरुद बन गया(वैसे वीडियो रेकॉर्डिंग में ऐसा कुछ दिखा तो नहीं). अब जो हो गया सो हो गया.. लेकिन इस बिना पूर्वनियोजित कारनामे से अच्छी खासी प्रशंसा तो मिल गयी... और राहुल कम से कम उस चुटकुले के युवक की तरह बेवक़ूफ़ तो था नहीं कि तारीफ के बाद भी चिल्लाये कि-- '' पहले ये बताओ कि धक्का किसने दिया???'' लेकिन सुनने में आया है कि जांच एजेंसियां ये पता लगाने में दिन-रात लगीं हैं कि धक्का(वैसे पहला धक्का कहना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सबने ही धक्के लगा के अन्दर ठेला होगा) आखिर दिया किसने?? मैं कुछ ऐसे सोच रहा था कि भाई हमारे यहाँ कई ऐसे क्षेत्र हैं कि वहां लोग पीछे से धक्का देके, पटक के चाक़ू चलाते हैं और जान निकाल के चले भी जाते हैं, चाक़ू, छुरा लहराते हुए...मगर F.I.R. लिखने के वक़्त थाने की स्याही ख़त्म हो जाती है इसलिए शिकायत ससुरी लिखी नहीं जाती... यहाँ देखो-- एक धक्के से वाह-वाही भी मिली और फिर जांच एजेंसियां उस मरदूद के पीछे पड़ गयीं सो अलग कि 'आखिर धक्का दिया तो दिया किसने'(और जिस आतंकवादी ने सारे देश के दिलों को धक्का दिया, सदमा दिया.. वो अभी तक हिन्दुस्तानी बिरयानी खा रहा है..) मेरी बात पर भरोसा नहीं तो नीचे लिंक दिया है खुद ही देख लीजिये-
राहुल को धक्का किसने मारा...

चलिए इसी बात पर प्रेम के स्वरुप को परिभाषित करती एक और कविता का कुठाराघात सहन करिए... जिसमे बताने की कोशिश कर रहा हूँ की प्यार में मैं कैसा रिश्ता चाहता हूँ.. मुलायजा फरमाएं---

देह नहीं बस नेह का रिश्ता
बिना किसी संदेह का रिश्ता
आती-जाती साँसों जैसा
एक सरल संवेग का रिश्ता
                                 उसके दिल में क्या चलता है
                                 ये खुद के दिल से जान सकूं
                                 एक स्रोत से जो निकला हो
                                 वो दर्दों के आवेग का रिश्ता
तन को वैसे आवश्यक है
हर फल का आहार मगर
दीर्घायु से जुड़ा है जैसे
इक ताज़े अवलेह का रिश्ता
                                  सबकुछ होकर भी कुछ ना हो
                                  औ कुछ ना होकर भी सबकुछ
                                  कुंती से वो जुड़ा था जैसे
                                  सूर्यपुत्र राधेय का रिश्ता
यूँ तो यथार्थ भी निर्देशक है
कितनी सारी रचनाओं का
कल्पनाओं से कवि का हो पर
ज्यों पावन सा स्नेह का रिश्ता
दीपक 'मशाल'
चित्र-साभार गूगल से...

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

दौड़ के आओ.. देखो कौन दम तोड़ रहा है???? ----->>>>>>>>>दीपक 'मशाल'

