रविवार, 31 जनवरी 2010

मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैं**********---->>>>>>दीपक 'मशाल'

वफ़ा जो नहीं बेवफा ही सही
चलो याद तो रखोगे तुम,
मेरी खूबी नहीं खता ही सही
चलो याद तो रखोगे तुम.

मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैं
हालात ना पहचानता इसलिए बदनाम हूँ मैं
घात को मैं प्यार दूँ प्यार को देता हूँ घात
रण में हूँ गौतम तो शयन में संग्राम हूँ मैं
हूँ तो मैं मुहूर्त मगर जरा सा बहका सा
दिवाली की सुबहा औ होली की शाम हूँ मैं
न मानता मैं जानकर जात छुपे चेहरों की
सच्चाई के दामन पे झूठा इल्जाम हूँ मैं
उलटी है चाल अब 'मशाल' मिरे मोहरों की
प्यादों से करता काम खुद का तमाम हूँ मैं
आपका-
दीपक 'मशाल'
चित्र- अपनी ही तूलिका से..

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम--------->>>>>>>दीपक मशाल

३ रचनाएँ--

1-
मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम
अदा-ए-खामोशी तुम समझ ना सके
खता लबों की है जो बयाँ ना कर पाए
मगर जुबान-ए-निगाह तुम भी तो पढ़ ना सके
मैंने दिल ही दिल में चाहा है दिल से तुमको
मुझको ग़म नहीं कोई कि प्यार कर ना सके

2-
पता नहीं
बेवफा तुम थे
हालात थे
या मेरे दिमाग के उपजे प्रेत
लेकिन
अगर तुम साथ देते
तो हम इस गिरह को सुलटा सकते थे
प्यार पे लगे इस बदनुमा दाग को
मिटा सकते थे
तुमको भुलाना तो कभी जायज़ ना था
पर हाँ बेवफाई की वजहें भुला सकते थे
अगर साथ देते जो तुम,
इक बार ज़माने से कहते तो मुझे अपना
फिर दिल-ओ-जिगर की तरह मुझको भी गिना सकते थे
बस मेरी खुशी में एकबार मुस्कुराते तो तुम
फिर चाहे तो उम्र भर मुझको रुला सकते थे...

3-
याद में तेरी ना अश्क बहायेंगे
जानते हैं वर्ना सो ना पाओगे
उम्र बिता देंगे इसी उम्मीद पे
लौट के इक दिन कभी तो आओगे
टूट के जब भी बिखर जाऊंगा मैं
बाँधने बाँहों में तुम ही आओगे
ख़ाक होके जब मिलूंगा इस हवा में
सांसों में भरने को तब तो आओगे
पूछती है हर घड़ी तुमसे जुडी
नाम आधा किस तरह भुलाओगे
बीते लम्हे बार बार आते नहीं
कम से कम इतना तो कहने आओगे....

दीपक मशाल
चित्र अपने कैमरे से...

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

एक बच्चे के जन्मदिन में...>>>>>>>> दीपक मशाल


कल
एक बच्चे के जन्मदिन में
गया था मैं,
बड़ा अच्छा मौका लगा मुझे
अपने बचपन में
वापस जाने का...
हमेशा यूं
नदिया बने रहना भी
ठीक नहीं,
कभी
झील बनना भी
अच्छा रहता है...
सोचा, चलो थोड़ी देर ही सही
वक़्त ठहरे ना ठहरे,
मैं ठहर जाऊँगा...
जलसे में पहुंचा तो
भोला सा मासूम बच्चा,
जिसे सब बड्डे बॉय कह रहे थे,
नए कपडों में
मुस्कान बिखेरता मिला...
जब जुट गए सभी मेहमान तो
केक काटने की सुध हुई...
केक काटने और
उससे पहले
मोमबत्तियां बुझाने के बजाए
मुझे वो नन्ही आँखें
मेहमानों के हाथों में थमे
उपहारों के झोले टटोलते लगीं....
मन के सच्चे बच्चों में
अब जन्मदिन मनाने की
ख़ुशी से ज्यादा,
ये उत्सुकता दिखी मुझे
कि क्या दिया है किसने..
उपहार उसे?
उसे होने लगा था अहसास ये कि
बड़े तोहफे देने वाले अंकल
बड़े होते हैं....
और मुझे ये कि
असल मासूमियत, भोलापन और
निश्छलता शब्द
अब सिर्फ शब्दकोष में होते हैं....
अचानक हुई बेमौसम बरसात ने
माहौल थोड़ा बदल दिया.
मेरी टेबिल पर रखा एक
कागज़ मुझसे दरख्वास्त करने लगा
उसको
एक कागज़ की कश्ती में तब्दील करने की....
हाथ जुट तो गए
उसकी मंशा पूरी करने को
मगर...
उस बिचारी को
पानी पे तिराता कौन?
सभी अबोध तो अपने में गुम थे,
ना बारिश से सरोकार उन्हें
और ना बहते पानी से,
तो बारिश में भीगता कौन
और नाव चलाता कौन........
तभी
एक बच्चे के हाथ से फूटे फुकने,
फुकना; जिसे खड़ी बोली में गुब्बारा कहते हैं,
से जोर की आवाज़ जो हुई
तो सबकी नज़र
चली गई थी उधर
एक लम्हे के लिए...
और फिर सब अपने-अपने काम में लग गए...
जाने क्यों याद आया मुझे..
की जब फूटते थे फुकने,
मेरी या दोस्तों की वर्षगांठों में
तो खुश होकर
लगते थे हम उन्हें मुँह में अन्दर खींचके
छोटी-छोटी फुकनी/टिप्पियाँ बनाने में....
और मज़ा लेते थे,
उन्हें दूसरों के माथों पे फोड़ के...
हँ हँ....
अब तो बच्चों को फुकनी बनानी भी नहीं आती...
तभी पीछे की कुर्सी पर बैठा एक बच्चा
कुछ खीझकर बोला-
''मम्मी, कितना टाइम और लगेगा यहाँ,
मुझे घर जाके होमवर्क भी करना है...''
सुन के ऐसे लगा
कि जैसे
बच्चे अब बड़े हो गए हैं,
वो बच्चे नहीं रहे
बच्चे अब बड़े हो गए हैं.....

दीपक मशाल
चित्र अपनी तूलिका से

बुधवार, 27 जनवरी 2010

'अनुभूतियाँ' के विमोचन और समीक्षा की ख़बरें सब एक साथ.. # # # # दीपक मशाल

आप सभी बुजुर्गों के आशीर्वाद, हमउम्रों और अनुजों के प्रेम और शुभकामनाओं के बल पे काव्यसंग्रह 'अनुभूतियाँ' का प्रकाशन और विमोचन संभव हो सका है... समयाभाव और अन्य कई विपरीत परिस्थितियों की वजह से निमंत्रण तो ना भेज सका... इसलिए तकलीफ मुझे भी है.. लेकिन विमोचन की रिपोर्ट लगा रहा हूँ.
 वैसे अधिकाँश मित्रों को तो पता चल ही चुका है लेकिन आधिकारिक रूप से अपने ब्लॉग पर पहली बार ये सब लगा रहा हूँ... आइये देखिये जरूर..

शिवना प्रकाशन, सीहोर और डॉ. कुमारेन्द्र सिंह जी सेंगर, उरई के अलावा हाल में विश्व पुस्तक मेला में 'अनुभूतियाँ' देखें और अनुग्रहीत करे..

आदरणीया निर्मला कपिला मासी जी द्वारा 'अनुभूतियाँ' काव्य-संग्रह समीक्षा

आदरणीया रश्मिप्रभा जी द्वारा 'अनुभूतियाँ' काव्य-संग्रह समीक्षा

बुंदेलखंड टुडे में 'अनुभूतियाँ' पुस्तक विमोचन समाचार

'अनुभूतियाँ' पुस्तक विमोचन समाचार शिवना प्रकाशन ब्लॉग पर

अनुभूतियाँ से सम्बंधित अन्य ख़बरें..




स्नेकांक्षी आपका-
दीपक मशाल

'संविधान सराहना दिवस'...........दीपक मशाल

वैसे तो ये कविता कल ही लगा देनी चाहिए थी, लेकिन आज ही सही...

आज हमें मनाना है,
उस शुभ दिवस को,
हुआ था लागू
संविधान जिस दिवस को.
वो संविधान जो जलता है,
नहीं... जलाया जाता था हर रोज
चौराहे पर....
हाँ वही.. जिसमे
संशोधनों की नई कीलें
ठोक दी जातीं हैं
जब चाहें...और जब ना चाहें तब भी.
हाँ! हाँ! वही संविधान
जिसे दुनिया के संविधानों की
नक़ल की पोथी भी कह देते हैं...
और बदल लेते हैं सफ़ेद लबादों को ओढने वाले
इसे बरसात में बरसाती में..
और सर्दी में शॉल में.
उसी संविधान के
लागू होने की शुभ तिथि
या फिर 'शायद'
एक दिन तीन सौ पैंसठ दिनों में..
कोशिश करते हैं हम मनाने की
'संविधान सराहना दिवस'

दीपक मशाल
चित्र- साभार गूगल से

सोमवार, 25 जनवरी 2010

एक गीत############### दीपक मशाल

ना मिले आसमा ना जमीं मयस्सर होवे
बस तेरी गोद हो माँ जिसमें मेरा सर होवे
अब यही ठान के हम लड़ चले हैं तूफाँ से
के तेरे पैर हों माँ काफिरां दा सर होवे.
ना मिले आसमा.........

दरिया या समंदर हो और ना कश्ती हो
देखते-देखते उस  पार चले जायेंगे
इतनी अरदास है माँ मेरी तिरे चौखट पे
के तेरे बेटे पे माँ तेरी इक नज़र होवे
ना मिले आसमा..........

ख़ाक हस्ती मैं करुँ बुरी नज़र वालों की
रखके सूरज को तेरे सर पे आँख मूंदूं माँ
गिरे जब भी ये बदन मिले आँचल का कफ़न
और मेरी मौत का माँ दूर तक असर होवे
ना मिले आसमा..........

ऐसी हलचल के चिरें सीने सारी तोपों के
हौसले रकीबों के धूल में मिला  डालें
कोई देखे ना पलट के भी तेरे दामन पे
इस कदर रूह का भी मेरी माँ असर होवे
ना मिले आसमा...........