माहौल बड़ी तेजी से बदल रहा है.. शहर बढ़ रहे हैं और संवेदनाएं घट रही हैं......
ये सब किसी दिलचस्प फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं बल्कि बदलते परिवेश का सच है. आज के लोगों को पड़ोसियों का पता या
ख्याल रखना तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं साहब.. आलम ये है कि बड़े शहरों में कई लोगों को तो ये तक नहीं पता
चलता कि उनके बच्चे किस क्लास(कक्षा) या स्कूल(विद्यालय) में पढ़ रहे हैं.. या उन लोगों के खुद के माँ-बाप किस हालत में हैं. यह बात तो सभी को पता है कि ये अर्थयुग है.. मगर इसका मतलब ये तो बिलकुल नहीं कि सिर्फ और सिर्फ पैसों के पीछे ही भागा जाये. सारे विश्व में आज मानवीय संवेदनाएं डॉलर्स, पौंड या रुपये की चकाचौंध के आगे हथियार डालती नज़र आ रही हैं.. ऐसे में कई बच्चे अपने माँ-बाप के प्रेम के दो बोल सुनने को तरसते रहते हैं. वे प्रेम ना पा पाने के कारण उचित परवरिश व देखरेख के अभाव में खीझकर, एकाकी जीवन से ऊबकर हिंसक और अपराधी प्रवृत्तियों की ओर मुखातिब होते हैं. लग रहा है जैसे हमारी भावनाएं, संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं और हमारा ध्यान कहीं और है.. किसी के पास समय नहीं है. शहरियों के लिए तो एक बिलकुल सटीक टिप्पणी किसी ने की थी कि- 'इनके पास तो मरने का भी टाइम नहीं भाई..'
समाज में पुनः संवेदना की जान फूंकने के लिए उरई की 'इप्टा' इकाई ने १० साल पहले एक नाटक की रचना की  थी... नाम था 'ढाई आखर प्रेम के'.. जिसमे कि गिरते मानवीय मूल्यों की वास्तविकता दर्शाई गयी थी. यह एक सच्ची कहानी पर आधारित नाटक था जिसमे कि एक काफी लब्ध-प्रतिष्ठित उद्योगपति अपने बच्चे को टयूशन पढ़ाने वाले अध्यापक को एक दिन जब बच्चे को कबीर के दोहे 'ढाई आखर प्रेम का' अर्थ समझाते देखता है तो आगबबूला हो जाता है और उसे नीति के दोहे पढ़ाने से मना कर देता है साथ ही हिदायत देता है कि बच्चे को सिर्फ और सिर्फ चक्रवृद्धि ब्याज और गणित इत्यादि विषय पढ़ाये जाएँ. उसका मानना था कि हिंदी और उसके दोहे बच्चे का मन भटका कर उसे वैराग्य का रास्ता दिखलायेंगे जो कि सबके लिए घातक है..
कुछ समय पश्चात् उस अध्यापक की नियुक्ति किसी अन्य शहर में हो जाती है. १२ वर्ष निकल जाते हैं.. एक दिन जब उस अध्यापक का उसी शहर में पुनः आगमन होता है तो वो उस उद्योगपति से मिलने जाता है. उसके घर पहुँच कर देखता है कि सारा नज़ारा ही बदला हुआ है.. उस पूंजीपति ने वृद्धावस्था और बीमारी के चलते खाट पकड़ ली होती है.. अध्यापक से मिलकर वह फूट-फूट कर रोने लगता है... उसे अपने जीवन की इस सबसे बड़ी गलती का बड़ा प्रायश्चित होता है कि उसने मानवीय संवेदनाओं को ज़रा भी तवज्जो ना दी. उसे लगता है कि उसने भयंकर भूल की. आज वह अपने इकलौते बेटे से त्रस्त था क्योंकि उसका पुत्र भी उसी की तरह धनलोलुप बन चुका था. वह अपने पिता की दवाओं और डॉक्टरों का इंतज़ाम तो कर देता था लेकिन खुद उनके पास कभी ना जाता क्योंकि उसे खुद अपने ही पिता से घिन आती, उनके रोगी शरीर की दुर्गन्ध वो बर्दाश्त ना कर पाता था.  इस प्रकार अंतिम समय में ही सही लेकिन उस व्यापारी को मानवीय संवेदनाओं का मूल्य पता चलता है. लेकिन हमारे पास तो अभी समय है और यदि हम अभी भी चेत जाएँ तो मानवता पैसे पर पुनः हावी हो सकती है, वर्ना भविष्य का मानव सिर्फ एक मशीन बनकर रह जायेगा जो धन-दौलत के ईंधन से चलता होगा..
साथ में एक कविता फ्री----
आज की तेज़ बारिश और कडकडाती सर्दी ने
हमें कल की गुनगुनाती धूप की कीमत तो बता दी,
जिसे हमने जाया कर दिया था यूँ ही
किसी अब याद ना पड़ने वाले कारण की दौड़-धूप में...
काश तब समझ पाते और ले पाते लुत्फ़
उस धूप के चार दिनों का
जो गिनती के मिले दिनों में
सबसे सुहाने दिन थे.. पर अब तो निकल गये शायद..
चलो अब सर्दी के तकलीफ भरे दिन ही
खुशी से जी लें यारों..
चाय, समोसे, पकौड़े और चटपटी चटनियों के संग ही सही..
पर जियें तो......  :)
दीपक 'मशाल'