जागे सिंहों के शहर राख ये पड़े जिधर
सारे देशों का शहंशाह हिन्दुस्तान बने
अश्क निकले न किसी आँख से जाने पे
जो भी निकले वो सुर्ख लहू-ए-जिगर होवे
ना मिले आसमा...........
दीपक मशाल

रविवार, 24 जनवरी 2010

आप लोगों से दुआ करने के लिए निवेदन कर रहा हूँ... हिंदी साहित्य के एक ऐसे पुरोधा के लिए########दीपक मशाल

आज आप लोगों से दुआ करने के लिए निवेदन कर रहा हूँ... हिंदी साहित्य के एक ऐसे पुरोधा के लिए जिन्होंने अपना जीवन हिंदी की साधना में निस्वार्थ समर्पित कर दिया, जिन्होंने नयी कविता या छंदमुक्त कविता को एक नया आयाम दिया, जिनकी हिंदी साहित्य पर करीब ७० पुस्तकें आज बाज़ार में हैं मगर फिर भी उन्हें वो ख्याति नहीं मिली जिसकी वो हकदार हैं....
मगर मैं उनकी ख्याति के लिए नहीं बल्कि उनके अतिशीघ्र स्वास्थ्यलाभ के लिए परमपिता से प्रार्थना करने के लिए आप सबसे निवेदन करता हूँ ... वो महात्मा हैं श्रेष्ठ कवि प्रोफ़ेसर महेंद्र भटनागर जी, ग्वालियर.... आपकी उम्र ८५ वर्ष हो चुकने के बाद भी आज भी आप निरंतर हिंदी माता की सेवा में रत हैं.... किन्तु विगत कुछ दिनों से बीमार हैं..... दुआ करें.... उनकी एक तस्वीर भी नीचे देता हूँ....



अब कुछ उल्टा-पुल्टा......

१- ''हमने देखा जो उनको शक की नज़र से
ज़माने को शक हमपे यार हो गया,
हम ढूंढते ही रह गए मौका-ए-इज़हार
और उन्हें किसी और से प्यार हो गया..''

२- दर्द दुनिया का मिटाने के लिए संत हो जाना,
सबके हिस्से में आने के लिए अनंत हो जाना,
तुम्ही से तो सीखी है हम सबने ये अदा
कि विष पी लेना और नीलकंठ हो जाना.

३- तेरे सवालों का मैं कैसे जवाब दूँ,
 कितनी चाहत है ये कैसे हिसाब दूँ,
 तुम्हें पाने को खुद को खोकर जो किये
 उन गुनाहों को मैं कैसे हिजाब दूँ..

४- एक उम्र से ख्वाहिश थी
  कभी मिले तो तेरे
  गले लग के रो लेंगे
  दास्तान-ए-गम-ए-दिल सुनायेंगे तुम्हें....
  
  वक़्त मिला भी तो इतना कि
  या गले लगते या रो लेते
  या ग़म-ए-दिल सुनाते तुम्हें

  हमने सोचा, गले लगें? रोयें?
  या हाल-ए-दिल सुनाएँ तुम्हें?
  और.... वक़्त निकल गया.....

आपका ही-
दीपक मशाल
तस्वीरे अपने ही मोबाईल से...

शनिवार, 23 जनवरी 2010

आज का रंग कुछ अलग ही है... देखने जरूर आइये अपने मसिकागद@मशाल.कॉम पर.... दीपक मशाल..


दोस्तों आज आपके सामने कुछेक पुरानी कवितायेँ, जो कहीं प्यार सिखाती हैं तो कहीं दोस्ती के नए आयाम बतलाती हैं और आखिरी कविता जो बताती है कि आपके कल का असर आअज पर पड़ता ही है आप उसे ख़त्म नहीं कर सकते... और जो आज कर रहे हैं उसका असर आने वाले कल पर पड़ना ही है...,..लिख रहा हूँ... और साथ में दिखला रहा हूँ कुछ तस्वीरें जो मैंने अपने मोबाइल से ली हैं इसके अलावा किसी से आपका परिचय भी कराता हूँ... तो पहले कवितायेँ....

१-
चराग-ए-मोहब्बत बुझते नहीं

आंधियां आयें चाहे कितनी बडीं
धूल जमती नहीं रिश्तों पे इन
रहो तुम कहीं या रहें हम कहीं
रूहें हो जाएँ इक बस वही प्यार है
जिस्म से एक होना मोहब्बत नहीं
क्यों मांगूं खुदा से तुम्हें मैं 'मशाल'
तुम मेरे हो खुदा की अमानत नहीं.

अब कविता दोस्ती पे-
2-दोस्ती का पैमाना-
अक्सर देखा जाता है
क्या और किस वक़्त
दिया हमें,
उस शख्स ने
जो दोस्त कहलाता है.....
सदियों से चला आ रहा यही बस
दोस्ती का पैमाना है
कि बदवक़्त में जो काम आए बहुत
सच्चा दोस्त समझा जाता है.
मगर क्यों नहीं सोचती 
कुछ इस तरह दुनिया
कि क्या दिया हमने हमेशा
उस शख्स को
जिसे दोस्त कहते हैं हम,
क्यों दोस्ती में आड़े लाते हैं स्वार्थ....
जब सोच लोगे तुम कि
क्या दिया तुमने दोस्त को
बिना वापसी की उम्मीद के
उसी दिन
हाँ ठीक उसी दिन
रखोगे तुम पहला कदम
उस दहलीज़ पर
जिसे कहते हैं हम
दोस्ती का पैमाना......

३- आज
अपनी जिंदगी की
अधूरी किताब के
कुछ पिछले पन्नों को
फाड़ने की कोशिश में
मैं
नए पन्ने पे आज का
ये हिसाब भी चढ़ा गया....
और जब 
भरे हुए 
काले पन्ने जलाने बैठा
तो कुछ कोरे भी सुलगा गया.....

दीपक मशाल 
 तो ये हैं वे तस्वीरें जो मैंने कहीं किसी प्लेटफार्म पर लीं तो कोई किसी पुरानी हवेली की.... और कोई बहुत पुराने पुल की....
वैसे दिमाग में और खेल में इनका कोई सानी नहीं (कम से कम आस पास के विद्यालयों में या पूरे जनपद में तो नहीं है) क्योंकि इन्हें अंतर्विद्यालयी स्तर पर सर्वश्रेष्ठ वक्ता प्रतियोगिता का द्वितीय पुरस्कार मिल चुका है जो कि कक्षा ६ से १२ तक के विद्यार्थियों का एक साथ था जबकि दिए गए विषय पर १५ मिनट में सोच कर तुरंत बोलना था... कमाल ही है कि एक बच्चा १२ तक के विद्यार्थियों के बीच द्वितीय भी आये... पढ़ाई में अब्बल हैं तो अभिनय में भी और क्रिकेट में भी... समझ नहीं आता इन्हें बनायें क्या इसलिए सबसे बेहतर समझा कि इनके ऊपर ही छोड़ दें और तब इन्होने कहा कि मैं मॉडल और वैज्ञानिक बनूँगा... अब देखते हैं कितने कामयाब होते हैं ये... आपकी आशीष चाहिए....
 

ये नीचे दो तस्वीरें हैं
श्वेत-श्याम तस्वीर मेरी जिस मित्र की है रंगीन भी उसी की बेटी की ही है जो अभी मात्र २ महीने की है... सुनते थे like father like son.. लेकिन यहाँ तो like mother like daughter हो गया.. :)

ये हैं मेरे प्यारे मिस्टर चिंटू जी(प्रथम भाई) जिनके लम्बे बिना मुंडन वाले बालों कि वजह से इन्हें सब सरदार चिंटा
सिंह जी कहते हैं.... अरे इनकी भोली सूरत और मासूम सी आँखों पे मत जाइये... ये खतरनाक भी चींटा(Male ant) की तरह ही हैं....
और इनके साथ इनकी दीदी मेरी प्यारी बहिन साक्षी जी(ये सच में शराफत की प्रतिमूर्ति है)
 
फिर से मास्टर तथागत जी
ये हैं कविवर श्री भवानी शंकर लोहिया ''बन्धु'' जी मेरे बाबा के मित्र और वो कवि जिन्होंने मुझे 'मशाल' नाम प्रदत्त किया...
ये किस तरह के कवि हैं ये बताने के लिए सिर्फ इनकी बहुत ही मामूली २ पंक्तियाँ यहाँ दे रहा हूँ बाकी आप स्वयं ही समझ दार हैं-
''यज्ञ तुम हो आहुति मैं,
तुम मलय मैं गंध हूँ.
देवता तुम मैं पुजारी
गीत तुम मैं छंद हूँ..''

पुस्तक 'अनुभूतियाँ' विमोचन के अवसर पर....
और ये रही वो पुस्तक

कैसा लगा ये सफ़र बताएं जरूर...
आपका ही-
दीपक मशाल

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

''अरे नहीं दीपक भाई ये आपको हो ही नहीं सकता, हमारा प्यार जो आपके साथ है''.......ये ब्लॉगवुड का आपसी प्यार नहीं तो और क्या है?????????दीपक मशाल

 अभिभूत हूँ मैं आप सबके द्वारा वर्षाये गए इस निःस्वार्थ प्रेम से... मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि एक इतनी सी छोटी सी बात पे आप सब लोग मुझे इतना स्नेह और संबल प्रदान करेंगे, क्या पता था कि मुझे तकलीफ होने के आभास भर से महफूज़ भाई रो पड़ेंगे और शीर्षक बदलवा देंगे.. ये कहने के साथ कि '' दीपक, खुद को हमेशा अच्छा कहो.... I am the best का फंडा लेकर चलो.... हमेशा खुश रहो.... और सूपीरिअरिटी काम्प्लेक्स डेवलप करो.... सारी बीमारी दूर भाग जाएगी.....'',  मेरी अदा दी किसी शर्त पे ये नहीं मानेंगीं कि ये बीमारी मुझे किसी शर्त पे नहीं हो सकती... और ये दृढ विश्वास देंगी कह के कि ''ऐसा कुछ भी नहीं है..पहली बात तुम्हें टी.बी हो ही नहीं सकती...ये बिमारी रातों रात नहीं होती...दूसरी बात अगर हो भी गई तो इस्ला इलाज है और बहुत आसन इलाज़ है.. अब मुझे कल अपने बारे में लिखना पड़ेगा...तुम तो अनुमान लगा रहे हो कि ऐसा कुछ होगा...और मैं ?? खैर कल बताती हूँ.. मेरे प्यारे भाई को कुछ नहीं हुआ है... हाँ .. ज्यादा बुखार में लोग बडबडाते हैं और तुम वही कर रहे हो..''
ब्लॉग जगत के और बेशक मेरे भी प्रिय अजय झा भैया  और ज्येष्ठ भ्राता खुशदीप जी तो भावातिरेक में सीधा डांटना शुरू कर देंगे कह के कि '' ओए लडके अब पिटेगा तू , अबे नज़ला ,जुखाम, खांसी ..और कहां से कहां ..सारे जीवन के फ़लसफ़े पढ डाले , एक काम कर कल से कुछ मत लिख , कुछ दिन किसी अंग्रेजी मेम के साथ थ्री इडियट देख के आ , उसको बताना कि रणछोड्दास श्यामलदास चांचड ही बाद में फ़ुनसुक बांगडू बनता है ,आज बहुत ही गुस्से में हूं इसलिए ऐसे लिख रहा हूं , अबे कुछ नहीं होगा मेरे भाई , बस तबियत थोडी खराब है , ठीक हो जाएगी । अपना ख्याल रखो और ज्यादा मत सोचो , समझे कि और समझाऊं ??'' .....
खुशदीप भैया के शब्दों में- ''अरे भइया दीपक, तुझे तो अच्छा खासा वापस भेजा था...ये कौन सी भूतनी तेरे सिर पर बैठ गई है जो बहकी-बहकी बातें कर रहा है...अरे तू भारत में दो महीने लगा कर वापस गया है...भारत और उत्तरी आयरलैंड की आबोहवा में खासा फर्क है...प्रतिरोधक शक्ति कम होने की वजह से नजला-जुकाम के कीटाणुओं ने तुझे आ घेरा...बस इतनी सी बात है...
थोड़े दिन उस फिज़ा में रहेगा, फिर एडजस्ट हो जाएगा...माना तू कवि आदमी है...कोमल दिल वाला है...लेकिन इस तरह दिल पर लेना ठीक नहीं है....अपने महफूज़ उस्ताद से ही कुछ सीख...किस तरह तमाम परिस्थितियों के बावजूद अपने पर भरोसा करता है...कहीं भी भिड़ने को तैयार रहता है...ऐसी ही स्प्रिट की ज़रूरत है...अरे ये बीमारी-वीमारी कुछ नहीं बस मन का वहम होती हैं...बस टाइम पर दवा ले और सब कुछ भूल जा...तुझे कुछ नहीं हुआ है...ये मैं कह रहा हूं...और तू मेरी बात पर भरोसा करता है, ये मैं जानता हूं...''
उधर डॉ. कुमारेन्द्र चाचा जी भी डपटने लगे कि- ''दीपक तुमसे अब गद्य लिखने को कहा था पर ऐसा नहीं. अभी तुमसे मरने जैसी बातों की नहीं वरन अनुभूतियाँ जैसी और दूसरी पुस्तकों की अपेक्षा है. भले ही ये आलेख हंसी मजाक के मूड में लिखा हो पर...!!!!!!!!'', उधर संगीता पुरी आंटी, शिखा वार्ष्णेय  जी, ने पूरा भरोसा जताया कि मैंने ग़लतफ़हमी पाल ली है और जल्दी ही मेरे पूर्णतः स्वस्थ होने का दावा किया... तो रश्मि रवीजा जी तो संदेह ही करने लगीं ये कह के कि- ''ओह्ह ये दीपक मशाल की ही पोस्ट है या किसी आठ साल के बालक की...ऐसे भी कोई घबराता भला ....वैसे समझ सकती हूँ आप बहुत अकेलापन महसूस कर रहें हो..खासकर अभी अभी यहाँ से लौट के जाने के बाद..ज्यादा ही मिस कर रहें हो...chill बाबा कुछ नहीं हुआ है आपको..हम सब लिख कर दे दें??..U r fit n fine..b happy :)'', अलबेला खत्री जी ने भी २ बार अपने ही अंदाज़ में हिम्मत बधाई ''बिना पिए ऐसी बहकी बहकी बातें नहीं करनी चाहिए, पाप लगता है, स्वस्थ रहो ! मस्त रहो ! और व्यस्त रहो ! टी. बी. की लोंगफॉर्म अगर टिप्पणी की बीमारी है तो हा हा हा..'', प्रिय अनुज मिथिलेश ने भी अदा दी का समर्थन किया- ''अरे नहीं दीपक भाई ये आपको हो ही नहीं सकता, हमारा प्यार जो आपके साथ है'', घघूति बसूती जी ने अपने साथ घटित उस घटना का जिक्र किया जिसमे डॉक्टर को ही उनकी बीमारी के बारे में गलतफहमी थी लेकिन वो स्वयं में निश्चिन्त थीं और वास्तव में उन्हें कुछ नहीं हुआ था..., राज  भाटिया  सर परिवार के बुजुर्ग हैं इसलिए उन्होंने हिदायत दी कि ऐसी बातें ना करके हस्पताल जाऊं और लौट के उनसे तुरंत फोन पर बात करुँ., आदर्श ब्लॉगर और हर दिल अज़ीज़ समीर लाल जी ने लेख को उसी तरह पढ़ा जैसे मैं पढ़ना चाहता था और समझाया कि, '' आलेख मजाक में लेते हुए बस इतना कहना चाहेंगे कि भाई, किताब डाक से भेज दो...हमारे आने में तो अभी समय है...क्या पता??? किताब रहेगी तो पढ़ लिया करेंगे.. :) कौन टाईप की बातें सोचते हो भाई..अजब आईटम हो!!'', उधर ब्लॉगवुड के संरक्षक पाबला सर जी का प्यार भरा धमकाना इस विश्वास को और मजबूत कर गया कि यहाँ सभी अपने हैं- ''खुशदीप जी जैसा धमकाऊँ??? तुझे तो अच्छा खासा वापस भेजा था...ये कौन सी भूतनी तेरे सिर पर बैठ गई है जो बहकी-बहकी बातें कर रहा उन्ही के जैसा गाना गुनगुनाऊँ तो..... मुश्किल में हो तारे, ना घबराना प्यारे.....गर तू हिम्मत ना हारे, तो होंगे वारे-न्यारे......नहीं समझ आया ना? ओए लडके अब पिटेगा तू'', ज्योति वर्मा जी और अपने कल्पतरु वाले विवेक रस्तोगी जी  ने भी डर कर भागे आने  की बात कही और स्वास्थ्य का ख्याल रखने को कहा,  जाकिर अली भाई  ने उम्मीद पर दुनिया कायम होना बताया तो बबली(उर्मी)जी  ने शुभकामनायें दीं.  गोदियाल सर ने आशावादी सन्देश दिया लिख के कि' ''My Friend,The woods are lovely dark and deep but you have a promise to keep and miles to go .....!'' डॉ. दराल सर ने एक फैमिली डॉक्टर ही नहीं बल्कि बुजुर्ग की तरह जांच-पड़ताल की तो  अवधिया जी समझाया कि, ''दीपक, कुछ भी नहीं हुआ है तुम्हें। आलतू फालतू बातें सोचना बिल्कुल छोड़ दो और मस्त रहो। मैं डॉक्टर नहीं हूँ किन्तु मेरा एक परिचित दवा निर्माता है इसलिये मुझे पता है कि ciprofloxasin सिर्फ सर्दी खाँसी की एक सामान्य दवा है। पता नहीं कैसा डॉक्टर है तुम्हारा जो ऐसी सम्भावना जता दिया उसने। सबसे बड़ा रोग वहम होता है। वहम बिल्कुल त्याग दो और मस्त रहो। कभी कभी सर्दी खाँसी जैसी छोटी बीमारी भी ठीक होने में लंबा समय ले लेती है इसलिये बेकार की बातें सोचना बिल्कुल छोड़ दो।'' शोभना चौरे मैम ने भी मोतियाबिंद के बारे में अपनी आपबीती सुना कर वहम को दूर किया, पंकज मिश्रा जी भी इसी तरह मुझे इस भ्रम से निकलने में मदद की...   श्रद्धा जैन जी ने लेख को उम्मीद के मुताबिक positively लिया और  ललित शर्मा भाईसाब, ने सतोपलादी चूर्ण वाला रामबाण नुस्खा दिया.... डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री जी ने भी स्नेह दिया,   वाणी गीत मैम पोजिटिव attitude अपनाने को कहा और ललित जी के नुस्खे का समर्थन किया, अंत में आदरणीया निर्मला कपिला मासी जी ने दुलारते हुए कहा कि, ''दीपक ! ये क्या? क्यों सब को रुलाना चाहते हो? कितने दिन से तुम्हें कह रही थी कि अपनी सेहत की ओर ध्यान दो। जब से तुम मिले थे मुझे तब से ही चिन्ता थी। खैर अभी रिपोर्ट आने तक इन्तज़ार करो। अगर भगवान न करे कुछ ऐसा भी हुया तो चिन्ता की कोई बात नहीं है। आज कल किस बिमारी का इलाज नहीं फिर जहाँ तुम बैठे हो वहां तो और भी अच्छा इलाज है। तुम ने मुझे नहीं देखा मेरी बिमारी का तो इलाज भी असंभव था मगर मेरी इच्छा शक्ति ,योगा , अक्यूप्रेशर .दवा सब ने मिल कर मुझे ठीक कर दिया। शायद अधिकतर लोगों ने इस बिमारी का नाम भी नहीं सुना हो। ये समाल वेसेल वेस्कोलाईटिस थिऔर आज मैं सब काम करती हूँ। पूरा दिन काम करती हूँ। कम से कम ये सब कहने से पहले अपनों के बारे मे तो सोचो उन्हें कितना दुख होगा कह देना आसान है। इसमे सिर्फ इच्छा शक्ति और खुराक काम करती है । दवा के साथ अच्छी खुराक न लो तो नुकसान होता है और कुछ परहेज भी किया करो ठंड से बचो। जल्दी से अपनी रिपोर्ट की कापी मुझे भेजो। मैने जो मेल मे तुम्हें नुस्खा बताया था साथ मे उसे करो 3 माह तक लगातार साथ मे दवा भी लो। लापरवाही बिलकुल नहीं पहले सेहत फिर कुछ और । अगर फिर से ऐसी बात की तो कभी बात नहीं करूँगी। तुम्हारी किताब पढ ली है दो तीन दिन मे समीक्षा लिखूँगी आज कल रीढ की हड्डी ने परेशान कर रखा है इस लिये अधिक देर बैठ नहीं पाती। चलो फिर अपना ध्यान रखना। सकारात्मक सोच हमेशा आदमी को विजय पथ पर ले जाती है..... बहुत बहुत आशीर्वाद भगवान तुम्हें लम्बी आयू और हर खुशी दे।''
ये आपसब लोगों का स्नेह, प्यार और दुलार ही है जो मैं कल से ही काफी बेहतर मह्स्सोस कर रहा हूँ और बुखार तो चला ही गया... धीरे धीरे खांसी और जुकाम भीकम हो रहा है और पीठ और सिर का दर्द भी... डॉक्टर सोमवार को जो कहेगी सो कहेगी लेकिन मुझे अन्दर से महसूस हो चला है कि मुझे कुछ नहीं हो सकता और ये भरोसा आप सब ने ही दिलाया है...
लेकिन इस पोस्ट से मेरा तात्पर्य आप लोगों तक सिर्फ दो सन्देश देना था पहला ये कि मेरी तरह किसी भी बीमारी को हलके से ना लें और लापरवाही ना बरतें वर्ना थोड़ा सा आलस बेवजह का तनाव और शंका पैदा कर सकता है....... और दूसरी बात मौत जीवन कि तरह ही एक सच्चाई है... जिस दिन हम मरने के लिए वैसे ही तैयार रहेंगे जैसे कि जीने के लिए रहते हैं... उसी दिन से मौत भी हमें डराना  छोड़ देगी.. और फिर दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं होगा जो हमारे लिए असंभव हो...क्यों नहीं हम मौत को भी एक चुटकुले कि तरह लें... वर्ना यह हमेशा की तरह से युधिष्ठिर से पूछे गए यक्ष प्रश्न की तरह ही रहेगी... और हमारे दिलों में खौफ भी पैदा करती रहेगी.....
फिर भी ये मेरी ही गलती थी कि अपनी बात को उस तरह नहीं रख पाया जैसे रखना चाहिए था या फिर ये आपका ब्लोग्परिवार के सदस्यों के प्रति स्नेहाधिक्य है...