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

इसे भी बताइए ज़रा कैसी लगी???------>>>>>दीपक 'मशाल'

आज से करीब १० साल पहले किशोरावस्था में मैंने और मेरे एक मित्र मोहम्मद शाहिद 'अजनबी' ने मिलकर एक छोटी सी साहित्यिक पत्रिका निकाली थी, नाम था... नई कलम... उभरते हस्ताक्षर.. ३-४ अंक बाद भी जब वो चली नहीं और ना ही ज्यादा लोगों की नज़रों में आई तो समझ आ गया था कि ये सब हम बच्चों का खेल नहीं... फिर मैं अपनी ग्रेजुएशन(बी.एससी.) की पढ़ाई में लग गया और वो बी.टेक. करने में..
अभी करीब डेढ़ साल पहले इसी नाम से उसने ब्लॉग बनाया... पीछे मुड़ के देखते हैं तो बचपने पे हंसी आती है .. कि चले थे २००० रुपये में साहित्यिक पत्रिका निकालने...
उन्ही अज़ीज़ दोस्त शाहिद 'अजनबी' साहब की लिखी एक रचना आपके हाथों सौंप रहा हूँ.. बताइए ज़रा कैसी लगी???
दीपक 'मशाल'

तुम्हें क्या मालूम ये शादी का घर है ?
वो शादी का घर है
वहां बहुत काम है
तुम्हें नहीं मालूम ?

क्या -क्या नहीं लगता
इक शादी का घर बनाने के लिए
कोने- कोने से टुकड़े जोड़ने होते हैं
तब जाके कहीं एक बड़ा सा-
नज़रे आलम में दिलनशीं टुकड़ा
शक्ल अख्तियार करता है
तुम्हें क्या मालूम।

नहीं कटा वक़्त
उठाई कलम लिखने बैठ गए
अच्छे खासे मौजू का बिगड़ने बैठ गए
नहीं कुछ मिला
तो किसी का सुनाने बैठ गए
हद तो तब हों गयी
जब किसी का गुस्सा
किसी और पर उतारने बैठ गए

तुम्हें क्या मालूम ?
बर्तन , जेवर , बेहिसाब पोशाकें
कहाँ -कहाँ से पसंद करनी होती हैं?
नहीं , फब नहीं रहा है
वो देना तो जरा
न जाने ऐसे कितने लफ्ज़
गूंजते ,बस गूंजते रहते हैं
तुम्हें क्या मालूम।

बस उठायी किताबें पढने लगे
कभी फिजिक्स , तो कभी मेथ्स
नहीं लगा मन
तो अदब उठा लिया

अरे तुम क्या जानो ज़िन्दगी जी के
कभी किताबों और माजी के पन्नों से
बहार निकलो
ज़िन्दगी रंगीन भी है।
तुम पन्ने ही रंगते रह जाओगे
और दूर कहीं आसमानों में
कोई एक अदद ज़िन्दगी बसा लेगा
तुम्हें क्या मालूम।

तुम्हें क्या मालूम?
होटल का ऑर्डर
खान्शामा का इंतजाम
बाजे वाले का एडवांस
और भी बहुत से
करने होते हैं इंतजाम
शादी का घर है न ?
तुम्हें क्या मालूम।