आगे की पोस्ट के लिए आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप क्या पढना चाहेंगे??? कविता, कहानी, ग़ज़ल या लेख या फिर मेरी पेंटिंग्स या कार्टून या कैमरे से उतारी गयी तस्वीरें देखना चाहेंगे????? इससे मुझे आपकी राय और पसंद पता चलेंगीं इसलिए टिप्पणी में बताएं जरूर... तब तक के लिए एक पुरानी कविता से काम चलाइए---- और ऐसे ही दुलारते रहिये----

आबादी में इतने आगे होकर भी आबाद नहीं
सरकारी एडों में सुनते हम बिलकुल बर्बाद नहीं,
सुनते हैं इतिहास मगर कहते हम इरशाद नहीं
तन से मुक्त हुए हैं लेकिन मन से हम आज़ाद नहीं.

पेट की आग बुझाने को नारी शोलों पे सिंकती है
देखो तो चौराहे पर फिर किसकी बेटी बिकती है,
शाम हुई तो बच्चों में जो भूख किसी को लगती है
राणा के महलों में फिर से घास की रोटी सिंकती है.
सूख गए हय माँ के आँचल इससे बड़ा अवसाद नहीं..
आबादी में सबसे आगे..........

कुछ होंठ प्यास से सूख गए कुछ जोनीवाकर पीते हैं
अंग्रेजी घर तो चकाचक्क हिंदी के कमरे रीते हैं...
बैठ के माँ के आँचल में हम होंठ उसी के सीते हैं
हमसे अच्छे वे कुत्ते हैं जो टुकड़ों पे जीते हैं.
लड़ना खुद से ही है यारों गैरों से कोई विवाद नहीं.
आबादी में सबसे आगे...........

संसद में हैं खड़े भेड़िये भेड़ों की बोली लगती हैं
हिन्दू हैं कुछ मुस्लिम औ कुछ और तरह की दिखती हैं,
जाओ गाय को मारो तुम इक सूकर कोई जिह्वा करो
ये भोली-भाली भेड़ें हैं सब भावनाओं में बिकती हैं.
वोट बनेंगे कैसे गर जो होगा कोई फसाद नहीं.
आबादी में सबसे आगे...........


इक डिब्बे में भरे हज़ार इक में सेठ औ साहूकार
सेवा में सबकी तत्पर है देखो ये भारत की रेल,
शयनयान के डिब्बे खाली औ जनरल का निकले तेल
नेताओं सी अदलाबदली कर दी गर तो जाओ जेल.
जीना हो तो खाकी वर्दी से करना कभी विवाद नहीं.
आबादी में सबसे आगे...........

मार के भैया जाओ जेल फिर कुछ दिन में पाओ बेल
सहाबुद्दीन और पप्पू यादव खेलें अक्कड़-बक्कड़ खेल,
कारागार में मोबाईल है पुलिस-चोर का सुन्दर मेल
हाँ जी गुण्डे पाके पुलिस सुरक्षा खूब मचाएं रेलमपेल.
जीभ जो उनकी चख ना पाए ऐसा कोई सवाद नहीं.
आबादी में सबसे आगे...........

तिरछा  है कानून तराजू सच्चे फिरते डोले डोले
कोयले वाले शिब्बू भैया सीधे-सादे कुछ ना बोले,
कुचल के कितने मासूमों को सल्लू गाए ओले ओले
पत्रकार साहब भी अब तो झूठे सारे चिट्ठे खोलें.
बिक गया चौथा स्तम्भ भी बाकी कोई विषाद नहीं.
आबादी में सबसे आगे...........

बोलो बोलो कीमत बोलो हर बाबू बिक जायेगा
राम नाम का सौदा करके हर साधू बिक जायेगा,
अब भी अगर ना अंकुर फूटे चेतनाओं के बीजों से
खड्गों की नोकों से फिर इतिहास नया लिख जायेगा.
औ मरा पेड़ जीवित जो कर दे ऐसी कोई खाद नहीं.
आबादी में सबसे आगे...........

दीपक मशाल
चित्र अपने ही मोबाइल से...

बुधवार, 20 जनवरी 2010

-उम्मीद-?????????????????दीपक मशाल..

दोस्तों, जब से अपने देश गया शायद उसके कुछ दिन बाद से ही थोड़ी सी खांसी उठनी शुरू हो गयी थी जो कि परहेज़ ना करने, निरंतर सर्दी में यात्रा करने और दवा लेने में लापरवाही करने से आज शायद किसी गंभीर बीमारी में परिणित हो चुकी है..... सोचा यू.के. वापस आके कुछ दिन आराम करने से ठीक हो जायेगा लेकिन यहाँ तो उलट खांसी के साथ जुकाम, पीठ दर्द, सरदर्द और बुखार भी लग गए.. डॉ. को दिखाया तो उसने टी.बी. की सम्भावना व्यक्त करते हुए एक्स-रे कराने के लिए बोला.. अब चूंकि कल डॉ. से मिला था और कल शाम देर हो जाने की वजह से आज एक्स-रे कराया.. मगर रिपोर्ट सीधी डॉ. के पास भेज दी गई और डॉ.स्माइली 5 दिन की छुट्टी पे चली गयीं. तो अब तो सीधा सोमवार को ही मिलेंगीं... तब तक ये अनिश्चितता ही बनी हुई है की मुझे टी.बी. है या नहीं..{वैसे उन्होंने सिर्फ ciprofloxasin 500 mg BD लेने के लिए बोला है(ये जानकारी सिर्फ दराल सर के काम की है)}..

वैसे दिल की बात ये है कि मुझे मौत से डर तो नहीं है..  हाँ लेकिन मैं एक गुमनाम मौत नहीं मरना चाहता... मैं नहीं चाहता कि लोगों को पता भी ना चले कि दीपक मशाल नाम का कोई शख्स इस दुनिया में कभी आया भी था या नहीं.. अभी किया ही क्या है मैंने... अभी तो ईश्वर ने जो कलाएं दीं उनका दुनिया के लिए उपयोग किया ही नहीं... अभी तक तो ऐसा मंच बनाने में ही लगा हूँ जिस पे चढ़ के जब मैं कोई सही बात बोलूँ तो दुनिया मुझे सुने..
अभी तो ढंग से ये भी नहीं पता कि मेरा पहला कविता संग्रह 'अनुभूतियाँ' लोगों के बीच मुझे कितनी पहिचान दिला पाया है :)... खैर ये सब तो मजाक की बात है... लेकिन हाँ अगर मुझे ये सफ़र बीच में ही छोड़ के जाना पड़ा तो जिस उद्देश्य के लिए परमपिता ने धरती पे भेजा उसको पूरा ना कर पाने का अफ़सोस तो रहेगा ही... क्या इसका मतलब ये समझूं कि परवरदिगार को मुझपे भरोसा नहीं कि मैं उनसे किया वादा पूरा कर पाऊंगा..
ये तो पता है कि टी.बी. अब कोई जानलेवा बीमारी नहीं रही(अगर ये मुझे होती भी है तो)अगर ये कोई लाइलाज बीमारी भी हुई तो भी मैं रोते धोते तो नहीं ही मरना चाहता.. मरना चाहता हूँ तो 'आनंद' की तरह........  सबको हँसते हंसाते....लेकिन समस्या यहाँ भी खड़ी होती है, कि आनंद को तो कैंसर हो रखा होता है.. जिसमे कम से कम उसके चाहने वाले अंतिम समय में उसके करीब तो रह सकते थे.. अब यहाँ बीमारी भी ऐसी कि कौन पास आये.. और माँ, बहिन, प्रेयसी जैसे कुछ रिश्ते जो साथ रहना भी चाहें तो मैं उन्हें साथ रहने क्यों दूं... क्यों अपने साथ उनको भी इसके जीवाणु दे जाऊं???
झूठ नहीं कह रहा दोस्तों... डर मरने का नहीं मुझे बस इतना सा है कि ऐसी बीमारी ना हो कि मरते वक़्त अपनों को मुझे खुद ही दूर करना पड़े.... क्योंकि दूर मैं होना नहीं चाहूँगा और इस डर से कि उन्हें कुछ हो ना जाये पास मैं उन्हें लाऊंगा नहीं...
वैसे अन्दर से मेरी इच्छाशक्ति तो यही कहती है कि ''हमको मिटा सके ये किसी बीमारी में दम नहीं.....''
मैं कहीं से नकारात्मक नहीं होना चाहता और ना ही हो रहा हूँ बस दुनिया के एक सच को दिमाग में बिठा के रखे हूँ कि यहाँ कभी भी कुछ भी हो सकता है... और मेरे अजीजों से मेरा यही कहना है कि किसी भी बीमारी के मामले में मेरी तरह लापरवाह ना हों.. वर्ना बेवजह आपके उद्देश्य में बाधा बनते हुए, जीवन के कुछ अतिमहत्वपूर्ण दिन बर्बाद हो सकते हैं.. या क्या पता सारा जीवन भी....

इसी के साथ एक आशावादी कविता -
-उम्मीद-
हर रोज
बिस्तर पर जाने से पहिले
सहसा चली जाती है नज़र...
इन हाथों की लकीरों पर
और....
और इस उम्मीद से कि
काश....
ये कुछ बदल जाएँ कल तक..
और बदल जाए बहुत कुछ
इनके बदलने से..
जैसा कि
लोग कहते हैं अक्सर...
मगर...
हर सुबह
वही नाउम्मीदी,
ना बदलती हैं ये लकीरें
और ना ही हर शाम
बदलती है उम्मीद
इनके बदलने की.......

दीपक मशाल
चित्र- अपने ही कैमरे से...
(नोट-ये आलेख सिर्फ हलके फुल्के मजाक के लिए लिखा गया है इसे ज्यादा गंभीरता से ना लें)

माँ तान ऐसी छेड़ना.........वसंत पंचमी पर विशेष*********दीपक मशाल

आज वसंत पंचमी के महापर्व पर आप सभी विद्वानों को बधाई देना चाहता हूँ एक बार पुनः और स्मरण कराना चाहता हूँ माँ कुमुदिप्रोक्ता का वो आशीर्वाद जो आप सबको किसी को कलमकारी के रूप में मिला है, तो किसी को चित्रकारी के रूप में, किसी को विज्ञानं के क्षेत्र में मिला है तो किसी को किसी अन्य में... येही आपकी शक्ति है जिसे आप देशहित में, विश्वहित में, मानव ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र के कल्याण में लगा सकते हैं....
आज फिर अपने ही मोबाइल से निकाली गई ऐसी तस्वीर लगाता हूँ जो वसंत पंचमी को परिदर्शित करती है...
साथ ही एक प्रार्थना माँ हंसवाहिनी से-



                                         ये चम्बल की घाटी की तस्वीरें हैं...
नवजीवन नवसृजन की
देना हमें तुम प्रेरणा,
हम जड़बुद्धि हों कृत कृतार्थ
माँ तान ऐसी छेड़ना.
                     हम बुद्धि प्रसून  
                     कर प्रस्फुटित,
                     शिव-शक्ति का
                     हम करें सृजन.
करके सुगन्धित
जग सकल को,
करें प्रफुल्लित
हर विकल को.
                     हर अँधेरी जग गुफा में
                     ज्ञान का प्रकाश भर दें,
                     चल रहे भीषण समर को
                     अनंत तक अवरुद्ध कर दें.
हर जीव को समझा सकें
समर्थ भाषा प्रेम की,
देना शक्ति ऐसी अलौकिक
जिसका मिले कोई मेल ना.
               नवजीवन नवसृजन की...... ..
(१२ वर्ष पूर्व लिखी गई कविता है, १६ वर्ष की उम्र में, इसलिए अशुद्धियों को क्षमा करें)
आपका ही-
दीपक मशाल

सोमवार, 18 जनवरी 2010

कुछ तस्वीरें जो नोकिया ५८०० से निकाली हैं आपके सामने रख रहा हूँ............. दीपक मशाल

कुछ तस्वीरें जो नोकिया ५८०० से निकाली हैं आपके सामने रख रहा हूँ, नज़र चाहता हूँ... जब डॉ. दराल सर ने अपना शौक फोटोग्राफी बताया तो उनसे प्रेरणा लेकर मेरे अन्दर का कीड़ा भी कुलबुलाया आखिर मेरे घर में भी पिछले ६० साल से फोटोग्राफी पर काम हो रहा है, मेरे बाबा ने शौकिया शुरू किया फिर प्रोफेशन बना लिया.. तो देखिये कुछ तस्वीरें-














विमान  से ली गयीं डूबते सूरज की कुछ तस्वीरें.. शायद आपको पसंद आयें..


अब इसे देखिये... अगर मैं ये कहूं कि ये किसी प्रेत कि तस्वीर है जो अचानक से सामने आगया तो कौन नहीं मानेगा???? अरे
 साहब ये प्रेत व्रेत नहीं बिल्ली मौसी हैं, जो हमारे घर कि पालतू हैं.. नहीं मानते तो ऊपर से तीसरी तस्वीर दोबारा देखिये समझ जायेंगे...
आपका-
दीपक मशाल

रविवार, 17 जनवरी 2010

मिलन==== अंतिम किश्त.... दीपक मशाल


अचानक किसी ने तेज़ी से कमरे का दरवाजा खटखटाया तो स्तव्या लौटकर वर्तमान में आई. आवाज़ मम्मी की थी-
     ''स्तव्या! बाहर आओ, दिन भर से कमरे में पड़ी हो और यहाँ बाहर सारा सामान रखा हुआ है, जब सफाई नहीं करनी थी तो क्यों शुरुआत की? अभी तुम्हारे पापा आने वाले होंगे उनके लिए चाय भी बनानी है.''
       कमरे से सिसकियों की आवाजें सुनकर उसकी मम्मी का परा और भी चढ़ गया-
     '' हाँ हाँ हम सब तो तेरे दुश्मन हैं, एक वो परिष्कृत ही तेरा सगा है. मुझे तो लगता है ये तेरा......  जानती है, खुद तो मारेगी ही हमें भी बदनाम करके छोड़ेगी तू. इससे अच्छा तो तू पैदा होते ही मर जाती. ये कलंक का डर तो ना रहता हमारे माथे पर.''
     उनकी एक-एक बात स्तव्या के दिल में कांटे कि तरह चुभती थी. रह रह कर परिष्कृत का स्नेहसिक्त  व्यवहार  याद आके उसके नयन खारे पानी से भर देता. यूं तो परिष्कृत को दो दिन बाद घर आना ही था, फिर भी ना जाने क्यों बात करने को उसका जी कर रहा था.
     ट्रिन .... ट्रिन .....
अपने कमरे में लगे फोन की घंटी बजते ही स्तव्या फोन पर झपट पड़ी, ''हैलो .... हैलो ..... हे भगवान्, कितनी लम्बी उमर है तुम्हारी, अभी-अभी तुम्हे ही याद कर रही थी कि...''
   ''अच्छा तो मैडम अब मुझे भूलने भी लगी हैं....'' ठिठोली करते हुए दूसरे सिरे से परिष्कृत बोला.
   '' परिष्कृत प्लीज़, मुझसे ऐसी बात मत किया करो, जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती.'' स्तव्या ने जैसे रूठने का अभिनय किया.
  '' ठीक है मत करो. मैं तो तुम्हे एक खुशखबरी देना चाहता था.''
  ''क्या??'' रोमांचित होते हुए स्तव्या ने पूछा.
  ''लेकिन जब तुम बात ही नहीं करना चाहती तो...........'' परिष्कृत भी उसकी व्याकुलता का पूरा मज़ा लेना चाहता था.
  ''पागल मैं ऐसे कभी कर सकती हूँ क्या? प्लीज़ बताओ ना जल्दी बताओ.'' बहुत अधीर हो उठी थी वो... कहीं ना कहीं उम्मीद जो थी अपनी खुशियाँ वापस पाने की.
  ''मुझे जॉब मिल गई है. अभी थोड़ी देर पहले ही मेरा कैम्पस सिलेक्शन हुआ है. मम्मी-पापा के बाद सीधा तुम्हे ही फोन लगाया...'' उसने खुशखबरी भी हमेशा कि तरह गंभीर आवाज़ में ही सुनाई.
  '' वाओsssssss ! याने भगवान् ने हमारी सुन ली, परिष्कृत परिष्कृत, ये क्या हो रहा है मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा. क्या बोलूँ? कैसे बोलूँ? सारा शरीर मानो थिरक उठा हो... ये हमारी खुशियों की शुरुआत है जान... तुम फोन रखो मैं ये खुशखबरी सबको सुना के आती हूँ...'' बुलबुल की सी चहकते हुए स्तव्या बोली.
  '' नहीं.. अभी किसी को कुछ मत बोलो और मेरी बात ध्यान से सुनो. अभी मैं मार्केट में शौपिंग कर रहा हूँ. सबके लिए कुछ ना कुछ लेना है इस दीवाली... अपने मम्मी पापा और तुम्हारे मम्मी पापा के लिए... ये दीवाली हमारे जीवन कि सबसे बेहतरीन दीवाली होगी. अभी तक मैं चुप था क्योंकि मेरे हाथ में कुछ नहीं था... लेकिन अब मैं अंकल-आंटी से मिल के तुम्हारा हाथ जरूर मांगूंगा. अच्छा ये बताओ तुम्हारे लिए क्या लूं....???''
''तुम.... तुम.... और सिर्फ तुम, बस तुम जल्दी से आ जाओ''
''अरे वो तो ठीक है मगर...''
''अगर-मगर कुछ नहीं, बस तुम आ जाओ मुझे सब मिल जायेगा.''
''चलो फिर ठीक है मैं ही कुछ......''
अचानक दूसरी तरफ आवाज़ आनी बंद हो गई.
''हैलो... हैलो... लगता है फ़ोन डिसकनेक्ट हो गया... ये बी.एस.एन.एल. का नेटवर्क भी ना... तभी सब कहते हैं इसे कि भाई साहब नहीं लगेगा(बी.एस.एन.एल.)''  खुशखबरी से उत्तेजित स्तव्या थोड़ी बडबोली हो गई थी. ख़ुशी ये भी थी कि परिष्कृत ने अपने दिल में जो ठान लिया था वो दृढ शब्दों में ज़ाहिर कर दिया अब उसे भरोसा हो चला  था कि इस जनम में ही वो दोनों एक दूजे के पास रह सकेंगे, एक दूसरे को देख के जी सकेंगे..
स्तव्या कमरे से बाहर खुली हवा में आ गई. जिस घर में आज से पहले तक वो घुटन महसूस करती थी आज वो ही उसे प्यारा लग रहा था. कहाँ कभी तो वो ईश्वर से अपनी बुरी किस्मत का रोना रोती थी और कहाँ आज उसी कीस्मत के लिए इस्क्वर का शुक्रिया अदा कर रही थी.लगता था जैसे पंख निकलने के बाद कोई चिडिया आज घोंसले से बाहर डाल पर आई है.
      ये सभी के लिए पश्चिम से सूरज निकलने जैसी बात थी कि हमेशा रोई सी रहने वाली स्तव्या आज चहक रही थी, छोटी सी बच्ची की मानिंद उछल-कूद रही थी. मम्मी को तो लगा उसपर उनकी बातों का असर हो गया है. उधर
 स्तव्या के दिल में जैसे इन्द्रधनुषी रंग उतर रहे थे, मगर एक खामोश सा डर भी था कि अगर कहीं पापा ने इस रिश्ते से इंकार कर दिया तो, अगर कहीं अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए परिष्कृत को कोई नुक्सान पहुँचाया तो.... . लेकिन उसकी खुशियाँ इस नकारात्मक सोच पर, इस डर पर भारी पड़ रही थीं.
        शाम को जब वो पापा के लिए चाय बना कर उन्हें देने गई तो दिल्ली में बम धमाकों की न्यूज़ सुनकर स्तब्ध रह गयी.
     '' पता नहीं पापा क्या मिलता है इन आतंकवादियों को इतने मासूमों का खून बहा के, कितने लोगों की जानें ले लीं इन्होने कितनों की खुशियाँ छीन लीं. कहते कहते स्तव्या भावुक हो उठी.
      चाय पीते हुए स्तव्या को याद आया कि- 'परिष्कृत भी तो मार्केट में शौपिंग कर रहा था, पता नहीं वो किस मार्केट में था... हे भगवान् कहीं सरोजनी नगर में ही तो नहीं...'
 ''नहीं उसे कुछ नहीं हो सकता मेरे परिष्कृत को कुछ नहीं हो सकता..'' पापा का डर भूल के चीखती-भागती हुई सी स्तव्या अपने कमरे में पहुँची. १ मिनट में उसका मन सैकड़ों अनचाही आशंकाओं के बारे में सोच चुका था. कमरे में आते ही उसने परिष्कृत को फ़ोन लगाने की कितनी ही नाकाम कोशिशें कीं. लेकिन कई कोशिशों के बाद भी उसका मोबाइल स्विच्ड ऑफ आ रहा था. रात गहराने के साथ साथ उसकी घबराहट बढ़ती ही जा रही थी. दोनों हाथ जोड़कर वह बस एक ही रट लगाये थी-
   '' हे भगवान्, तू मेरी जान लेले लेकिन मेरे परिष्कृत को कुछ ना होने देना, तू मेरी सारी खुशियाँ लेले मेरा दामन दुखों से भर दे लेकिन उसको एक खरोंच ना आने देना...''
  पहली बार पापा को भी उन दोनों के बारे में पता चला था, गुस्सा तो बहुत आया लेकिन एक अनजानी आशंका और हालात को ध्यान में रख उन्होंने बाद में निपटने की सोच ली.