वहां तुम सिसकते रहते हों
कभी तड़पते रहते हों
सुना है आजकल बेचैन रहते हों
कुछ नहीं मिलता
तो पागलपन ही करते रहते हों
देखो, तुम खुद ही देखो
वही पुरानी जगह बैठकर
जहाँ सुनाया था हाले दिल
किसी का कभी
शिद्दत से लिखे जा रहे हों
जबकि जानते हों
कोई पढने वाला भी नहीं है तुम्हें
तुम्हें क्या मालूम?
- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
चित्र- साभार गूगल से...

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

लो कुछ कार्टून मेरे भी झेलो अब ...----->>>>>>दीपक 'मशाल'

वैसे तो ये कार्टून मैंने केंद्रीय औषध अनुसंधान संस्थान( Central Drug Research Institute या C.D.R.I. ) लखनऊ के बिगड़ते हालात को देख २००३ में बनाया था जब मैं वहीँ एक प्रशिक्षु के रूप में रहता था...
मगर क्या ये कार्टून आज हमारे देश की वर्तमान हालात के परिप्रेक्ष्य में ये फिट नहीं बैठते???
बताएं जरूर...(सभी कार्टून पेन से मैंने ही बनाये हैं जिनके चित्र यहाँ लगा रहा हूँ) कुछ फ़िल्मी सितारों के कैरीकेचर भी हैं आप की इज़ाज़त हो तो वो भी कभी दिखाऊं???

१- जब सी.डी.आर.आई. अस्तित्व में आया...
२- उसके १० साल बाद...
३- कुछ साल और...
४- दसेक साल और बाद...(यानी वर्तमान)
५- अब ये हैं भविष्य के हालात- (भाई जैसे जैसे सफल संस्थान या विकसित देश होने के दिन करीब आते जा रहे हैं.. मंजिल असंभव सी लगने लगी है...


दीपक 'मशाल'

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

प्रेम के दुश्मन.. हाय-हाय.. भारतीय किसान यूनियन.. हाय-हाय...--------->>>>दीपक 'मशाल'