स्तव्या ने बराबर टी.वी. सेट से चिपके रह कर रात काटी. बराबर परिष्कृत का मोबाइल ट्राई करती रही. सुबह का उजाला फैलने को था, लेकिन स्तव्या की आँखों में नींद कहाँ? सुबह के समाचारों में मृतकों की सूची जारी की गयी थी. तब तक मम्मी भी जाग गयीं. उद्घोषिका का एक-एक शब्द स्तव्या को कानों पे घन के जैसा लगता, हर नाम आने से पहले दिल तेज़ी से धड़क जाता.
'' ..... कल दिल्ली में आतंकवादियों द्वारा किये गए भीषण बम-ब्लास्ट की सभी राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों ने भर्तसना की और ऐसे संकट के समय में भारत सरकार को धैर्य से काम करने की सलाह दी. साथ ही एक बार फिर आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आहवान किया. प्रधानमंत्री ने ऐसे कृत्यों की घोर निंदा करते हुए इसे कायरतापूर्ण बताया. सबसे भयानक विस्फोट सरोजिनी नगर में हुआ... इसमें पहिचान के आधार पर मृतकों के नाम हैं-- कंवलजीत
 कौर, मोहन हेगड़े, अवनीश सहगल, सीमा दुग्गल, परिष्कृत कश्यप ...... ''
अचानक कमरे में सिसकियों की आवाजें सुन स्तव्या के पापा भी जाग गए. सारा माज़रा समझते ही उनकी आँखें भी नम हो गयीं.
स्तव्या के पीछे खड़े मम्मी-पापा को पहली बार दिल से उसके सच्चे प्यार का अहसास और अपने किये पर अफ़सोस हुआ. उन दोनों की आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली. उन्होंने स्तव्या को ढाढस बंधाने के लिए उसके सिर पर हाथ रखा... मगर स्तव्या वहां थी कहाँ?
  वो तो कब की अपने परिष्कृत के साथ एकाकार हो चुकी थी, वहां थी तो बस उसकी नश्वर देह.

आपका ही-
दीपक मशाल

शनिवार, 16 जनवरी 2010

मिलन####### पहला भाग पढ़े बिना इसे तो मत ही पढना--दीपक मशाल

वैसे मुझे उम्मीद तो थी कि कहानी के पाठक दुनिया में ज्यादा हैं इसलिए मैंने अपनी ये पुरानी कहानी ब्लॉग पर डाली लेकिन मेरा विश्वास टूट गया, फिर भी मैं शुक्रगुज़ार हूँ रश्मिप्रभा मम्मी जी का, हरकीरत हकीर जी का, वंदना जी का और कुमारेन्द्र चाचा जी का जिन्होंने निरंतर मेरी हौसला अफजाई की, जबकि व्यस्तता के कारण मैं आजकल टिप्पणियों के लेनदेन का खेल नहीं खेल पा रहा.... लेकिन जल्दी ही आप सबके लेखन की क्लास में बैठ के कुछ सीखने जरूर आऊंगा.. तब तक के लिए आशीर्वाद चाहता हूँ, स्नेह चाहता हूँ.....

अब परिष्कृत इस उलझन में था कि जाना चाहिए भी या नहीं, वैसे स्तव्या का घर स्कूल से लौटते वक़्त रास्ते में ही तो पड़ता था मगर जाने क्यों उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी और रोज़ उसी रास्ते से गुज़रते रहने के बावजूद आज घर लौटते हुए वो रास्ता उसे कुछ नया नया सा लग रहा था. पर जब परिष्कृत स्तव्या की गली के सामने से गुज़रा तो उसके कदम अपने आप ही धीमे हो गए. अनायास ही नजर गली के भीतर चली गई, देखा तो स्तव्या अपने घर के बाहर खड़ी हुई मुस्कुरा कर उसका स्वागत कर रही थी. परिष्कृत को उसके घर जाना ही पड़ा.
      अन्दर जाकर पता चला कि स्तव्या की बड़ी बहिन अपने साइंस चार्ट पर नामांकन को लेकर परेशान थी. स्तव्या ने ही उन्हें परिष्कृत की सुन्दर राइटिंग और आर्ट के बारे में बताकर घर बुलाने का सुझाव दिया था. जिस तरह पानी अपना रास्ता आप ही बना लेता है उसी तरह अगर हम किसी को सच्चे दिल से चाहें तो उसके करीब जाने या उसे करीब लाने के लिए बहाने ढूंढते देर नहीं लगती, ऐसा ही कुछ इन दोनों के साथ हो रहा था.
        धीरे धीरे ये सभी जान गए कि परिष्कृत और स्तव्या अच्छे दोस्त हैं पर वो दोनों भी ये बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि उम्र बढ़ने के साथ साथ उनका समाज और समाज के ठेकेदार उनकी दोस्ती पर उंगली पर दोस्ती जरूर उठाएंगे और उन्हें उनका ज्यादा दिन का साथ रास ना आएगा क्योंकि एक लड़का था और एक लड़की.
     किशोरावस्था के समतल मैदान की तंग गलियों को पार करती हुई जिंदगी, जवानी की हसीन, रंगीन और खूबसूरत वादियों में आ चुकी थी. सारी फिजां में  रंगों, खुशबुओं और रौशनी के सिवाय कोई और चीज़ तो जैसे नज़र ही ना आती थी. आखिर जवानी है ही ऐसी उम्र जब हर युवा अपने आपको दुनिया का बादशाह समझने लगता है, अपनी हर बात पे इतना गरूर कि खुद गरूर भी शर्मा जाये. मगर इन दोनों का संसार तो एक दूसरे में ही सिमटा हुआ था, दोनों एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे. कब हँसते-रोते, खेलते-गाते, रूठते-मनाते, एक दूसरे को समझते उनके अल्हड़पन के दिन पीछे निकल गए कुछ पता ही ना चला. अंग्रेजी में एक कहावत है कि 'टाइम फ्लाइज' सच में सुनहरे पंखों वाली चिडिया उन दोनों को दसवीं से बारहवीं और फिर बारहवीं से स्नातक तक ले गयी. चूंकि उनके कसबे में डिग्री कॉलेज ना था इसलिए दोनों एकसाथ एक ही बस में पास के शहर के डिग्री कॉलेज में पढ़ने जाने लगे. जाने कितनी ही प्रिय-अप्रिय घटनाओं ने इस दौरान इन दोनों को और भी मजबूत बंधन में जकड़ दिया. बस में एक दिन एक लड़का बराबर स्तव्या को घूरे जा रहा था, परिष्कृत से ये सब बर्दाश्त ना हुआ. बस से उतरकर परिष्कृत ने स्तव्या को कॉलेज छोड़ा और खुद वापस आकर उस लड़के का पता मालूम किया और जा भिड़ा उससे. बात जब स्तव्या को पता चली तो वो फूट-फूट कर रोई और अपनी कसम देते हुए उसने परिष्कृत को आगे से ऐसा कुछ ना करने को कहा.
          ग्रेज़ुएशन के दौरान ही परिष्कृत ने इंजीनिअरिंग कॉलेज में प्रवेश परीक्षा कि तैयारी शुरू कर दी थी. पता नहीं इसे उसकी मेहनत कहें या स्तव्या का भाग्य कि उसका आई.आई.टी. में चयन हो गया. जल्दी ही उसे आई.आई.टी. दिल्ली ज्वाइन करना पड़ा. उधर स्तव्या को कुछ सूझ ही नहीं पड़ रहा था कि परिष्कृत के स्वर्णिम भविष्य कि खुशियाँ मनाये या अपने पतझड़ जैसे वर्तमान के ग़मों में डूब जाए. परिष्कृत की क्लासेस शुरू हो गयीं थीं. क्या पता था स्तव्या को कि उसका आज का सूरज, उसका आँख का तारा कल का ईद का चाँद बन जायेगा. परिष्कृत के बिना एक-एक पल एक-एक सदी के बराबर था. उधर परिष्कृत का भी ऐसा ही हाल था शायद इसीलिये भावावेश में उसने स्तव्या को एक ऐसा पत्र लिख दिया जिसमे उसने अपने प्यार का खुल कर इज़हार किया था. आखिरकार वर्षों का धैर्य का बाँध टूट चुका था और वो खुद को ऐसा करने से रोक ना पाया.
       लेकिन जब बुरा वक़्त आता है तो अकेला नहीं आता, अपने साथ अपने यार, दोस्त और रिश्तेदारों को भी लेके ही आता है. परिष्कृत का इकरारनामा स्तव्या की मम्मी के हाथों लग गया. मम्मी ने परिष्कृत को बहुत भला-बुरा कहा और स्तव्या से एक दूरी बना ली जैसे उसने कोई पाप किया हो, वो अछूत हो गई हो. वैसे भी बचपन से ही उसे और भाई-बहिनों कि तुलना में कम ही प्यार मिला था, कहीं ना कहीं ये भी एक कारण था उसका परिष्कृत से प्यार पाकर उसकी तरफ खिंचे चले जाने का.
   स्तव्या के लिए 'योग्य वर' कि खोज तेज़ कर दी गयी.  एक तरफ स्तव्या के लिए सरगर्मियों से लड़के की खोज चल रही थी तो दूसरी तरफ इन दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ रही थी.वे दूर थे तो सिर्फ शरीर से, दिल से तो इतने करीब थे कि दूर रह कर भी दोनों एक दूसरे कि धडकनें सुन सकते थे.
     ये उनकी मोहब्बत की पाकीजगी ही थी जो उन्होंने कभी हदें पार नहीं कीं, कभी जो स्पर्श होता तो महज़ एक दूसरे को ढाढस बंधाने के लिए ही होता.
     ना जाने कितने ही रिश्ते नकार चुकी थी स्तव्या, हर लड़के में कोई ना कोई नुक्श निकाल ही देती. पर एक दिन ऐसा आया कि घरवालों ने उसकी एक ना चलने दी. पुलकित नाम था लड़के का पी.सी.एस. अधिकारी था, खानदान, मान मर्यादा दुनिया की नज़रों से देखा जाये तो सब कुछ मगर स्तव्या कि नज़रों से कुछ भी नहीं, क्योंकि जो नज़रें हीरे की चमक जानती हों उन्हें सूरज की  रौशनी में चमकते कांच के टुकड़े नहीं लुभा सकते थे. खैर, वो दिन भी आया जब लड़के वाले उसे देखने आये.... उसे प्रदर्शनी कि वस्तु की माफिक सजा-धजा के पेश किया गया और बाजारू  चीज़ की तरह चुन लिया गया. लाख कोशिश कि स्तव्या ने... यहाँ तक कि पुलकित को भी समझाया मगर इस बार.....
            लगा के जैसे ख्वाबों का अंतरमहल ढह गया. अब कोई ऐसा पल ना रहता जब आँख में नमी ना रहे. उसकी उदासी को देख बाहर के लोगों के साथ साथ रिश्तेदार और घर के सदस्य भी ताने कसने लागे. ऐसे समय में कोई सहारा था तो सिर्फ परिष्कृत.
         बातों ही बातों में एक दिन परिष्कृत ने उसे समझाया कि-
     ''शायद यही नियति है- 'वे' नहीं चाहते कि इस जीवन में हम एक दूसरे के जीवन साथी बन  कर रहें, मगर मन से तो हमें कोई नहीं रोक सकता ना, मन से तो हम कब के एक दूसरे के जीवनसाथी बन चुके हैं. अब तन का मिलन हो या ना हो कोई फर्क तो नहीं पड़ता.'' परिष्कृत को ईश्वर पर अटूट विश्वास था, परमपिता को अपने पिता मानता वो और उन्हें ईश्वर या खुदा कहके नहीं बल्कि 'वे' या 'उन्हें' कह कर ही संबोधित करता था और यहाँ भी ईश्वर को ही 'वे' कहा था उसने.
       एक क्षण को स्तव्या को लगा कि परिष्कृत भी उससे छुटकारा पाना चाहता है. लेकिन अगले ही पल परिष्कृत ने कहा-
  ''एक बात हमेशा याद रखना, जिंदगी में कभी परेशानियों से हार मत मानना, कभी किसी ज़ुल्म के आगे सिर मत झुकाना और कभी कोई ऐसा कदम मत उठाना कि........''
   ''परिष्कृत....''
  ''मेरी जिंदगी तुम्हारी जिंदगी से जुड़ी है और हाँ हम मिलेंगे जरूर, भले ही कुछ देर हो जाये.... अब चाहे वो देर कुछ महीनों की हो, कुछ वर्षों की या कुछ ज़न्मों की...... हम इंतज़ार कर लेंगे..''
   ''मगर मैं अपने आप को ज़रा भी तैयार नहीं कर पा रही कि कैसे उस शख्स से बात किये बिना सारी उम्र बिता पाउंगी, जिसके बिना एक पल भी नहीं बिता सकती, एक सांस भी नहीं ले पाती...''
    ''तुम ऐसा क्यों समझ रही हो स्तव्या कि ये सिर्फ हमारे साथ हो रहा है. अरे दुनिया की खातिर जो खुद राधा से जुदा हो गए, जो इक जान होकर भी दो जिस्मों में रहे, शायद उनकी भी यही मर्ज़ी है कि हम भी उनके नक्शेकदम पर चलें और फिर हम इतने स्वार्थी भी तो नहीं बन सकते कि अपनी ख़ुशी की खातिर अपने मम्मी-पापा कि खुशियों का गला घोंट देन, सच्चा प्यार मतलबी नहीं होता स्तव्या, वो तो क़ुरबानी देना जानता है.''
         ''मगर मैं तुम्हारी ये सब दर्शन की बातें नहीं समझ सकती जान, प्लीज.....''
अचानक किसी ने तेज़ी से कमरे का दरवाजा खटखटाया..............