'प्रेम अध्यात्म की उपज है और अध्यात्म की ओर उन्मुख करता है' यह सीधा सपाट वाक्य स्वयं में बड़ा गहरा और विस्तृत रहस्य सिमटे हुए है. खासकर जब श्रृंगारिक प्रेम की बात हो तो निश्चित ही इस शब्द की स्वाभाविक मिठास में इजाफा हो जाता है. वैसे तो ये परम सत्य है कि प्रेम की परिभाषा इतनी विस्तृत है कि इसमें ना सिर्फ प्राणिमात्र का आपस में खिंचाव प्रकट होता है बल्कि निर्जीव-सजीव का आपसी आकर्षण भी समाहित होता है.
मगर दुखद है कि मानव सभ्यता को विकसित हुए आज हजारों साल हो जाने के बाद भी ज्यादातर संयोग-श्रृंगार प्रेम जब व्यवहार में आता है तो उसका नाम ही ज्यादातर लोगों के कान खड़े और मुँह कसैला कर जाता है तो कुछ को गप्प मारने का चटपटा मसाला मिल जाता है.. जबकि वही संयोग श्रृंगार हम कविता-कहानियों और पाठ्य पुस्तकों में राधा-कृष्ण, लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, पृथ्वीराज-संयोगिता, अर्जुन-सुभद्रा, सोहनी-महिवाल और हीर-रांझा के रूप में पढ़ते हैं तो  बड़े खुश होते हैं... पर जब यही पात्र किसी अन्य नाम से हमारी आँखों के सामने आ जाते हैं तो हमारी नज़र ही बदल जाती है. लोग लड़के को तो बदनाम करते ही हैं, लड़कियों की तो जिन्दगी ही बर्बाद कर डालते हैं.. और ये सब उन्ही के द्वारा होता है जो रोज सबेरे मंदिर में राधे-श्याम चिल्लाते हैं या मोहब्बत को रब का दूसरा नाम कहते हैं..
जबकि ये तथ्य ना तो किसी से छुपा है और ना ही बोलने योग्य है कि प्रेम अंतरात्मा की आवाज़ है. जब प्रेम हमारे मन-मस्तिष्क पर दस्तक देता है तो पवित्र आत्मा स्वयं गवाह बन जाती है. प्रेम जैसे पवित्र शब्द के साथ सच्चा उपसर्ग जोड़ना उसका अपमान ही होगा, क्योंकि चन्दन की पवित्रता की तुलना नहीं हो सकती. जो खुद ही अपने आप में कसौटी हो उसके लिए कैसी कसौटी??
आज विज्ञान और कला के क्षेत्र में भले ही कहें कि हम २१ वीं सदीं में आ गये हैं लेकिन प्रेम का रूप कुछ स्वार्थी तत्वों की वजह से बिगड़ा ही है उसके सम्मान में कोई वृद्धि ना हो पाई. आज भी हम प्यार को उतनी ही हेय दृष्टि से देखते हैं जितने की से  आज से सदियों पहले देखते थे. वस्तुतः यही कारण है कि यदि भरे बाज़ार में, अपने परिवार या पत्नी के साथ जा रहे, किसी व्यक्ति से पूछ दिया जाये कि ''क्या आपने कभी किसी से प्रेम किया है?'' तो एक बारगी तो वो सकपका जायेगा और फिर सम्हलकर ज्यादातर झूठा ही जवाब देगा कि 'जी नहीं किया'.. जबकि ये सच है कि भले ही एक तरफ़ा हो लेकिन हर इंसां को अपने जीवन में किसी से प्रेम होता अवश्य है, ये दिल किसी ना किसी पे आता जरूर है. ये कतई संभव नहीं कि कोई ताउम्र प्रेम के मार्मिक स्पर्श से वंचित रहे. मगर लोग खुलकर डंके की चोट पर कभी ये स्वीकार नहीं कर पाते कि हाँ उन्होंने प्रेम किया है. हरबार, हर युग में जब प्रेम करते हैं तो प्रेमी-प्रेमिका परस्पर वादा करते हैं कि हम जुदा होने पर भी आजीवन एक दूसरे को याद रखेंगे और जो हमारे साथ हुआ अपने बच्चों के साथ कतई ना होने देंगे.. लेकिन होता क्या है? ठीक इसके उलट... जब वो माँ-बाप बनते हैं तो ठीक वैसे ही जो कभी प्यार के दुश्मन होते थे. क्या यही प्रेम-चक्र है?? प्रेम-स्रोत जीवन भर उनके ह्रदय में उद्गमित होते रहने के बावजूद वे इसके अस्तित्व को नकार देते हैं. यही कारण है कि संसार में आजतक ईश्वर द्वारा स्वयं के कर-कमलों द्वारा निर्मित सबसे सुन्दर भावनात्मक रिश्ते प्रेम को वह सम्मान प्राप्त नहीं जिसका कि वह हक़दार है.
रोज ना जाने कितने नए दुश्मन इसके खिलाफ मोर्चा खोल दते हैं.. कभी खुदा के नाम पर, कभी भगवान के नाम पर तो कभी गोत्र के नाम पर जैसा कि अभी भारतीय किसान यूनियन के सर्वेसर्वा महेंद्र सिंह टिकैत ने खोल दिया है... हाई कोर्ट के फरमान की उनके लिए कोई अहमियत नहीं... उन्हें अपने दिमाग घुटने में रखने की आदत सी पड़ गयी है. आपको याद हो तो ये वही रुढ़िवादी लोग हैं जो भारत को वापस १६-१७ वीं सदीं में ले जाने को आतुर है... इनकी मर्जी के खिलाफ शादी करने वाले या प्रेम करने वाले जोड़े को सरेआम फांसी दी जाती है, निर्वस्त्र पूरे गाँव में घुमाया जाता है, दोनों को पत्थर मार-मार कर मार डाला जाता है, उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार होता है या दोनों को आपस में भाई-बहिन बना दिया जाता है और कई बार तो लडकी के साथ उसी के रिश्तेदार बलात्कार जैसे घृणित काम भी कर डालते हैं.. उस समय सारे पाप-पुण्य और खून के रिश्ते भूल जाते हैं.. ये सब हरियाणा, उत्तर-पूर्वी भारत और राजस्थान के कुछ इलाकों में तो होता ही है लेकिन भारत के कई अन्य प्रदेश भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं.
जबकि सब जानते हैं कि प्रेम किसी बंधन को कभी स्वीकारता ही नहीं, ना ही किसी सीमा को, जो लोग यह राज़ समझ पाते हैं वो जी जाते हैं और यह संसार उनके लिए स्वर्ग बन जाता है..
वर्ना हकीकत में हृतिक-सुजैन, शाहरुख़-गौरी, राजीव-सोनिया, नवाब पटौदी-शर्मिला टैगोर, सलीम-हैलेन, सचिन-अंजली आदि जैसे जोड़े भी इस ओछी मानसिकता के शिकार हो गये होते तो प्रेम तो मर ही गया होता. 