तीसरा और आखिरी किश्त जो कि सबसे महत्वपूर्ण है और कहानी का चरमोत्कर्ष है, अवश्य पढियेगा लेकिन आज नहीं कल.... विदा दीजिये..
आपका ही-
दीपक मशाल


 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

मिलन

 दोस्तों,
ये कहानी जो मैंने आज से 6 साल पहले लिखी थी स्पंदन त्रिमासिक साहित्यिक पत्रिका के जुलाई-अक्टूबर २००६ अंक में प्रकाशित हो चुकी है...
कहानी बड़ी है इसलिए ३ अंकों में आपके सामने रखूंगा, स्नेह और समीक्षा दोनों चाहता हूँ..... आपकी राय निश्चित ही मेरे लेखन में सुधार लाएगी इसलिए टिप्पणी अपेक्षित है......

बदहवास सी पता नहीं किस सम्मोहन में बंधी वो इधर से उधर भागी जा रही थी. कभी इस कमरे में जाती कभी उसमे और फिर खुद ही बडबडाने लगती, पूछने लगती अपने आप से ही- ''यार मैं यहाँ क्यों आई? क्या लेना था मुझे? क्यों इतना भूल रही हूँ मैं आज? हाँ याद आया वो आर्चीज़ वाला पोस्टर जो मैं अपने कमरे में लगाने के लिए लायी थी, पता नहीं कहाँ चला गया. यहीं तो रखा था अभी.... मम्मी..... मम्मी तुम सुन रही हो ना वो मेरा आर्चीज़ वाला.......''
     ''हाँ.... हाँ स्तव्या मैं सब सुन रही हूँ और देख भी रही हूँ, सुबह से फिरकी सी यहाँ से वहां घूम रही है तू. पता नहीं क्यों इतनी खुश है? इस बार लगता है घर का कोना-कोना सजा के मानेगी, इस बार की दीवाली में कोई ख़ास बात है क्या?''
     '' उहूं .... ममा आप भी ना, मैं पहले ही बहुत परेशान हूँ, मेरा पोस्टर ना जाने कहाँ चला गया?''
     ''तूने ही तो अपनी अलमारी में उठा के रखा था, क्या अजीब सा कुटेशन था उस पर 'ट्रू लव नेवर डिपार्ट्स'.. हूंह.. रोज़ ना जाने कितने बच्चे इन्ही पोस्टरों और ऐसे ही बकवास कुटेशनों की वजह से प्यार-व्यार को हकीकत मान बैठते हैं और जब जिंदगी के धरातल पर आते हैं तब पछताने के अलावा कुछ नहीं रह जाता.''
     '' ओ..... मैं भी ना! थैंक्स मम्मी.''
अपने में ही मगन स्तव्या गुनगुनाने लगती है - ''पिया बोले..... पिया बोले........ जानूं ना''
      तभी मम्मी उसके गाने में खलल डालती हैं-
    '' अब मेरी समझ में आया, जरूर वो परिष्कृत आ रहा होगा. पाता नहीं क्या हो जाता है तुझे उसके आने की खबर सुनकर. अगर यही चलता रहा तो एक दिन सिवाय जिंदगी भर के रोने के तेरे पास कुछ भी नहीं रह जायेगा. ये लड़का तुझे कहीं का नहीं छोड़ेगा.'' मम्मी ने जैसे रंग में भंग कर दिया.
     '' ........अरे कल के दिन तेरी शादी होने वाली है, अगर तेरे ससुराल वालों को मालूम चल गया तो हम समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. अभी वक़्त है सुधर जा.... वो तो खैर मना की पापा को अभी तक कुछ नहीं पता वर्ना.....''
     गुनगुनाना बंदकर स्तव्या ऐसे मचल उठी जैसे बच्चे के हाथ से दूध की बोतल छीन ली गई हो-
      '' वर्ना...वर्ना क्या? क्या कर लेंगे वो... और क्या कर लेंगे आप लोग अगर उन्हें पता चल भी गया तो. कोई चोरी की है हमने, गुनाह किया है कोई? ईश्वर साक्षी है कि कितना पवित्र प्यार है हमारा.. वर्ना आजकल तो लोग प्यार का नाम बदनाम करते हुए क्या क्या कर बैठते हैं, प्यार का मतलब ही ना जाने क्या समझते हैं. हाँ और ये शादी जो मैं कर रही हूँ अपनी ख़ुशी से नहीं  कर रही हूँ बल्कि उसी परिष्कृत के कहने पर आप लोगों की मान मर्यादा की खातिर कर रही हूँ... उसी इ परिष्कृत के कहने पर जिसे आप सुबह-शाम गालियाँ देते नहीं थकतीं वर्ना हम तो जब चाहें तब.......''
     ''तू....तू उस कल के लड़के के लिए हम लोगों को छोड़ सकती है, यही संस्कार दिए हैं हमने तुझे?'' बात बिगड़ते देख मम्मी ने उसे संस्कारों की जंजीरों में बांधना चाहा.
     '' इन्हीं संस्कारों और खोखले आदर्शों ने तो........'' तुनकते हुए स्तव्या अपने कमरे में चली गई और अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया. उसकी आँखों से गर्म पानी का सोता फूट पड़ा. कहते हैं चुपके चुपके रो लेने से मन का खुलता लावा बिना किसी उद्वेग के धीरे धीरे निकलता रहता है.. वर्ना कभी एक साथ निकला तो ज्वालामुखी की तरह तबाही फैला देता है... . ना जाने आंसुओं के बोझ से या थकावट ज्यादा होने की वजह से उसकी आँखें बंद हो रही थीं. भारी पलकों से वह अपने अतीत की ओर उड़ चली.
  स्कूल में थी वो...... जब पहली बार परिष्कृत को देखा था. एक मध्यमवर्गीय परिवार का सीधा-सादा, भोला सा लड़का. सुनते हैं, अरे सुनते क्या पढ़ते भी आये हैं हमेशा से कि पहली नज़र का प्यार खरा प्यार होता है, लेकिन उन दोनों को तब तक ये बात पता भी ना थी कि प्यार जैसी भी कोई चीज़ होती है. जानते भी होंगे तो उतना ही जितना टी.वी. सीरिअल्स या फिल्मों में देख रखा था. छोटे से कस्बे का एक छोटा सा स्कूल जिसमे की दोनों पढ़ते थे.
      सच कहें तो उस कच्ची उम्र में होने वाला प्रेम अगर आकर्षण ना हो तो वही सच्चा प्यार होता है, जैसे राधा-श्याम का , मीरा-मोहन का प्यार... या ऐसा प्यार जिसके लिए अमृता प्रीतम जी ने लिखा है कि-
 'तेरे प्यार की एक बूँद जो इसमें मिल गई बस इसीलिए मैंने जिंदगी का ज़हर पी लिया..'
      खरे सोने से ज्यादा खरा, सच से कहीं ज्यादा सच्चा वो प्रेम जिसकी एक बूँद तमाम जिंदगी के ज़हर रुपी दुखों को नाकाम कर देती है, जिसमे दूर दूर तक वासना नहीं होती. गलत नहीं होगा अगर कहें कि वो दैवीय प्रेम था. अल्हड़पन में या तो सहज विपरीत लिंगी आकर्षण होता है या फिर सीधा वो प्रेम जिसे रब, मोहब्बत, इश्क, ईश्वर और ना जाने क्या क्या कहा गया है. और फिर इसे प्रेम के अलावा और क्या कहेंगे आप, जो दर्ज़ा ९ के बच्चों की छोटी सी उम्र से शुरू होकर बिना किसी शारीरिक स्पर्श के या स्वार्थ के १४ वर्षों के बाद भी जारी और आज भी उतना ही ताज़ा... जितना की अधखिला 'लाल गुलाब'.... . इतने वर्षों में कोई स्पर्श हुआ भी है तो वो है मन का मन से स्पर्श, रूह का रूह से स्पर्श.
   दोनों ने बचपन के आँगन को पारकर किशोरावस्था की गलियों में कदम रखे थे लेकिन बचपना अभी भी उसी तरह था जैसे सूरज निकलने के थोड़ी देर बाद तक भी अस्तांचल में चाँद तेजहीन मगर स्पष्ट दिखाई पड़ता है. पता नहीं क्या ढूंढती रहती थी स्तव्या परिष्कृत के मासूम, भोले से चेहरे में. एक बार तो क्लास में पढ़ाते हुए टीचर ने उसे टोका भी था-
        '' तुम्हारा मन पढ़ाई में कम, पीछे देखने में ज्यादा लगता है स्तव्या.'' पर पढ़ाई में हमेशा अब्बल रहती थी सो कोई ज्यादा कुछ ना कह पाता था.
        दूसरी तरफ स्तव्या के मन में पनप रहे प्रेम के बीज से अनभिज्ञ सा परिष्कृत अपने यार-दोस्तों में ही खोया रहता था, वो तो उसके ही किसी दोस्त ने एक दिन 'भांप' लिया और मजाक-मजाक में परिष्कृत से पूछा-
    ''क्या चक्कर है गुरु? स्तव्या तेरी तरफ बहुत देखती है पीछे मुड़-मुड़ के?'' शायद उसी दिन से परिष्कृत ने भी गौर करना शुरू किया. सच तो ये था कि मन ही मन वो भी स्तव्या को चाहता था मगर कभी-कभी सोचता कि-
      '' कहीं ये मेरा वहम तो नहीं, हाँ वहम ही होगा, वर्ना स्तव्या जैसी इंटेलिजेंट और खूबसूरत लड़की मुझ जैसे अतिसाधारण से लड़के को क्यों चाहेगी?''