दीपक 'मशाल'
चित्र अपनी ही तूलिका से..  

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

मात पे भी मेरी बधाई दे दी...------->>>>>>>दीपक 'मशाल'


मैंने चाहा था उम्र भर के लिए
उसने जन्मों की जुदाई दे दी
साथ रहने का वादा करके
मुझको लोगों की दुहाई दे दी
क़ैद होकर मिरे ही दिल में
मेरी धड़कन को रिहाई दे दी
इक करम माँगा था उल्फत में
तुमने सारी ही खुदाई दे दी
आके जलसे में मेरी खुशियों के
तुमने तोहफे में रुलाई दे दी
दिल को बहला तमाम बातों से
क़त्ल कर के भी सफाई दे दी
मैं मर मिटा इस अदा पे 'मशाल'
मात पे भी मेरी बधाई दे दी...
दीपक 'मशाल'

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

आज की सबसे महत्वपूर्ण पोस्ट....

आज ४ फरवरी है.. तो आप कहेंगे कि इसमें खास क्या है ये तो सबको पता है कि ४ फरवरी है और हर साल ये आती है.. लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि वास्तव में आज की महान तिथि को क्या ख़ास हुआ था ये आप में से किसी को पता नहीं होगा ये मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... और ये शर्मिंदगी की ही तो बात है कि आपको उस महान कवि, गीतकार और भारत माता के सच्चे साधक का जन्मदिन याद नहीं जिसने हिन्दुस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर एक भिखारी तक की आँख में आँसू ला दिया था..और आज भी ला देता है.. अपने उस गीत के माध्यम से जिसके लिए हम गर्व और सम्मान के साथ लता जी को तो याद रखते हैं लेकिन गीतकार को बिसरा देते हैं..