    छोटे से कसबे में को एजुकेशन का मतलब सिर्फ यहीं तक सीमित था कि क्लास में लडकियां आगे वाली कतार में बैठें और लड़के पीछे की बाकी सीटों पर. नोट्स-वोट्स लेना देना तो रहने ही दो , अगर कोई साधारण सी बात करते भी पकडे जाएँ तो हाय तौबा मच जाये, अगले दिन सारे स्कूल भर के लड़कों को मसाला मिल जाये. इधर आजकल तो शहरों में पब्लिक स्कूलों के बच्चे सातवीं, आठवीं तक पहुँचते-पहुँचते अपनी उम्र से दस-पंद्रह साल ज्यादा 'समझदार' हो जाते हैं और वीडियो कैमरे वाले मोबाइल फोन्स ने उनकी समझ का दुनिया से परिचय भी करा दिया है.

  एक दिन क्लास ख़त्म होने के बाद परिष्कृत के करीब से निकलते हुए चुपके से उसने परिष्कृत को घर आने का निमंत्रण दिया.... एक लड़के ने जब ये सुना तो कानोंकान बात फ़ैल गई. अब सब लड़के परिष्कृत को देख कर गाना गाने लगे-
  'शायद मेरी शादी का ख्याल... मन में आया है... इसीलिए.. मम्मी ने मेरी..........'
अब परिष्कृत इस उलझन में था कि जाना चाहिए भी या नहीं, वैसे स्तव्या का घर स्कूल से लौटते वक़्त रास्ते में ही तो पड़ता था मगर............
(शेष अगले अंक में)
आपका ही-
दीपक 'मशाल'


गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मकरसंक्रांति और भंवरांत पर याद आ गए कुछ बीते पल~~~~~~~दीपक 'मशाल'



कैसे भी वो बचपन के दिन नहीं भुला पाता हूँ जब आज की ही तरह मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता था, हाँ क्षेत्रीय भाषा में हम लोग इसे 'संकरांत' कहते हैं. लेकिन सच कहूं तो संकरांत हमारे लिए बड़ी दुखदायी होती थी, वो इसलिए नहीं की त्योहारों से लगाव नहीं था... बल्कि इसलिए की ये मुख्यतः सर्दी का त्यौहार था और उसपे भी चोंचला ये की इस दिन सुबह से बुडकी अर्थात डुबकी(स्नान) का विशेष महत्व था और स्नान भी कहाँ नदियों में... जो आज भी होता है. अब सुबह ३-४ बजे के आसपास का मुहूर्त हुआ तो ये त्यौहार हमारे जैसे आलसी और नहाने के नाम पर बुखार चढ़ आने वाले बच्चों के लिए तो दुश्मन ही हुआ ना. हम बच्चे एक दूसरे से कहते फिरते की ''भाई आज तो नहा ले साल भर हो गया''. :)
  लेकिन इस पर्व के अगले दिन पड़ने वाले 'भंवरांत' का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहता, ये वो पर्व है जो संकरांत के अगले दिन पड़ता और इस दिन घोड़ों और गड़गड़ियों  की पूजा होती थी, भाई सच्चे नहीं मिट्टी के(खिलौने) और उनके ऊपर छोटे छोटे कपड़े के झोले जिन्हें गोंद कहते थे रखे जाते...और वो भी घर में बने विभिन्न प्रकार के लड्डू(तिल, मूंग की डाल, चने, सेब, फूले या पोपकोर्न, आटे आदि के लड्डू) एवं मठरी, खुर्मी, सेव से भरे हुए. अब्बल तो हम भाई-बहिन में गोंद के आधिपत्य को लेकर झगडा होता था और उसके बाद बददुआ देते इन स्कूलवालों को कि भंवरांत पर्व के अगले दिन उन पूजा किये गए घोड़े और गड़गड़ियों को खींचने के लिए छुट्टी भी नहीं देते.जिस साल शनिवार को भंवरांत पड़ती, हम बड़े खुश होते की चलो कल इतवार को जम के अपने-अपने मिट्टी के ये खिलौने खींचते फिरेंगे. बताना जरूरी है की लड़कों के हिस्से घोड़े और लड़कियों के गड़गड़ियाँ आती थीं. गड़गड़िया  एक अजीब सी संरचना वाला मिट्टी का खिलौना होता जिसका मुँह तो घोड़ी से मिलता-जुलता होता था लेकिन धड़ ऐसे होता जैसे कछुवे की पीठ को या किसी बड़ी कढ़ाही को उल्टा रख दिया गया हो और उसके बीचों-बीच एक छोटा सा घड़े जैसा कुछ. लड़के लड़की का भेदभाव इतना कि दोनों के खिलौनों के चक्के(गोल मिट्टी के पहिये) भी अलग संरचना के होते थे, वैसे उस समय तक ना तो हमें लड़के लड़कियों में अंतर समझ आते और ना ही उन पहियों में. हम भाई बहिन में आपस में ही शर्त लगती कि किसका खिलौना ज्यादा दिन चलेगा. असल मिट्टी के थे तो इसलिए कभी ना कभी उनका टूटना तय ही था(काश ये बात हर इंसां अपने दिमाग में रख पाता), लेकिन पहले कौन टूटे???? अक्सर मैं ही हारता क्योंकि घोड़े कि गर्दन जल्दी ही जरा सी टक्कर से धड़ से अलग हो जाती जब कि बहिन का खिलौना देखने में कछुवे कि तरह होने के साथ साथ उसी कि तरह मजबूत भी होता... कई बार तो यही झगड़ते कि लड़कियों को घोडा देना चाहिए और हमें गड़गड़िया. जिस साल मेरी परदादी ५० पैसे बचाने के लोभ में रंगीन के बजाए सादे घोड़े खरीदतीं हमें बड़ी कोफ़्त होती क्योंकि बाकी सब दोस्त और मोहल्ले के बच्चों के खिलौने रंगीन होते थे.
पूजा के बाद हमारी नज़र उन गोंदों पर भी टिकी रहती जिनका अभी पहले जिक्र किया था, क्योंकि उनमे भरी गई मिठाइयों को उठा के रख दिया जाता और सिर्फ वसंत पंचमी याने ठीक १५ दिन बाद खोला जाता था. अब इतना सबर था किसके पास, घर कि बाकी मिठाई ख़त्म हुई नहीं और हम लग जाते गोंद पर हाथ साफ़ करने. हालांकि हमारी आदतों से परेशान होके मम्मी उन्हें छुपा के रख भी देतीं थीं लेकिन हम भी जूनियर जेम्स बोंड( बाल पत्रिका नन्हे सम्राट का एक पात्र) से कम थोड़ेई थे.. :) बस अब तो जिंदगी कि रफ़्तार से भागती बस में बैठे कभी फुर्सत कि खिड़की में से पीछे मुड़ के उन छूट चुके पेड़ों रुपी बीते दिनों को देखने की कोशिश करते हैं और फिर मुस्कुरा के आगे की सड़क बनाने लगते हैं..
आप सब को मकरसंक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं..

आपका ही-
दीपक 'मशाल'

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