जी हाँ आपका अनुमान सही है वो गीत है 'ऐ मेरे वतन के लोगों... ज़रा आँख में भर लो पानी....' और गीतकार हैं देशभक्ति गीतों के दिवाकर कवि पं. रामचंद्र नारायण द्विवेदी, जिन्हें हम कवि प्रदीप के नाम से जानते हैं..
आज के पुण्य दिन ही कवि प्रदीप पैदा हुए थे. कालजयी देशभक्ति गीतों के रचयिता महाकवि प्रदीप मरकर भी अपने गीतों के माध्यम से देशवासियों के दिलों में देशभक्ति की अलख जगाये हुए हैं. वास्तव में कवि प्रदीप एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे जिन्होंने क्रांतिकारियों को एक नयी ऊर्जा और नयी दिशा प्रदान की. उनके गीतों ने क्रांति की बुझती मशाल में एक नयी जान फूंकी और आज़ादी के बाद भी ये कलम का वीर सिपाही कुरीतियों और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अपनी कलमरूपी तलवार को भांजता रहा.
प्रदीप एक अच्छे और सच्चे कवि थे... सच्चे कवि इसलिए कि सही मायने में एक कवि वो है जो जैसा लिखे वैसा ही जिए.. इसके साथ साथ वो सच्चे, भावुक व साधू इन्सान थे या कहें कि एक सतयुगी पुरुष थे तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी.
उन्होंने लकड़ी की जिस कुर्सी और मेज पर वर्णमाला लिखना सीखा उसी पर बैठकर आखिरी समय तक कवितायें लिखते रहे... उनका कहना था कि 'जब हमारा देश अभी बुरे समय से गुज़र रहा है तो क्यों मैं सिर्फ एक नयी कुर्सी मेज़ के लिए वो पैसे बर्बाद करुँ जिनसे मैं किसी गरीब का पेट भर सकता हूँ'....तकलीफें सहते हुए भी उन्होंने कभी अपने अभावग्रस्त जीवन का जीते जी किसी से उल्लेख नहीं किया. अब कहीं मिलेगा ऐसा स्वाभिमान?
करुणा इतनी कि सिर्फ मनुष्य के लिए नहीं बल्कि एक बेजुबान पक्षी के लिए भी लिखा कि 'पिंजड़े के पंछी रे.. तेरा दरद ना जाने कोय...'
हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद हमारे महापुरुषों को याद करता जागृती फिल्म का उनका गीत ''आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिन्दुस्तान की... इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की.. वन्देमातरम'' आज भी अमर है....
दार्शनिक लहजे में लिखे  गए गीत 'मुखड़ा देख ले प्रानी.. ज़रा दरपन में... देख ले कितना पुण्य है कितना पाप तेरे जीवन में..', 'टूट गयी है माला मोती बिखर चले...', 'तेरे द्वार खड़ा भगवान.. भगत भर दे रे झोली', 'कभी धूप तो कभी छाँव.. सुख -दुःख जिसमे दोनों रहते जीवन है वो गाँव', 'तू प्यार का सागर है.. तेरी इक बूँद के प्यासे हम' और 'कोई लाख करे चतुराई.. करम का लेख मिटे ना रे भाई..' भी सुनने लायक हैं.... सुख-दुःख को जीवन का स्थाई तत्व बताते हुए उनका गीत 'हमने जग की अज़ब तस्वीर देखी..' भी बहुत मोहक है...
जब वह महापुरुष हिन्दुस्तान के बदलते दौर को अपनी आँखों से देखते तो उनका ह्रदय चीत्कार कर उठता था. यही दर्द उनके गीतों 'देख तेरे संसार की हालात क्या हो गयी भगवान्.. कितना बदल गया इन्सान' और 'आज के इस इन्सान को ये क्या हो गया... इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया..' में उभरता है.
सिर्फ ये ही नहीं और ना जाने कितने प्रचलित और कर्णप्रिय गीतों को इन्होने अपनी लेखनी से जन्मा है.. अच्छे कवि होने के साथ-साथ आप एक सम्मोहक आवाज़ के स्वामी भी थे और फिल्मों में गाये गए अपने अधिकांश गीतों को आपने स्वयं आवाज़ दी है....
देखा जाये तो उनके गीतों में आज भी नवयुग निर्माण की क्षमता है. यदि हम अपने प्रियजनों को उनके जन्मदिन पर पं. प्रदीप के भजन कैसेट भेंट करें तो निश्चय ही उस महात्मा को सच्ची श्रद्धांजली होगी.
(नोट- गीत सुनने के लिए कृपया गीत के मुखड़े पर क्लिक करें... गीत सुनें जरूर )
दीपक 'मशाल'

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा है-------->>>दीपक 'मशाल'

चंद महीनों पहले बिहार की राजधानी पटना में एक असहाय लड़की के साथ जो अभद्रता हुई उस को पढ़ के मन में जो विचार उपजे उन्हें शब्द देने कि कोशिश की है... बहुत शर्मनाक है कि आज भी भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा है और हम मूकदर्शक हैं...

 पटना का चौराहा
इक मांस का थी लोथडा,
दहकी हुई सी आज वो,
सबकी ख़ुशी के लिए
घिसती रही थी खुद को जो.
कुछ भिनकती ख्वाहिशों ने,
अपनी खनकती चाहतों को,
करने पूरण वास्ते,
फेंका था कामकुण्ड में
उस मूर्ति इक जागती को,
थे देखते उसको वहां,
तमाशबीन थे जो ज़मा.
सबकी नज़र के सामने,
जब भीड़ थी बाज़ार में,
हो रहा अपमान था,
नारी के सम्मान का.
कुछ सहेजते जाते थे मंजर
जग को दिखाने के लिए.
हय नामर्द हो गया शहर
इक कृष्ण ढूंढे ना मिला.
उस कोमली की लाज की
जल रही थी जब चिता.
सब सोच के खामोश थे,
अपना नहीं ये काम है,
या तो है ये नियति इसकी 
या आएगा कोई राम है.
या खामोश थे सब सोच के
कि लड़की तो ये पराई है,
अभी हमारी बेटी औ बहिन की,
बारी कहाँ आई है.
-दीपक 'मशाल'

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

अंग्रेजों के देश में यूं ही चलते फिरते उपजी एक हिंदी कविता और उसका English रूपांतरण-------->>>>दीपक 'मशाल'

हो सकती थी सोनचिरइया मेरे भी जीवन में इक
इन्द्रधनुष के सातों रंगा सकते थे मुझको भी दिख
होती कुछ ज्यादा ही रौशन रौशनी मेरे जीवन की
जो तुम थोड़े सस्ते होते तो सकता था मैं भी बिक
ऋतु वसंत की हो जाती कुछ ज्यादा ही सुन्दर सी
मैं एकाकी इक मानव हूँ ये टूट भी जाता मेरा मिथ
स्वर्णिमपल कुछ पल सकते थे इक अँधेरे से दिन में
जो अपनी थोड़ी सी साँसें तुम मेरे नाम पे देते लिख
मैं भी फिर विश्वास से कहता अपनी अगली पीढ़ी से
इकतरफा उसका न्याय नहीं जो सबके दिल में रहता टिक..

There could be a golden bird in my life too,
could see all the flying colors
of a rainbow...
Light of this life could be brighter
than its size,
your reduced price might make it possible
to buy you at my cost.
Spring could be more beautiful as well
and eventually it could break my myth
of being all alone.
A few golden moments
could get nourish in a dark day,
with the conditional effect of
payment of some of your breaths to me...
And finally I could also project impartial
to the Almighty,
with a firm belief
to the next generation...

दीपक 'मशाल'
स्कैच अपनी पेन्सिल से...

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

कोहरे के दिनों के लिए खास-----चित्र सहित-------->>>>>>>दीपक 'मशाल'

कोहरे के दिनों के लिए एक खास क्षणिका-

१-
सूरज भी लगता है चंदा
कोहरे का कुछ ऐसा फंदा
आज नज़र वालों को देखा
चलते राह में होके अंधा.

२-
क़त्ल मुजरिम ने किया है
सजा मुलजिम ने पायी है
बेवफा हैं वो लकीरें
जिनसे तेरी आशनाई है
कौन करता जिरह उसके लिए
जिससे काजी की रंजिशाई है
उस शमा का क्या मतलब
जिसके जलते ही सुबहा आई है

३-
ज़िंदगी और ख्वाहिशें कुछ ऐसे मिल गयीं
के मुद्दतों से ख्वाहिशें पैदा हुई नहीं
मचलती नब्ज़ देख के कह गया हकीम
ख्वाहिशें बाकी रहीं बस ज़िन्दगी नहीं..

४-
काश कोई दीवार न होती
तेरी मेरी हार न होती
जीने को जी लेते हम भी
जो तेरी कमी हरबार न होती..

दीपक 'मशाल'
चित्र- अपनी तूलिका से..

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